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इतने पैसों में जाने कितने गरीबों का पेट भर जाता ???

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किसी महंगी कार, ऑडी, बी.एम.डब्ल्यू. जैसी को देखते ही, “इतने पैसों में जाने कितने गरीबों का पेट भर जाता”, कह कर ताना देना कोई नयी बात तो नहीं है | साम्यवादियों-समाजवादियों के मूंह से कभी ना कभी सुना ही होगा |

सवाल है कि कैसे खिलाते गरीबों को ? उन पैसों की सब्सिडी यानि कुछ अनुदान, कुछ भीख जैसा देकर ! कितने दिन काम चल जाता उस से ? कभी सोचा है एक महंगी कार ने कितनों का पेट भरा है ? पक्का पक्का देखा जाए तो उसकी टायर के रबर का सफ़र कहीं दक्षिण भारत में शुरू हुआ हो सकता है | रबर प्लांटेशन से लेकर टायर की फैक्ट्री तक आने में कई किसानों, कई मजदूरों को रोजगार देते हुई उस टायर ने कितनों का पेट भरा है | उसके अलावा भी कई छोटे छोटे पुर्जे होते हैं कार में | शीशे की विंड स्क्रीन से लेकर हेड लाइट और इंडिकेटर तक सबने एक अलग क्षेत्र में रोजगार पैदा किया और गरीबों का पेट भरा है | फिर गाड़ी में बिजली का भी ढेर सारा काम होता है | जिन खदानों से ताँबा निकला वहां से लेकर तार बनने और इलेक्ट्रीशियन के उसे गाड़ी में फिट करने तक फिर रोजगार के जरिये पेट भरा | लोहे के पुर्जों को भूल मत जाइएगा | सबसे ज्यादा तो वही होते हैं | वो भी खदानों से फैक्ट्री तक का सफ़र तय कर के आये हैं | अब आप ये जोड़ पा रहे होंगे कि कार की कीमत में उतने लोगों को सब्सिडी नहीं दी जा सकती थी | अपने बनने के सफ़र में वो जाने कितना रोजगार पैदा कर आई है | अभी जो इस प्रक्रिया में नहीं जोड़ा है वो है कार को बेचने की प्रक्रिया | उसके लिए प्रचार बनाना, कार को किसी शो रूम तक पहुँचाना, वहां उसे बेचना, इस सब में भी डीलर, मार्केटिंग वाले, प्रचार बनाने वाले, कागज़ी कार्यवाही देखने वाले क्लर्क, कितने ही लोग लगे हैं | कार इन सब का पेट भरती हुई आई है |

ओह हां, ये कोई सब्सिडी जैसी राशि देकर नहीं हुआ| यहाँ पूरी इज्जत से श्रम का मूल्य दिया गया था| गरीब झेंपता सा किसी अनुदान की कतार में नहीं खड़ा था जहाँ सरकारी मन मर्जी का राशन बांटता | वो शान से अपनी मेहनत के पैसे लेकर गया, और अपनी मर्ज़ी से उस से चीज़ें खरीद कर लाया था | ये पूंजीवाद और समाजवाद-साम्यवाद का अंतर है | जब आप कुछ खरीदते हैं तो दिए गए पैसे किसी के श्रम का मूल्य होता है | बिना काम किये किसी को भीख की तरह कुछ देकर शर्मिंदा नहीं किया होता है आपने | पूंजीवादी किसी वस्तु की, किसी सेवा की कीमत दे रहा होता है | समाजवादी–साम्यवादी आपको टैक्स के पैसे के बदले में भीख थमाता है, बिना ये जाने कि आपको वो चाहिए भी कि नहीं |

इस कार की कीमत में गरीबों का खाना वाले सवाल पर शायद हम सब पॉलिटिकली करेक्ट रहने के चक्कर में चुप रह जाते हैं| दोबारा सोचकर देखिये पॉलिटिकली करेक्ट ही नहीं मोरल्ली करेक्ट, एथिकल, सोशली करेक्ट क्या होता? इतने रोजगार पैदा करना या इतने पैसों से एक बार, सिर्फ एक बार सब्सिडी दे डालना ?

साभार – रंजीत झा

This post was written by sanjay dash.

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