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चिलकोट रिपोर्ट
चिलकोट रिपोर्ट : कभी-कभी मच्छर को मारने के लिये तोप का इस्तेमाल किया जाता है

चिलकोट रिपोर्ट : कभी-कभी मच्छर को मारने के लिये तोप का इस्तेमाल किया जाता है

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चिलकोट रिपोर्ट: च्यूँटी तक नहीं काटती -शिवार्थ

पाठकों की जानकारी के लिए – चिलकोट जांच कमेटी या इराक जांच कमेटी ब्रिटिश सरकार द्वारा इराक युद्ध में भागीदारी की जांच पड़ताल करने के लिए बनायी कमेटी थी। ये 2009 में बनी थी व 2016 में इसने अपनी रिपोर्ट को सार्वजनिक किया।

लेख का एक अंश – क्या किसी भी देश को एक दूसरे सम्प्रभु देश पर जबरन हमला करने का अधिकार सिर्फ इस बात से प्राप्त हो जाता है कि फलाँ देश के पास जानलेवा हथियार है। इस आधार पर तो सबसे पहले हमला अमेरिका और ब्रिटेन पर होना चाहिए, क्योंकि उनके पास रासायनिक ही नहीं बल्कि उससे भी कई गुना खतरनाक परमाणु और अन्य किस्म के हथियार हैं। दरसल इस तर्क का मकसद अमेरिकी-आंग्ल साम्राज्यवाद के एक विचलन को प्रस्तुत करने का प्रयास करते हुए (जो दरअसल साम्राज्यवाद के तर्क को ही पुष्ट करता है और उसकी स्वाभाविक चेतस तार्किकता का अंग है) अरब देशों में दशकों से जारी उनके इस साम्राज्यवादी मुहिम को सवालों से परे करना है।
अगर तीन वाक्यों में ब्रिटिश भद्रजन सर्रर्रर…जेम्स चिलकोट की रिपोर्ट समेटनी हो तो …
सर जेम्स चिलकोट: तथ्यों और आँकड़ों के मद्देनज़र ऐसा प्रतीत होता है कि इराक पर हमले के लिये माननीय टोनी ब्लेयर महोदय आपके पास पर्याप्त कारण मौजूद नहींं थे। आपने ब्रिटेनवासियों के साथ थोड़ा छल किया जो कि देखने पर ऐसा लगता है, ठीक नहींं था…आपको थोड़ा और सोचना चहिये था।
टोनी ब्लेयर (अपनी गर्दन को बायेँ तरफ मोड़कर): हूँ …अगर मुझे आज भी मौक़ा मिले तो मैं वही करूँगा। क्या कर लोगे चिलकोट ?????
इराकी नागरिक के रूप में आकाशवाणी: वही जो हम पिछले तेरह सालों से कर रहे हैं… तुम्हारी नाक में दम!!!!
ज्यादातर पाठकों को ज्ञात होगा कि ब्रिक्ज़िट रेफरेण्डम के दस दिनों बाद यानि 6 जुलाई, 2016 को बारह खण्डों में, करीब बीस लाख शब्दों में एक लाख पचास हज़ार दस्तावेजों का अध्ययन करते हुए, एक सौ पचास गवाहों का  बयान दर्ज करते हुए और करीब एक करोड़ यूरो (यानि करीब 80 करोड़ रूपए) के खर्च में ब्रिटिश कानूनविद और पत्रकार सर जेम्स चिलकोट नें ब्रिटिश संसद में इराक में अमेरिका, ब्रिटेन और नाटो के अन्य सदस्य देशों द्वारा 2003 में किये गये हमले सम्बन्धी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
चिलकोट इन्क्वायरी की शुरुआत टोनी ब्लेयर के बाद सत्तासीन हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री श्रीमान गॉर्डोन ब्राउन द्वारा 2009 में की गयी थी। (क्या आपको भी बाबरी मज़्जिद ध्वंस को लेकर 1992 में गठित लिब्राहन कमीशन  की याद आ रही है???? मुझे भी!!!!) कभी-कभी मच्छर को मारने के लिये तोप का इस्तेमाल किया जाता है; यह अलग बात है कि मच्छर इससे मरता नहींं, आवाज़ सुनकर उड़ जाता है!! इससे पहले भी 2003 से लेकर 2009 के बीच इस मुद्दे को लेकर और तीन कमेटियों नें भी अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी और भविष्य में शायद और भी करेंगी। लेकिन हाथी की लीद का क्या है वो पाँचवीं, छठी और सातवीं बार भी वैसी ही होगा। बस रंग और मात्रा में फर्क हो सकता है!!
