एक लड़की के लिए मूल अधिकार पाना दुश्वार

शिक्षा मूल अधिकारो में से एक है। हमारा संविधान यह अधिकार हर लिंग, जाती और धर्म के लोगो को सामान रूप से देता है। स्त्रियों को भी यह अधिकार है परंतु उन्हें अपने इस अधिकार को पाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। जिन बच्चियों को माँ बाप उच्च शिक्षा देना चाहते है और देते है उनमे से भी अधिकतर का मुख्य उद्देश्य उनको विवाह के लिए तैयार करना ही होता है। वो चाहते है की उन्हें अच्छा वर और घर मिले और इसके लिए जरुरी है की वो शिक्षित हो। पर आज भी गावो और छोटे शेहरो में लोग अपनी लड़कियो को ज्यादा नहीं पढ़ाना चाहते क्योंकि फिर वो उनके लिए उतना पढ़ा लिखा लड़का नहीं खरीद पाएंगे। लड़कियो के लिए आज भी पढ़ाई इसलिये नहीं है क्योंकि वो पढ़ लिख कर कुछ बन जाये घर और अपना नाम रोशन करे बल्कि इसलिये है की वो खाना बनाने, घर के कम करने के साथ एक और योग्यता अपने साथ जोड़ ले ताकि उनकी शादी अच्छे घर में हो सके। यदि कोई लड़की इसलिए पढ़ना चाहती है की वो नाम कमाना चाहती है कुछ करना चाहती है तो उसके लिए वो पढ़ाई एक युद्ध जैसी स्थिति होती है। एक युद्ध जो उसे समाज के साथ साथ अपने परिवार के साथ भी लड़ना पड़ता है। यदि वो छोटे शहर या गांव से हो तब तो उसकी स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। मेरी एक मित्र पढ़ने में बहुत अच्छी है। वो कुछ बनना चाहती है। समाज सेवा करना चाहती है उसे शादी नहीं करनी कम से कम अभी नहीं करनी। पर उसका परिवार उसका भाई सब उसके खिलाफ है। उसका कोई पुरुष मित्र नहीं ,कोई प्रेम नहीं ,कोई बुरी आदत नहीं। परंतु उसका परिवार उसे रोज यातनाये देता है वो कही नोकरी के लिए अप्लाई करती है तो उसका भाई उसका फॉर्म जाने ही नहीं देता या वो चोरी छिपे भेज दे तो उसके पास उसका ईडी और एग्जाम डिटेल्स नहीं पहुचने देता। उसके लिए उसे अपने मित्रो के घर का पता देना पड़ता है। वो आगे पढ़ना चाहती है मेहनती है पर उसके घर वाले बस यही कहते है तू हमारी नाक कटवा देगी। एक लड़की के लिए अपना मूल अधिकार पाना दुश्वार है शिक्षा के लिए उसे न सिर्फ स्कूल कॉलेज में मेहनत करनी पड़ती है बल्कि माँ बाप और घर के अन्य सदस्यों से भी लड़ना पड़ता है। हज़ारो लड़कियों को हर साल इसलिए घर में बिठा लिया जाता है क्योंकि उनका मासिकधर्म शुरू होगया है और परिवार वाले नहीं चाहते की अब वो बाहर निकले। छोटी उम्र में विवाह कर दिया जाता है ताकि वो बस घर परिवार और बच्चों में खो कर अपना जीवन अपनी इच्छाये और महत्वकांक्षाओ को भूल जाये।

बहुत जरुरी है की इन समस्याओ के हल के लिए युवा आगे आये। वैसे हम अक्सर ही आह्वान युवाओ से ही करते है परंतु एक युवा के व्यक्तिव को बनाने में उनके बड़ो का बहुत बड़ा योगदान होता है इसलिए यह भी बहुत आवश्यक है की बड़े लोग भी अपना नजरिया बदले ताकि वो छोटो को एक बेहतर नजरिया दे सके। नजरिया स्त्रियों लड़कियो बच्चियो को देखने का। उन्हें एक लिंग विशेष नहीं इंसान समझने का। यह समझने का की उनकी भी इच्छाये आवश्यकताये और महत्वकांक्षाये है। वो भी अपने अस्तित्व को उतना ही प्यार करती है जितना कोई पुरुष। वो भी अपने माँ बाप का नाम पूरी दुनियाँ में रोशन करना चाहती है। वो भी चाहती है की लोग उनसे उनसे सम्बंधित लोगो को पहचाने। जिस प्रकार एक डॉक्टर की पत्नी को इस बात का गर्व होता है की वो कुछ भी न करते हुए भी अपने पति के सम्मान को अपना सम्मान समझती है बिना हीनभावना से ग्रस्त हुए वैसे ही उसका पति भी उसे उसकी पहचान को अपनाये। बहन को भाई से आगे बढ़ने पर भाई भी बहन की योग्यता में वही सम्मान महसूस करे जो बहन भाई की सफलता पर करती है। माँ बाप बेटियो को बेटो से कम न आंके उन्हें भी वही प्यार सम्मान और आजादी दे जो वो अपने बेटो को देते है। यह सिर्फ इसलिए जरुरी नहीं की यह लड़कियों को आगे बढ़ने में सहयोग देगा बल्कि इसलिए भी जरुरी है की समाज की तरकि के लिए जरुरी है की समाज का हर पहलु उसमे योगदान दे और आधी आबादी जब तक खुल कर इसमें भागीदारी नहीं देगी तब तक यह मुमकिन नहीं।

 विनीता

पुष्पांजलि बाग़,दयाल बाग़, आगरा।

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