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आज जागा तो हूँ

हाँ, आज जागा तो हूँ
लेकिन दर्द रहता है
जो सदियों पहले घाव लगा था
वो आज भी ताजा रहता है
कभी क्षेत्र,कभी गरीबी,कभी औरत
तो कभी जाति के नाम पे दुत्कारा जाता हूँ
सारे सवाल एक हैं
पर खुद की नज़र बदलती रहती है
और कभी प्यार कभी आशा की किरण
उन सामंतियों/मनुवादियों में खोजते रहते हैं
वो पराया तो पराया हीं था
यहाँ सदियों से अपने घाव खुरेदते रहते हैं
शर्म उन्हें आनी चाहिए
जिसने ज़ुर्म किया
फिर भी हम हीं शर्म महसूस करते रहते हैं
हमारी ईमानदारी को बेईमानी साबित करते रहते
खुद की बेईमानी को भगवान की माया कहते रहते
फिर भी उनके बीच हीं प्यार को तलाशता हूँ
और चिथड़ो में भी खुश रहता हूँ
फिर भी कुछ को ज़रा न भाता हूँ
हाँ,आज जागा तो हूँ
लेकिन दर्द रहता है

साभार : संजीत कुमार

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