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आदिवासी महिला पार्वती मुर्मू
आदिवासी महिला पार्वती मुर्मू को क्या मिल सकेगा मौजूदा सरकार से न्याय?

आदिवासी महिला पार्वती मुर्मू को क्या मिल सकेगा मौजूदा सरकार से न्याय?

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रांची। चका चोंध और तामझाम के बिच नेता राजेंद्र जी का कार्यक्रम समाप्तिउपरांत राँची राज्यभवन के पास कथित धरना स्थल पर अफरातफरी मच गयी। पात्रकार भी उत्सुकतावस तफतीस के प्रयास में जुट गए कि आखिर मामला क्या है? पता चला कि गरीब जनता नेता जी के लिए नहीं बल्कि अपने गरीब मजदूर साथी के परिवार, आदिवासी महिला पार्वती मुर्मू को न्याय दिलाने के लिए सुबह से ही यहाँ धरना पर बैठी हुई थी। जिसका नेतृत्व जे.एम.एम, एम.एस.एस, अखिल भारतीय किसान महासभा (माले), जे.वी.एम., विस्थापन विरोधी जन विकास आन्दोलन, इत्यादि राजनैतिक पार्टियाँ एवं मजदूर संगठन कर रही थी।

 

वहां लगे बैनर पढने से पता चला कि ये लोग स्व. मोतीलाल वास्के की हत्या की न्यायिक जाँच करवाने व उनके हत्यारो  पर मुकदमा दर्ज कर सजा दिलाने की मांग को लेकर धरना पर बैठे थे, जिन्हें पुलिस यह कह कर हटा रही थी कि उनलोगों के पास धरना के लिए अनुमति पत्र नहीं है।  उन्हें यहाँ नहीं बैठने दिया जाएगा। अतिशीघ्र वे ताम-झाम हटाये नहीं तो कार्यवाही होगी। उपस्थित जन हटने को तेयार न हो रहे थे। अंततः उन सभों ने गिरफ्तारी दी। सभी आंदोलकारियों को पुलिस वैन में भरा जाने लगा, इन्कलाब जिन्दा बाद, रघुवर दास हाय-हाय जैसे नारे गूजने लगे। पुलिस वैन चल पड़ी मेरे दिमाग में फिल्मो में दिखाए भगत सिंह कि गिरफ्तारी का प्रकरण घुमने लगा! मै भी उस गाड़ी के पीछे-पीछे चल पड़ा। पुलिस वैन को मोराबादी स्थित फूटबॉल स्टेडियम में ले जाया गया मै भी पीछे घुस गया।
आगे परस्तुत है आंदोलनकारी बच्चा सिंह से मिली जानकारी की तस्वीरें इस वीडियो में… जिसमे ये बताते हैं कि हमने पहले ही धरने की सूचना प्रशासन को दे दी थी फिरभी इन्होने हमारे आन्दोलन को कुचलने की कोशिश की।
वीडियो का लिंक:

आखिर क्या है पूरा मामला जानिये स्व.मतिलाल वास्के के परिवार, आदिवासी महिला पार्वती मुर्मू की जुबानी जो हिन्दी भाषा समझती तक नहीं है, वहां उपस्थित लक्ष्मी कछप से हिन्दी भाषा में समझने की भी कोशिश की…
Youtube link :

 

आदिवासी महिला पार्वती मुर्मू  प्रशासन पर आरोप लगाते हुए कहती है कि झूठी वाहवाही लेने के लिए कोबरा ने मेरे पति मोतीलाल वास्के  गिरिडीह, झारखण्ड के रहने वाले थे, जो 2003 से ही आदिवासियों के धर्म स्थल मरांग बुरु जुग जाहेस्थान एवं प्रसिद्द तीर्थ स्थल पारसनाथ पर्वत पर स्थित चन्द्र प्रभु टोंक के पास दाल-भात व सत्तू की छोटी सी दूकान चलाता था और जैन तिर्थावलाम्वियों को पारसनाथ पर्वत की परिकर्मा कराने के लिए डोली मजदूर का भी कार्य किया करता था साथ ही वहां कार्यरत डोली मजदूरों के एक मात्र पंजीकृत संगठन ‘मजदूर संगठन समिति‘ का सदस्य एवं आदिवासी होने के कारण आदिवासी सगठन ‘मरांग बुरु सांवता सुसार बैसी’ का  सदस्य भी था, को पकड़ कर सामने से 11 गोली मारकर हत्या कर दी।

वह झारखण्ड सरकार से सवाल करती है कि क्या हमारे संविधान ने पुलिसकर्मियों को यह अधिकार दिया है कि वे सरकारी खजाने से एक आदिवासी मजदूर के हत्यारों को पार्टी करने (दारु-मुर्गा) के लिए एक लाख रूपये दे! क्योकि 10 जून को झारखण्ड के डी.जी.पी. ने गिरिडीह एस.पी. को हत्यारों की टोली को पार्टी मानाने के लिए एक लाख नगद दिया और पंद्रह लाख बाद में देने की घोषणा भी की?

स्व.मतिलाल वास्के के परिवार, आदिवासी महिला पार्वती मुर्मू धरने के माध्यम से मुख्यमंत्री और राज्यपाल से जानना चाहती थी कि उसके तीन छोटे बच्चे हैं और उसका पति एकमात्र कमाऊ सदस्य था जिसकी हत्या कर दी गयी और इतने समय बीत जाने के बाद भी सरकार का कोई अदना सा अधिकारी भी उनसे उसके पति की हत्या के बाबत कुछ पूछने तक नहीं आई क्यों???

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