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गुड्स एंड सर्विस टैक्स (GST)

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कौटिल्य की अमूल्य रचना अर्थशास्त्र के अनुसार, कर ऐसा हो कि व्यापार और उद्यम पर अंकुश न लगे, वाणिज्य में सुगमता हो और कर दो बार न लगे। कौटिल्य ने चेतावनी दी थी कि यदि इन सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ, तो व्यापारी दूसरे राज्यों में चले जाएंगे। वैश्वीकरण के युग में तो कौटिल्य की नसीहत और भी सार्थक है। वर्ष 2000 में वाजपेयी सरकार ने वर्तमान करों को हटाकर वस्तु एवं सेवा कर कानून (जीएसटी) का मॉडल तैयार करने के लिए राज्यों के वित्त मंत्रियों की सशक्त समिति (एम्पावर्ड कमेटी) बनाई। पश्चिम बंगाल के वित्त और एक्साइज मंत्री असीम दासगुप्त उस समिति के अध्यक्ष थे। यूपीए सरकार के वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने आर्थिक सुधार की इस मुहिम को आगे बढ़ाया। वर्ष 2006-07 के बजट में उन्होंने घोषणा कि जीएसटी कानून को एक अप्रैल, 2010 से लागू किया जाएगा। फिर राज्यों के वित्त मंत्रियों की एक समिति बनी और उस समिति ने जाने-माने अर्थशास्त्री केलकर की अध्यक्षता में एक संयुक्त कार्य बल बनाया। गहन चर्चा और विचार-विमर्श के बाद जीएसटी कानून का मसौदा तैयार हुआ, पर आर्थिक सुधार की यह बड़ी पहल राजनीतिक भंवर से बाहर न आ सकी।

सोलहवीं लोकसभा में इस मुद्दे पर फिर मंथन हुआ। राज्यों की चिंताओं का समाधान यह निकाला गया कि जिन राज्यों को संभावित राजस्व हानि होगी, उन्हें केंद्र सरकार मुआवजा देगी। इससे राज्यों में सहमति बनी। विगत 29 मार्च को लोकसभा और पांच अप्रैल को राज्यसभा ने चार जीएसटी कानून पारित किए। एक कर का मतलब यह नहीं है कि आम जरूरत की वस्तुओं, सेवाओं और विलासिता की वस्तुओं पर टैक्स की एक ही दर होगी। वस्तुओं और सेवाओं की प्रकृति और उपभोक्ताओं को देखते हुए कर की भिन्न-भिन्न दरें शून्य, 5, 12,18 और 28 प्रतिशत है। विलासिता की वस्तुओं तथा स्वास्थ्य और वातावरण के लिए हानिकारक चीजों पर दर उससे भी अधिक है। केंद्रीय वित्त मंत्री, सारे राज्यों के वित्त मंत्री तथा राजनीतिक दल प्रशंसा के पात्र हैं कि उन्होंने अभूतपूर्व निर्णय लेकर राष्ट्र को एक कर सूत्र में बांधने की अनुकरणीय मिसाल पेश की।

जीएसटी लागू होने के बाद वस्तुओं और सेवाओं पर अलग-अलग लगने वाले सभी कर एक ही में समाहित हो जाएंगे। इससे पूरे देश में वस्तुओं और सेवाओं की कीमत लगभग एक हो जाएगी। जीएसटी की मूल भावना है समान टैक्स व्यवस्था से राज्यों में टैक्स प्रशासन को सरल बनाते हुए देश को एक साझा बाजार में तब्दील करना, जिससे उत्पादन, कारोबार और सेवा क्षेत्र समेत संपूर्ण अर्थव्यवस्था का विकास हो।जीएसटी केंद्र राज्यों में लागू 20 से अधिक अप्रत्यक्ष करों के एवज में लाया जा रहा है। किंतु नई व्यवस्था में कारोबारियों को तीन स्तरीय टैक्स प्रणाली के तहत सीजीएसटी (सेंट्रल), एसजीएसटी (स्टेट) एवं आईजीएसटी (इंटीग्रेटेड) राज्यों में अलग-अलग पंजीकरण के साथ कई तरह के रिटर्न भरने होंगे। यह दावा किया जा रहा है कि ‘जीएसटी नेटवर्क संस्था’ तैयार है जो केंद्र तथा राज्यों के डैटाबेस को आपस में जोड़ेगी परंतु इन सबसे क्या आम व्यापारी की कंप्लायंस कास्ट नहीं बढ़ जाएगी?

