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जब मुफ्त में नमक नहीं मिलता, कोई करोड़ों की पूंजी लगाकर मुफ्त का अखबार और समाचार क्यों देता है?

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आप दुकानदार से नमक मांगते हैं, आप उम्मीद करते हैं आपको नमक ही मिलेगा।
आप नमक खरीदने दुकान जाते हैं। दुकान में नमक नहीं हो तो आप क्या करते हैं? मैं दूसरी दुकान जाता हूं। आप भी ऐसा ही करते होंगें।

आप जब कभी नमक लेने जाएं, और आपको नमक मिले ही नहीं। आप उस दुकान पर जाना छोड़ देंगे।
नमक नहीं मिलने पर आप दुकान जाना छोड़ सकते हैं। टीवी, अखबार और वेबसाइट पर आपको ‘खबर’ नहीं मिलती। फिर भी टीवी देखना, अखबार खरीदना और वेबसाइट पर जाना क्यों नहीं छोड़ते?
टीवी देखने और वेबसाइट पर खबर पढ़ने के लिए अलग से पैसै नहीं देने होते इसलिए, 2-4 रुपये में 20 पन्ने का अखबार मिल जाता है। या आपको इसकी आदत लग गयी है।
बावजूद, आप न्यूज मीडिया को सोशल साइट्स पर गालियां देते हैं। सभा-सेमिनारों में आप न्यूज मीडिया को कोसते हैं।
“मीडिया सच नहीं बताता।“
“मीडिया गांव नहीं जाता।“
“मीडिया राजनेताओं का गुलाम है।“
“ये बिकी हुई मीडिया आपको सच नहीं दिखाएगा।“
“संघी मीडिया”
“कम्युनिस्ट मीडिया”
“गोदी मीडिया”
… आपके पास लंबी लिस्ट है, मीडिया को कठघरे में रखने के लिए।
न्यूज मीडिया क्यों सच नहीं बता पाता, वह क्यों राजनेताओं की गुलाम हो गया। क्यों वह संघी और कम्युनिस्ट हो गया। मीडिया की साख क्यों गिर रही है। वह चंद लोगों की खबरे ही क्यों दिखाता है। इसमें सिर्फ मीडिया का ही दोष नहीं है।
देश में 1,05,4431 समाचार पत्र और पत्रिकाएं रजिस्टर्ड हैं। संभव है, ज्यादातर अखबार, पत्रिकाएं सिर्फ ‘कागज’ पर ही हों। फिर भी आपके पास विकल्पों की कमी तो नहीं!
पूरी दुनिया के उलट आपको करीब-करीब मुफ्त में अखबार मिलता है। आपको वेबसाइट पर खबर पढ़ने के लिए पैसा नहीं देना पड़ता। फिर भी भारत उन चंद देशों में एक है जहां बाकी न्यूज मीडिया के साथ प्रिंट मीडिया भी फायदे में है।
एक नेशनल न्यूज पोर्टल चलाने का खर्चा करोड़ रुपया आता है। अखबार या टीवी चैनल चलाना किसी बड़े औद्योगिक घराने के लिए ही संभव है। इतनी बड़ी पूंजी लगने के बाद भी आपको ‘मुफ्त’ में खबर कैसै मिल पाती है? कई बार अखबार लेने पर मोबाइल, बरतन, घड़ी भी मिलते हैं। ये अलग फायदे हैं।
जब मुफ्त में नमक नहीं मिलता, कोई करोड़ों की पूंजी लगाकर मुफ्त का अखबार और समाचार क्यों देता है?
न्यूज मीडिया उद्योग में करोड़ो रूपये लगे हुए हैं। राजनेता, कॉरपोरेट, माफिया और डॉन अपने एजेंडे को पूरे करने के लिए इन न्यूज मीडिया हाउस के शेयर होल्डर बनते हैं। खरीद भी लेते हैं। संपादक और पत्रकार अपने मालिक के एजेंडे को पूरा करते हैं। पूरा करने के लिए मजबूर किए जाते हैं। विरोध करने पर निकाले भी जाते हैं। आखिर कोई भी बेरोजगार होना नहीं चाहता!
