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गोरखालैंड की मांग को लेकर दार्जिलिंग में चल रहा आंदोलन उग्र

गोरखालैंड की मांग को लेकर दार्जिलिंग में चल रहा आंदोलन उग्र

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क्या है गोरखा विवाद? अलग गोरखालैंड की मांग क्यों?

पिछले कई दिनों से अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर दार्जिलिंग में चल रहा आंदोलन उग्र होता जा रहा है। पश्चिम बंगाल के पहाड़ी इलाके में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) लगातार धरना-प्रदर्शन कर रहा है। एक अलग गोरखालैंड राज्य की मांग बहुत पुरानी है लेकिन ताजा विवाद गोरखा इलाकों में बांग्ला भाषा की पढ़ाई को सरकारी स्कूलों में अनिवार्य किए जाने के फैसले के विरोध में शुरू हुआ। हालांकि आंदोलन के बाद बंगाल सरकार अपने पुराने रुख से पीछे हट गई है लेकिन अब मांग अलग राज्य तक पहुंच चुकी है।

क्या है विवाद की वजह?

दार्जिलिंग में जो वर्तमान संकट है उसकी वजह है लोगों में इस बात का डर पैदा होना कि अब स्‍कूलों में बंगाली भाषा पढ़ाई जाएगी। दार्जिलिंग में बड़ी संख्‍या नेपाली भाषा बोलन वाले गोरखा समुदाय की है। वर्ष 1961 में नेपाली भाषा को पश्चिम बंगाल में आधिकारिक भाषा का दर्जा मिला था। वर्ष 1992 में नेपाली को भारत की एक आधिकारिक भाषा माना गया।

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा यानी जीजेएम ने डर की वजह से एक बार फिर 100 वर्ष पुरानी मांग को लेकर प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। हिलमैंस एसोसिएशन ने 1907 में मिंटो-मोर्ले कमीशन को ज्ञापन देकर दार्जिलिंग को स्वायत्त प्रशासनिक इकाई का दर्जा देने की मांग की थी। जीजेएम इसी बात को आगे बढ़ाकर एक अलग गोरखालैंड की मांग कर रहा है। इसके मुखिया बिमल गुरुंग ने एक अज्ञात स्‍थान से अपने समर्थकों से आखिरी लड़ाई लड़ने की अपील की है।

वर्ष 1980 से जारी है विवाद:

वर्ष 1980 में सुभाष घीसिंग ने पहली बार देश में गोरखालैंड के लिए आवाज उठाई थी। उस समय भी ऐसा ही विरोध प्रदर्शन हुआ और करीब 1200 लोगों की मौत हुई थी। यह संघर्ष आठ वर्षों बाद यानी 1988 में तब खत्‍म हुआ जब दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल यानी डीजीएचसी का गठन हुआ। डीजीएचसी पिछले 23 वर्षों से दार्जिलिंग में मौजूद है और शासन कर रही है।

घीसिंग अलग गोरखालैंड राज्य की मांग से पीछे हटते हुए दो दशकों तक पर्वतीय परिषद के मुखिया रहे, किंतु वह विकास करने में विफल रहे और करोड़ों रुपये की आर्थिक गड़बड़ी के आरोपों से भी घिर गए।

2007 में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर अस्तित्व में आया और जल्द ही पूरे दार्जिलिंग में उसकी तूती बोलने लगी। विमल गुरुंग उसके सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में उभरे। उनके नेतृत्व में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने 2007 से 2011 के पूर्वार्ध तक जंगी आंदोलन चलाया। छह साल पहले बनर्जी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद जीजेएम को जंगी आंदोलन स्थगित करने पर विवश किया।

2011 में गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) समझौता हुआ और मार्च, 2012 में दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद को खत्म कर गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) का गठन किया गया। 29 जुलाई, 2012 को उसका चुनाव हुआ था। 45 सीटों वाले जीटीए के चुनाव में जीजेएम को एकतरफा जीत मिली थी।

जीजेएम को समझना चाहिए कि हिंसा का सहारा लेकर वह जब तक आंदोलन करेगा तब तक राज्य सरकार को हिंसा से निपटने के लिए पुलिस बल के प्रयोग का बहाना मिलता रहेगा, क्योंकि कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी अंतत: राज्य सरकार की है। इसलिए उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से अपना आंदोलन चलाना चाहिए। मुख्यमंत्री को भी याद रखना चाहिए कि अलगाववादी आंदोलनों से निपटने के लिए सरकारें जब बल प्रयोग करती हैं तब परिस्थिति और जटिल होती है, जबकि समझौते से शांति कायम होने की राह खुलती है।

This post was written by Rajni Raman.

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