भारत में 55 फीसदी आबादी कृषि क्षेत्र पर निर्भर है, परंतु उसे जीडीपी का 15 फीसदी लाभ ही मिलता है, जिससे खेती में और अधिक रोजगार की संभावना नहीं है। सरकार का विश्वास है कि जीएसटी के सुधारों से एकीकृत बाज़ार के माध्यम से 50 लाख मध्यम और छोटे उद्योगों का विकास होगा और जीडीपी में 2 फीसदी की बढ़ोतरी और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन हो सकेगा। दूसरी ओर राज्यों द्वारा कई टैक्स खत्म करने पर अनावश्यक कर्मचारियों की छंटनी करने की भी नौबत सकती है। विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के दौर में भी बड़े रोजगार सृजन का सब्जबाग दिखाया गया था, जो अंततः उद्योगपतियों द्वारा जमीन हड़पने का जरिया बन गया।

सरकार द्वारा विदेशी निवेशक संस्थानों के 42 हजार करोड़ से अधिक के टैक्स माफ करने और भविष्य में टैक्स लगाने के अनुबंधों को लागू करने के बाद अब जीएसटी के माध्यम से विदेशी निवेशकों के लिए अनुकूल आर्थिक माहौल प्रदान किया जा रहा है। किंतु जीएसटी के माध्यम से किए जा रहे आधे-अधूरे सुधारों से विदेशी निवेशकों का उत्साह तो भंग होगा ही, उसके अलावा घरेलू उत्पादकों की प्रतिस्पर्द्धात्मक क्षमता भी कमजोर हो सकती है। राज्यों के कर-राजस्व में कमी हो सकती है जिसका बोझ जनता पर ही पड़ेगा जो आर्थिक विषमता क्षेत्रीय असंतुलन को बढ़ा सकता है।

साथ हि जम्मू-कश्मीर अकेला राज्य है, जहां 1 जुलाई से जीएसटी लागू नहीं हो सका। पीडीपी-बीजेपी गठबंधन वाली मुफ्ती सरकार का कहना है कि इस टैक्स व्यवस्था पर आम राय बनाने के लिए बातचीत जारी है।

ज्ञातव्य हो कि शनिवार से लागू होने वाले गुड्स एंड सर्विस टैक्स से केंद्र सरकार ने पांच चीजों को इसके दायरे से बाहर रखा है। इनमें सभी प्रकार की शराब, पेट्रोल,डीजल, हवाई यात्रा के लिए इस्तेमाल होने वाले एविएशन फ्यूल और बिजली शामिल है। इनको जीएसटी से बाहर रखने की सबसे बड़ी वजह है कि केंद्र और राज्य सरकार को सबसे ज्यादा कमाई इन्हीं से होती है।

पेट्रोल-डीजल पर अभी वैट और अन्य टैक्स मिलाकर के 57 फीसदी टैक्स लगता है। अगर इनको 28 फीसदी के स्लैब में रखा तो केंद्र, राज्य की कमाई पर काफी असर पड़ेगा। इसलिए फिलहाल इनको जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है।

शराब एक और ऐसी कमोडिटी है जिसको बेचने पर सरकार को दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा कमाई होती है। जीएसटी काउंसिल पर राज्यों के वित्तमंत्रियों ने इसको भी जीएसटी के दायरे से बाहर रखने पर सहमति जताई थी। वहीं शराब बनाने के लिए प्रयोग में आने वाले कच्चे माल को 5 से 18 फीसदी के स्लैब में रखा है, जिससे इनपुट कॉस्ट बढ़ जाएगी। इस इनपुट कॉस्ट से कंपनियों के मार्जिन पर असर पड़ेगा, जिससे कंपनियों के लिए दाम बढ़ाना उनकी मजबूरी हो जाएगी।

अगर शराब को जीएसटी के दायरे में लाना होगा तो इसके लिए केंद्र सरकार को संविधान में संशोधन करना होगा। यह सबसे बड़ा कारण हैं जिसके कारण शराब अगले तीन-चार सालों तक जीएसटी के दायरे से बाहर रहेगी। सरकार भी अभी शराब को जीएसटी के दायरे में रखना चाहेगी, क्योंकि अगर यह जीएसटी के दायरे में आया तो केंद्र व राज्य दोनों की आर्थिक तौर पर कमर टूट जाएगी।

बिजली मंत्री पीयूष गोयल ने साफ किया कि जीएसटी के बाद देश में बिजली की दर में कोई वृद्धि की संभावना नहीं है. बिजली, कोयला खान और नवीकरणीय उर्जा क्षेत्र से जुड़े उद्योग के साथ बैठक के बाद गोयल ने कहा, मुझे जीएसटी लागू होने के कारण बिजली की दर में किसी वृद्धि की संभावना नजर नहीं आती. प्रति यूनिट बिजली में एक या दो पैसे का अंतर आ सकता है.

उन्होंने कहा कि दो-तीन मुद्दे उठाए गए जिसे जीएसटी परिषद की अगली बैठक में रखा जाएगा. उनमें से एक फ्लाईएश से बने उत्पाद पर कर से जुड़ा है. फ्लाईएश तापबिजली आधारित बिजली संयंत्रों का सह उत्पाद है. उन्होंने कहा कि उद्योग एसोसिएशन ने जीएसटी क्रियान्वयन  को स्थगित करने की कोई मांग नहीं की है और सभी नयी व्यवस्था से संतुष्ट हैं.

 

 

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