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आखिर बहुजनो का नैतिक पतन क्यों
आखिर बहुजनो का नैतिक पतन क्यों ( प्रमुख कारण 'जर' अर्थात धन)

आखिर बहुजनो का नैतिक पतन क्यों? ( प्रमुख कारण ‘जर’)-द्रुगेश गुलशन यादव

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आखिर हमारे बुजुर्गो ने सच ही कहा है कि-  संसार मे जितने भी विवाद या झगड़े होते है, उनके कारण होते है, जर, जोरू, और जमीन।  इन तीनो में सबसे प्रमुख कारण ‘जर’ अर्थात धन। इतिहास ऐसे प्रमाणों से भरा पड़ा है, जहाँ धन की प्राप्ति के लिए खून की नदियां बह गयीं, मर्यादाएं टूट गयी, स्वाभिमान कुचल गए, आत्म सम्मान चकनाचूर कर दिए गए, रिश्ते नाते तार-तार कर दिए गए। पूरी की पूरी सभ्यता समाप्त कर दी गयी।

आखिर बहुजनो का नैतिक पतन क्यों…

इसका प्रमाण इतिहास के साथ साथ सभी धार्मिक ग्रन्थो में मिलता है। धन की प्राप्ति के लिए इससे ज्यादा बुरी बात क्या होगी कि आये दिन पुत्र, पिता की हत्या कर रहा है, सरकारी नौकरी की प्राप्ति के लिए, रिटायर होने के पहले ही, पूरी सम्पति पर एकाधिकार रखने के लिए आदि। इंसान की सारी नैतिकता उस समय भूल जाती है, जब उसके अर्थव्यवस्था पर बात आती है।

आखिर पैसो के लिए इंसान कितना गिर सकता है, इसका प्रमाण रोज के समाचार पत्रों में भरा पड़ा रहता है। लड़कियों को गलत कामो में फेंक दिया जाता है, बच्चो से भीख मंगवाया जाता है। अपहरण कर फिरौती मांगी जाती है, जो न पूरी होने पर मासूमो को बेरहमी से मार दिया जाता है। इस संबंध में तो महान हमारे कुछ राजनेता होते है, जिनके नैतिकता का पतन पूरी तरह से समाप्त हो चुके होते है। देश के खजाने से आये दिन बड़े-बड़े घोटाले करके देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से खोखला कर रहे है।उनका देश के प्रति जिम्मेदारी के निर्वहन से कोई सरोकार नही, बस उनकी जेब मोटी होती रहे। जानवरो के नाम पर तक उनको संपत्ति मिलेगी और यहाँ गरीब इंसानों को खुले सड़क पर सोने में मजबूर होना पड़ता है, कूड़े से बिनकर,  भीख मांगकर भोजन करना पड़ता है।

धन की रोशनी आंखों को ऐसे चकाचौंध कर रही है कि हमारे आसपास कौन भुखमरी से मर रहा है, कौन ठंड में भी नंगे बदन जीवन जी रहा है, कुछ भी दिखाई नही देता। शारीरिक अंगों का व्यापार किया जाता है। हम सभी के धार्मिक स्थलों पर इतना पैसा होने के बावजूद देश कर्जे में डूबा हुआ है, लेकिन लोगो की नैतिकता पता नही कहाँ सो जाती है,कि उन्हें देश के लोगो की समस्या नही दिखती।

अर्थव्यवस्था की प्राप्ति के लिए ये बहुजनो का सामाजिक, राजनैतिक, व्यापारिक,  पारिवारिक, आत्मिक, आदि नैतिक पतन नही तो और क्या है?

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