*अगर लुब्बे-लुबाब इस रिपोर्ट की चर्चा की जाये तो, यह कहती है कि सयुंक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद की अवहेलना करते हुए ब्रिटेन ने अमेरिका के साथ मिलकर, 2003 में इराक पर जो हमला किया वो न्यायसंगत नहींं था।* इससे ब्रिटेन को सामरिक दृष्टि से कोई लाभ नहीं हुआ बल्कि जान-माल की भारी क्षति हुई और उसने अमेरिका की शह पर पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाते हुए इस युद्ध में भागीदारी की। इससे ज्यादा अस्सी करोड़ रूपये के खर्च से तैयार बीस लाख शब्दों वाली इस रिपोर्ट की तफ़सीलों में जाना स्याही बर्बाद करना होगा।
इस टिप्पणी का मकसद यह है भी नहीं, मेरा मकसद उन निष्कर्षों की तरफ इशारा करना जिनको यह रिपोर्ट ढाँकना-तोपना चाहती है, और किसी भी अन्य सरकारी रिपोर्ट की तरह विषायान्तर करना चाहती है। जैसा की जेम्स चिलकोट ने इस रिपोर्ट को प्रस्तुत करते हुए अपने बीस मिनट के भाषण में कहा कि, इस बात के पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे कि इराक में सद्दाम हुसैन के पास दुनिया को क्षति पहुँचाने वाले रासायनिक हथियार मौजूद थे। इसलिये यह हमला “सही” नहीं था। और इसलिये टोनी ब्लेयर ब्रिटिश संसद और वहाँ की जनता को धोखे में रखने के दोषी हैं। लेकिन इस तर्क के आधार पर क्या किसी भी देश को एक दूसरे सम्प्रभु देश पर जबरन हमला करने का अधिकार सिर्फ इस बात से प्राप्त हो जाता है कि फलाँ देश के पास जानलेवा हथियार है। इस आधार पर तो सबसे पहले हमला अमेरिका और ब्रिटेन पर होना चाहिए, क्योंकि उनके पास रासायनिक ही नहीं बल्कि उससे भी कई गुना खतरनाक परमाणु और अन्य किस्म के हथियार हैं। दरसल इस तर्क का मकसद अमेरिकी-आंग्ल साम्राज्यवाद के एक विचलन को प्रस्तुत करने का प्रयास करते हुए (जो दरअसल साम्राज्यवाद के तर्क को ही पुष्ट करता है और उसकी स्वाभाविक चेतस तार्किकता का अंग है) अरब देशों में दशकों से जारी उनके इस साम्राज्यवादी मुहिम को सवालों से परे करना है। मसलन बॉस को थोड़ा और विनम्रता से पेश आना चाहिए था, यह कहते ही हम “बॉस” के रिश्ते को स्वीकारोक्ति प्रदान कर देते हैं। उसके बाद उन्होंने क्या किया यह दोयम सवाल है।
दूसरी बात, जो यह रिपोर्ट करती है वह यह कि इस हमले की पूरी जिम्मेदारी एक खलनायक टोनी ब्लेयर (और  जॉर्ज बुश) के ऊपर मढ़कर पूरी पूँजीवादी मशीनरी और बुर्ज़ुआ संसदीय लोकतंत्र को बरी कर देती है। पहली बात तो यह की इस हमले का प्रस्ताव ब्रिटिश हाउस ऑफ़ कॉमन्स में भारी बहुमत से पारित हुआ था। यह सिर्फ ब्लेयर महोदय कि निजी आकांक्षा का मसला नहीं था। दूसरे अगर इतनी भारी संख्या में जनता के “चुने हुए” प्रतिनिधियों ने जान-बूझकर इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया और इराक में हुए इस नरसंहार के दोषी हैं तो आखिर क्या है जो इनके ख़िलाफ़ कानूनी कार्यवाही नहीं की जानी चाहिए??? इस पर सर चिलकोट सरीखे सारे मानवतावादियों को साँप सूँघ जाता है। दरअसल अगर पूँजीवाद के पूरे इतिहास पर एक सरसरी निगाह दौड़ाई जाए तो इसके उदय से लेकर साम्राज्यवाद के दौर का इतिहास युद्धों से भरा पड़ा है। इस विषय में मार्क्स द्वारा टी.