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एक रिश्ता सास-बहु का : हेमा भारती

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लोग कहते हैं कि रिश्ते उपर वाले बनाते हैं और हर रिश्ते में प्यार का अपनापन का मिठास उपर वाला ही घोलता है। तो फिर रिश्ते में, कड़वाहट क्यों आने लगती है,  तो क्या यह भी उपर वाला का ही मर्जी है। एक मां जब एक बेटे को जन्म देती है तो उस रिश्ते में मां-बेटे का रिश्ता हर रिश्ते से उपर हो जाता है, एैसा लगता है जैसे एक मां के लिए उसके बेटे से बढक़र और कोई नहीं है वो सारे रिश्ते को पीछे धकेल सारा अपनत्व अपने बेटे पर निछावर कर देती है, जब बेटा डगमगाते कदम से अपनी मां की और हाथ बढ़ाता है तो मां को लगता है जैसे सारा आसमान उसके कदमों में झुक गया हो और मां जल्दी से लपक कर उसे पकड़ लेती है, अपना हाथ अपने बेटे के सर पर रख देती है। बेटा जब बड़ा होकर पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ा होता है , मां खुशी से झुमती हुई अपने घर में बहु लाने की सपने देखने में लगती है।

पंसद की बहु घर आती है तो सास की  खुशियों का ठिकाना नहीं होता है वो पहले गाता-नाचती है मिठाईयों बांटती है फिर बहु का स्वागत करती है वो अपनी अरमानों का पिटारा बहु के सामने खोल कर रख देती है। बहु भी अपनी सास को अपनी सगी मां की तरह मानती है। अपनी सास का हर कहा मानती है धीरे-धीरे रिश्तों में मिठास दोगुनी हो जाती है। फिर पता नहीं एैसा क्या होता है कि अचानक से रिश्तों में टकराहट शुरू हो जाती है। सास की बातें न तो बहु को अच्छी लगती और न बहु को सास की बात। सास-बहु के नोंक-झोंक में एक मां से बेटा दूर होने लगता है। न तो बेटा अपनी मां के भवनाओं को समझ पाता है और मां अपने बेटों को। सास भी एक औरत होती है और बहु भी एक औरत होती है लेकिन एक औरत ही दूसरी औरत की भावनाओं को ठेस पहुंचाती रहती है, लेकिन हमारे समाज में कहीं-कहीं ये सास-बहु के टकरार घर तोड़ देती है, अपने ही घर में मां-बेटा अलग-अलग चुल्हों में अपनी रोटियां सेंकने लगते है। कितना अजिब लगता होगा एक मां को जब अपने ही घर में अपने बेटे के लिए खाना नहीं खिला पाती होगी…।

किसी भी लडक़ी केलिए ससुराल में उसकी सास की दर्जा हर रिश्ते से उपर होता है। ससुराल को कैसे अपनाया जाए, उस घर का ख्याल कैसे रखा जाए? घर के सभी सदस्य का पंसद-नापंसद कौन खाने में क्या पंसद करता है? सब एक सास ही बहु को बतला सकती और कोई नहीं।ससुराल मेें सास ही हमारी पहली गुुरू होती है जो हमें अपने घर समझने में संभालने में हमारी मदद करती है वो हमारी पहली एैसी दोस्त होती है जिससे हम जिंदगी के तर्जुबे को सिखते है। हम अपनी समाज के सभी बहुएं से यही कहेंगे कि वे अपनी सास का कभी अनादर न करें, उसे समझे क्योंकि हर सास अपनी बहु को अपने कलेजे के टुकड़े को उसकी हाथ में सोंवती है, सास की जबान कड़वी हो सकती है उसका ममता नहीं।

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