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जाति उन्मूलन
भारत में बिना क्रान्ति जाति उन्मूलन सम्भव नहीं,

जाति विरोधी संघर्षों के बिना भारत में क्रान्ति सम्भव नहीं! -बिगुल

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भारत में जाति व्यवस्था : उद्भव, विकास और उन्मूलन का सवाल’ विषय पर परिचर्चा

भारत में बिना क्रान्ति जाति उन्मूलन सम्भव नहीं,

‘गत 12 फ़रवरी को हरियाणा के रोहतक शहर के ‘आर्इएमए हाउस’ में अखिल भारतीय जाति विरोधी मंच की ओर से ‘भारत में जाति व्यवस्था : उद्भव, विकास और उन्मूलन का सवाल’ विषय पर परिचर्चा रखी गयी। इस परिचर्चा में छात्र-युवा पत्रिका ‘मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान’ व ‘मज़दूर बिगुल’ अख़बार के सम्पादक तथा ‘रेड पोलेमिक ब्लॉग’ के लेखक अभिनव को मुख्य वक्ता के तौर पर आमन्त्रित किया गया था। विषय परिवर्तन करते हुए दिशा छात्र संगठन के इन्द्रजीत ने बताया कि आज जाति व्यवस्था का सवाल बेहद प्रासंगिकता के साथ हमारे सामने उपस्थित है। एक ओर तो देश भर में दलित उत्पीड़न की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है, वहीं मध्य किसान जातियों का मौजूदा उभार भी ग़ौरतलब है। बथानी टोला, लक्ष्मणपुर बाथे, रमाबाई नगर, जवखेड़, खैरलांजी और अब ऊना जैसी दलित विरोधी घटनाएँ हमारे समाज के लिए कोई नयी चीज़ नहीं हैं बल्कि इस तरह की घटनाओं में उत्तरोत्तर वृद्धि ही हुई है। हरियाणा का उदाहरण लें तो यहाँ भी दुलीना, गोहाना, भगाना, मिर्चपुर और सुनपेड़ जैसे भयंकर दलित विरोधी काण्ड हो चुके हैं। हरियाणा की प्रमुख मध्य किसान जाति (जाट) का भी आरक्षण के मुद्दे पर उभार हो चुका है और फ़िलहाल भी आरक्षण और कुछ इसी से जुड़े मसलों को लेकर राज्य सरकार के साथ इनकी ज़ोर आज़माइश जारी है। हरियाणा में व्यापक दलित आबादी के आर्थिक-सामाजिक हालात तो सदा से ही बुरे रहे हैं किन्तु अब लगातार सिकुड़ते रोज़गार और छोटी होती जा रही कृषि जोत ने किसान जातियों के सामने भी भयंकर असुरक्षा की स्थिति पैदा कर दी है। इस प्रकार किसान जातियों का छोटा सा हिस्सा कुलक-फ़ार्मर में तब्दील हो चुका है तथा इसके पास संसाधनों का अम्बार है किन्तु इन जातियों की बड़ी आबादी के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। रोजगार विहीन “विकास” के इस दौर में नौकरियाँ -2 प्रतिशत की दर से घट रही हैं, 93 प्रतिशत काम तो पहले ही निजी क्षेत्र के तहत होता है तथा सार्वजानिक क्षेत्र के उद्यमों को लगातार निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। ऐसे में जातीय बँटवारे को और भी मज़बूत करने के लिए शोषणकारी मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था सदैव प्रयत्नशील रहती है। आज पहचान की राजनीति (आइडेण्टिटी पॉलिटिक्स) करने वाले तमाम जातियों के रँगे सियार अपनी राजनीति चमका रहे हैं और मेहनतकश जनता की व्यापक एकता में बाधा पहुँचाकर व्यवस्था के लिए सुषेण वैद्य का काम कर रहे हैं। मेहनतकश जनता का भाईचारा स्थापित करने के लिए व्यापक जाति विरोधी आन्दोलन खड़ा करना बेहद ज़रूरी है तथा जाति विरोधी आन्दोलन खड़ा करने के लिए जाति व्यस्था की कार्यप्रणाली (मैकेनिक्स) को सही इतिहास बोध और वैज्ञानिक नज़रिये के साथ समझना एक पूर्वशर्त है।

जाति विरोधी संघर्ष
जाति विरोधी संघर्षों के बिना भारत में क्रान्ति सम्भव नहीं!