जे.डनिंग की किताब ट्रेड-यूनियंस एण्ड स्ट्राइक्स से उद्धृत यह टिपण्णी सटीक लगती है:“एक समीक्षक के मुताबिक पूँजी उथल-पुथल और कलह से भागती है और कायर होती है,जो एकदम  ठीक बात है। लेकिन यह अधूरी बात है। जब एकदम मुनाफा न हो, या बहुत कम हो तो पूँजी इसे वैसे ही दुत्कारती है जैसे पहले कहा जाता था कि प्रकृति निर्वात से घृणा करती है। अगर मुनाफा पर्याप्त हो तो पूँजी निडर हो जाती है। 10 प्रतिशत मिले तो यह कहीं भी लगाई जा सकती है; 20 प्रतिशत पक्का हो तो तीव्र इच्छा जन्म लेती है; 50 प्रतिशत पर निश्चित दुस्साहस; 100 प्रतिशत के लिये सभी मानवीय नियमों को रौंद डालने के लिये तैयार हो जाएगी; अगर 300 प्रतिशत मिलने वाला हो तब ऐसा कोई अपराध नहीं जिसे करने में यह हिचकेगी, ऐसा कोई जोखिम नहीं जो यह नहीं उठाएगी, चाहे इसके मालिक को फाँसी हो जाने का डर क्यों न हो। अगर उथल-पुथल और कलह से मुनाफा मिले तो यह बेहिचक दोनों को बढ़ावा देगी। तस्करी और गुलामों के व्यापार ने यहाँ कहीं सभी बातों को सही साबित कर दिया है।” जैसा की ऊपर उद्धृत टिप्पणी में साफ़ तौर पर इंगित किया गया है, कि पूँजीवादी युग में मुनाफे के लिये जारी अन्धी हवस की दौड़ में युद्ध महज़ एक और रास्ता है। इराक में 2003 में हुए इस हमले के केंद्र में भी था यूरो-डॉलर के बीच विश्व व्यापार की मुद्रा बनने के लिये जारी जद्दोजहद। दुनिया के कुल तेल भण्डार के 16 प्रतिशत के मालिक इराक का सबसे बड़ा “गुनाह” वस्तुतः यह था कि उसने नवम्बर 2000 में तेल व्यापार के लिये डॉलर के बजाय यूरो को मुद्रा के रूप में अपना लिया था और सामान्यतः यूरो इसके विदेश व्यापार की मुख्य मुद्रा बन गया था। अकेले इराक के इस निर्णय के चलते, उस दौर में जिस यूरो की कीमत अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले 82 सेण्ट थी, वह बढ़कर 1.5 डॉलर हो गयी थी और यूरो पहली बार डॉलर को चुनौती देने की स्थिति में आ खड़ा हुआ था। अमेरिका के लिये यह भंयकर था कि कल को यदि एक-दो और तेल सम्पदा से सम्पन्न क्षेत्र भी ऐसा करने लगते तो लगातार घाटे का शिकार रहने वाली अमेरिकी अर्थव्यस्था को भारी क्षति पहुँचती और उसके बाद उसकी वैश्विक चौधराहट में सेंध लगनी शुरू हो जाती। इसलिये इराक को “सबक” सिखाना ज़रूरी था। महज़ इतना ही नहीं बल्कि मध्य-पूर्व का पूरा क्षेत्र जो कभी मिस्र और मेसोपोटामिया  सरीखी उन्नत सभ्यताओं के लिये जाना जाता था उसे पश्चिमी साम्राज्यवाद ने पिछले 150 सालों के दौरान तेल