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“ईश्वर* नहीं है।”

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मुझे पता है कि
दुनिया में कोई दैवीय शक्ति नहीं है
तो फिर क्यों आस्था के नाम पर
हमें इनसे डराया जाता
जो चीज नहीं है
उसके होने और मानने के लिए
आस्था का सहारा क्यों लिया जाता है
मैं पूछता हूँ
ये बेबुनियाद तर्क किसने इजाद किए कि
ईश्वर* अजर है
अमर है
निराकार है
अगोचर है
अजन्मा है
सर्वव्यापी है
सर्व शक्तिमान है
चलो कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि
ईश्वर* की संरचना ऐसी ही है
और ईश्वर* सर्वव्यापी है
तो फिर ये बताइए
हर रोज जो बलात्कार होते हैं
उसे परम पिता परमात्मा
देख रहे होते हैं
क्या उनकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि
युवती की लुटती हुई इज्जत को बचाया जाए
और अपने सर्व शक्तिमान होने का प्रमाण दिया जाए
ईश्वर* सर्वव्यापी है तो मुझे विश्वास है
ईश्वर* संसदीय कार्रवाई में भी हिस्सा लेते होंगे
तो क्या ईश्वर* की यह राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि
शोषित जनता की समस्याओं का समाधान कराएँ
और संसदीय कार्रवाई में जनता की पैरोकारी करें
ईश्वर* अगोचर रूप में न्यायालय भी जाते होंगे
मैं पूछता हूँ
क्यों ज्यादातर फैसले धन्ना सेठों के पक्ष में होते हैं
ईश्वर* न्याय प्रिय हैं तो अपने होते हुए
अन्याय क्यों होने देते हैं
ईश्वर* कभी रात में फुटपाथ से भी गुजरे होंगे
फुटपाथ पर सोते हुए गरीबों को देखा होगा
क्या ईश्वर* ने एक बार भी नहीं सोचा होगा
कि ये लोग फुटपाथ पर क्यों पड़े हैं
क्या उन्हें अपने आप पर शर्म नहीं आई होगी
कि वे निराकार और अगोचर होकर
चार करोड़ के आवास में निवास करते हैं
क्या ईश्वर* कभी गरीबों की झोपड़ी में नहीं गए
भूख से बिलखते और ठंड से सिकुडते
दुधमुँहे बच्चों को देखकर
उनका हृदय द्रवित नहीं हुआ
ये सवाल मुझे दिन रात कचोटते हैं
और अंततः मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि
“ईश्वर* नहीं है।”

 

साभार : निर्मला यादव

This post was written by sanjay dash.

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