मुख्य वक्ता के तौर पर अपने व्याख्यान की शुरुआत करते हुए सबसे पहले अभिनव ने जाति व्यवस्था के इतिहास पर प्रकाश डाला, उन्होंने बताया कि जाति व्यवस्था भारत की विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिस्थिि‍तयों की देन है। उन्होंने अपनी बात में प्राचीन भारत के इतिहासकारों डी.डी. कोसाम्बी, आर.एस. शर्मा, रोमिला थापर, सुवीरा जायसवाल आदि की जाति व्यवस्था सम्बन्धित व्याख्याओं और मान्यताओं का ज़िक्र किया, साथ ही उन्होंने मध्यकालीन और आधुनिक भारत के प्रमुख इतिहासकारों के शोधकार्यों से भी श्रोताओं को परिचित कराया। उन्होंने आगे कहा कि जाति व्यवस्था का हरेक शासक वर्ग ने समाज में पैदा हो रहे अधिशेष को हड़पने के लिए एक औजार की तरह इस्तेमाल किया है और दूसरी ओर जाति व्यवस्था कभी स्थिर चीज़ भी नहीं रही है बल्कि उत्पादन सम्बन्धों, उत्पादन शक्तियों में हुए संघर्ष के फलस्वरूप बदलती उत्पादन पद्धतियों के परिणामस्वरूप जाति व्यवस्था में भी परिवर्तन आते रहे हैं। जाति, वर्ण और वर्ग में बराबरी का पहलू तो नहीं रहा है किन्तु संगति का पहलू ज़रूर रहा है। प्राचीन काल से ही देखा जाये तो वर्ण व्यवस्था में ही वर्ग संघर्ष को चिन्हित किया जा सकता है। आज भी यदि देखा जाये तो दलित आबादी का बहुसंख्यक हिस्सा सर्वहारा या मज़दूर वर्ग में शामिल है किन्तु दूसरी तरफ़ भारत की कुल मज़दूर आबादी में दलितों का प्रतिशत कम है यानि कुल मज़दूर आबादी में दलित मज़दूर अल्पसंख्यक हैं।

अपनी बात में अभिनव ने आगे बताया कि प्रत्येक जाति और वर्ण अपने जन्म के समय से वर्ग संघर्ष को भी प्रतिबिम्बित करते हैं। समाज के दबा दिये गये वर्गों को क़ाबू में रखने के लिए शोषक-शासक वर्गों ने अपने शासन और शोषण को वैधीकृत करने के लिए धार्मिक-सामाजिक तौर-तरीक़़ों का सहारा लिया। भारत में जाति व्यवस्था यहाँ के आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों यानि कि कुल मिलाकर वर्ग संघर्षों की ही एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है। ऐसा नहीं है कि ब्राह्मणों ने ही जाति व्यवस्था को पैदा कर दिया, क्योंकि एक बार को यदि यह मान भी लिया जाये तो इस सवाल का भी जवाब देना पड़ेगा कि फिर ब्राह्मणों को किसने पैदा किया? यह ज़रूर है कि शोषक-शासक जमात के तौर पर और कभी-कभी इस जमात में भागीदारी के कारण ब्राह्मणवाद ने जाति व्यवस्था को वैधीकृत अवश्य किया है। शुद्धता, प्रदूषण और पितृसत्ता पर आधारित जाति व्यवस्था ने शासक वर्ग को एक वर्चस्वशील विचारधारा प्रदान की है। मौर्य, गुप्त साम्राज्य से लेकर सल्तनत और मुग़ल साम्राज्य तक और फिर औपनिवेशिक शासक वर्ग से लेकर आज़ाद भारत के शासक वर्ग तक यानि कि हर नये शासक वर्ग ने जाति व्यवस्था को अपनाया है तथा इसके साथ ही उत्पादन प्रणाली में हुए परिवर्तनों के साथ ही जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में भी परिवर्तन आये हैं। भारत में जाति व्यवस्था में निरन्तरता और परिवर्तन के तत्व लगातार मौजूद रहे हैं, एक समय में शुद्र की स्थिति में गिनी जाने वाली जातियाँ आज धनी किसानों की मध्य जातियों के तौर पर स्थापित हो चुकी हैं और राजनीतिक-सामाजिक तौर पर इन जातियों का उभार समय-ब-समय हमारे सामने आता भी रहता है, किन्तु यह भी उतना ही सच है कि इन जातियों में ध्रुवीकरण का पहलु नज़रन्दाज़ नहीं किया जा सकता। यह बात उल्लेखनीय है कि इनके भीतर भी वर्ग संघर्ष मौजूद है यानि इन उभरती किसान जातियों का भा बड़ा हिस्सा तो रसातल की ज़िन्दगी बसर कर रहा है और बेहद छोटा सा हिस्सा ही ऐशोआराम में है। जाति और वर्ण व्यवस्था के स्वरूप में भी क्षेत्रीय भेद दृष्टिगोचर होते हैं, जैसे कि दक्षिण और पूर्वी भारत में जाति व्यवस्था उस प्रकार से नहीं है जिस प्रकार से वह उत्तर भारत में है।