पर कब्ज़ा कायम करने के लिये अपना आखेट-गृह बना रखा है। जो तेल सम्पदा वहाँ के जनता की सम्पत्ति थी उस पर अधिकार प्राप्त करने के लिये ब्रिटिश पेट्रोलियम, रॉयल डच शैल सरीखे तेल कम्पनियों और इनके संरक्षक देशों के बीच जारी अन्तर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा ने इस क्षेत्र के जनता पर जितने कहर ढाये हैं वह किसी गैर-अरब देश के नागरिक के लिये समझ पाना बेहद ही मुश्किल है।1991 में कुवैत की सुरक्षा की आड़ में इराक पर हमला और 2003 में यह हमला और उसके बाद से लगातार जारी विध्वंस इस अन्तर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा की एक और कड़ी है। इस पर चिलकोट साहब मौन धारण करके रखते हैं, मानो 2003 में जो हुआ वह एक भूल थी बाकी तो सदा से सब कुछ ठीक ही था।
तीसरा बड़ा पहलू, जिसे यह रिपोर्ट बिल्कुल नज़रअन्दाज़ कर देती है, लेकिन जो कि इसके उजागिर होने के पीछे एक बड़ा कारण है; वह यह कि अमेरिका और ब्रिटेन सहित इस पूरे साम्राज्यवादी गुट को इस युद्ध के शुरूआती दिनों से ही जान-माल का भारी नुकसान सहना पड़ा है। प्रधानमन्त्री गॉर्डोन ब्राउन द्वारा इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिये चिलकोट समिति को गठित करने के पीछे एक बड़ा कारण था उन परिवारों द्वारा जिनके घरों के लोग ब्रिटिश सेना की तरफ से लड़ते हुए मारे गये थे, लगातार जारी देशव्यापी प्रदर्शन थे। बुर्ज़ुआ मीडिया की लाख लीपा-पोती के बावजूद आज यह एक स्थापित तथ्य है कि अपनी असीमित सैन्य क्षमताओं के बावजूद अमेरिका और ब्रिटेन यह युद्ध जीत नहींं सके हैं, और कई जगहों पर उन्हें पीछे हटना पड़ा है। इसका यह आशय नहींं है कि इराकी जनता इस युद्ध में विजयी रही है, लेकिन करीब दस लाख लोगों की कुर्बानी देकर भी उसने आज तक हार नहीं स्वीकार की है।
आज इराक युद्ध के 13 साल बाद यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दुनिया 2003 से काफी आगे बढ़ चुकी है। हर आने वाले साल के साथ मध्य-पूर्व का संकट और गहराता हुआ नज़र आता है, और यहाँ कि जनता अमेरिकी-आंग्ल साम्राज्यवाद को चैन से न जीने की अपनी जिजीविषा को जीते हुए दिखायी पड़ती है। यह उम्मीद ज़रूर की जा सकती है कि, पूँजीवाद को इतिहास की कचरापेटी के हवाले करने के बाद समाजवादी युग में जब अरब देशों के इस दौर का एक वस्तुगत इतिहास दर्ज किया जायेगा तो जहाँ आततायियों के खूनी पंजो की बात होगी, स्त्रियों और अजन्मे बच्चों की वेदनाएँ होंगी वहीं हर दिन, हर पल हार न स्वीकार करने वाले इन सच्चे वीरों की भी कहानियाँ होंगी, मानवता को कभी हार न मानने की प्रेरणा देने वाली शौर्यगाथाएँ होंगी, खून और आँसुओ से लिखी हुई कवितायें होंगी।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान

 

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