न्यूज मीडिया जब टीवी और अखबार से चलकर वेबसाइट पर पहुंचा तो विज्ञापन का हिसाब बदल गया। वेबपोर्टल चलाना कम पूंजी और खर्च में संभव हुआ। पाठक को राजा बनने का मौका मिला। लगा कि कॉरपोरेट-राजनेता-माफिया का न्यूज मीडिया से कब्जा खत्म हुआ। लोकहित की बात आप पढेंगे। जो पढ़ेगे वही लिखा भी जाएगा। लेकिन हुआ उल्टा, नयी वाली न्यूज मीडिया लाइक, शेयर और विजिट बनाने के चक्कर में और पतित हो गई।
ऑनलाइन मीडिया को आसानी से पता चल जाता है कि ‘लोग’ क्या पढ़ना चाहते है। उनकी ‘पसंद’ क्या है। किस न्यूज स्टोरी, फीचर और आर्टिकल को कितने लोगों ने देखा और पढ़ा है। यह सब लाइव पता चलते रहता है। न्यूज मीडिया उसी तरह के कंटेट आपके बीच लाते हैं, जिसे आप सबसे ज्यादा देखते और खोजते हैं।
आप किसी न्यूज मीडिया पर जाना छोड़ देगें तो वे अपने छुपे एजेंडे को भी पूरा नहीं कर पाएंगे। आप अपनी ताकत पहचानिये।
लोग क्या पढ़ना सुनना और देखना चाहते हैं? यह जानने के लिए कभी यू-ट्यूब ट्रेंड देखिये पता चल जाएगा।
अखबार मालिक की अपनी मजबूरियां और एजेंडे हो सकते हैं। वहां राजनेताओं, कॉरपोरेट और खनन माफिया के करोड़ो रुपये लगे हैं। सम्पादक अपने मालिक के दवाब में हो सकता है। लेकिन आपके पास क्या मजबूरी है? आप हर शाम वही टीवी चैनल क्यों देखते हैं। अखबार क्यों नहीं बदलते? इसलिए, क्योंकि इनकी आदत पड़ चुकी है?
आप समाचार नहीं चाहते। आप अपनी पसंदीदा पार्टी की आलोचना सुनने का धैर्य खो चुके हैं। इसलिए आपको वही एंकर और चैनल अच्छा लगने लगा है जो सिर्फ आपके मन की बात करता हो। किसी पार्टी की गतिविधि को पढ़ने के लिए उसका मुखपत्र होता है। न्यूज मीडिया, मुखपत्र का विकल्प नहीं हो सकता। आप किसी समाचार या लेख के पसंदीदा हिस्से को शेयर करते हैं। पूरा समाचार या लेख आपको पसंद नहीं। तो खबरें भी एक एकतरफा बनने लगीं। ताकि उसे आप शेयर करें। इससे विजिट बढ़ेंगे। विजिट होगा तो विज्ञापन मिलेगा।
ग्रामीण भारत की खबरें एक फीसदी भी मुख्य पृष्ठ पर जगह नहीं पाती। क्योंकि ऐसी खबरों को पढ़ने वाले बहुत कम हैं। इंटरनेट पर आम लोगों के सरोकार की खबरों की कमी नहीं, उसे पढ़ने वालों की कमी है। आप जैसा पढ़ना चाहेंगे, वैसा लिखा जाएगा। कम-से-कम दबाव तो जरूर बनेगा।
आम लोगों के सरोकारों से जुड़े दर्जनों पोर्टल और पत्रिकाएं पैसे के अभाव में बंद हो जाते हैं। वे किसी राजनेता या कारपोरेट की वकालत नहीं करते हैं। सरकार की आलोचना करने वाले अखबारों का विज्ञापन बंद कर दिया जाता है। जनसरोकारों की बात करने वाले छोटे-छोटे मीडिया समूह आपकी मदद के बगैर नहीं चल सकते। आम लोगों की बात करने वाली मीडिया, आपकी हैं। आप उसके पाठक हैं। आप उसे पढ़ें। दूसरों को बताएं। हो सके तो आर्थिक मदद करें।
जब आप नमक मुफ्त में नहीं खरीदते, तो विचार और समाचार मुफ्त में क्यों चाहते हैं? वैसे मुफ्त कुछ मिलता है क्या?

 

साभार : कुमार गौरव

 

This post was written by sanjay dash.

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