इसके बाद अभिनव ने भारत में जाति व्यवस्था के ख़ात्मे के लिए हुए सामाजिक आन्दोलनों और उनमें लगे अग्रणी सुधारकों पर भी विस्तारपूर्वक अपनी बात रखी। उन्होंने पेरियार, ज्योतिबा फुले और अम्बेडकर पर भी विस्तार से अपनी बात रखी, साथ ही जाति व्यवस्था के सन्दर्भ में तात्कालिक भारत के क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट आन्दोलन के भी सकारात्मक-नकारात्मक पहलुओं का भी ज़िक्र किया। विशेष तौर पर उन्होंने भगतसिंह और उनके साथियों की एचएसआरए की क्रान्तिकारी धारा को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि जाति व्यवस्था को मुख्य प्रश्न के तौर पर सामने लाने का काम बेशक अम्बेडकर ने किया है और इसके लिए उनके योगदान को सराहा जाना चाहिए, किन्तु जाति व्यवस्था के समाधान का रास्ता वे नहीं सुझा पाये। अम्बेडकर अपने पूरे कार्यकाल के दौरान अपनी व्यवहारवादी पहुँच और पद्धति से निर्देशित होते रहे। अमेरिकी सिद्धान्तकार और व्यवहारवादी दार्शनिक जॉन ड्युई के दर्शन में अम्बेडकर की पहुँच और पद्धति के बीज देखे जा सकते हैं, कुल मिलाकर जॉन ड्युई एक पूँजीवादी दार्शनिक थे। जाति व्यवस्था को लेकर अम्बेडकर के पास न तो सुसंगत इतिहास बोध था और न ही वे जाति उन्मूलन का रास्ता ही अपने जीवन में सुझा पाये। अंग्रेज़ों और ब्राह्मणवादियों के गठजोड़ को समझने की बजाय उनका मानना था कि ब्राह्मणवाद और औपनिवेशिक सत्ता में से पहले ब्राह्मणवाद को हराया जाना चाहिए जबकि असल में औपनिवेशिक सत्ता भी ब्राह्मणवाद और सामन्ती तत्वों के साथ गठजोड़ करके ही कायम थी। 1793 में ज़मींदारी भूमि व्यवस्था लागू करके तथा 1881 की जाति आधारित जनगणना ने जाति-व्यवस्था को मज़बूत करने की ही भूमिका निभायी। अभिनव का कहना था कि हमें भावना की बजाय तर्क से प्रस्थान करना चाहिए और इतिहास की गतिकी को वैज्ञानिक नज़रिये के समझना चाहिए।

अन्त में पूरी बात को समेटते हुए अभिनव ने कहा कि आज तमाम जातियों की मेहनतकश जनता की एकजुटता स्थापित करके ही मौजूदा लुटेरी पूँजीवादी व्यवस्था का मुकाबला किया जा सकता है। निश्चय ही समाज में दलित जातियाँ आज सामाजिक उत्पीड़न का शिकार हैं तथा आर्थिक रूप से भी वे अतिशोषण का शिकार हैं। दलितों के बीच का एक छोटा सा हिस्सा ही आज सत्ता में ऊपर पहुँच चुका है और सत्ता का अवलम्ब बना हुआ है। दलितों का बहुसंख्यक हिस्सा आज भी सामाजिक उत्पीड़न और आर्थिक शोषण का शिकार है जबकि दलितों के बीच से उभरे छोटे से मलाईदार तबक़े की बड़ी आबादी की सेहत पर बथानी टोला, लक्ष्मणपुर बाथे, भगाना, सुनपेड़, मिर्चपुर आदि जैसी भयंकर दलित विरोधी घटनाओं का कोई असर नहीं पड़ता, बल्कि इन घटनाओं का पहचान की राजनीति को उभारने के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है। किताबों में कार्टून बनाया जाना इनके लिए “जीने-मरने” का सवाल बन जाता है किन्तु भयंकर दलित विरोधी काण्डों का कभी भी दलितों के बीच से उभरा मलाईदार तबक़ा सड़कों पर उतरकर विरोध नहीं करता। आज सवर्ण जातियों के बीच से आने वाली बहुसंख्यक आबादी भी आर्थिक शोषण का शिकार है, शिक्षा और रोज़गार उसकी पहुँच से दूर होते जा रहे हैं। जाति व्यवस्था पर चोट आज इसी रूप में की जा सकती है कि तमाम जातियों की मेहनतकश आबादी वर्ग आधारित एकजुटता स्थापित करे। मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था, जो जातिवाद का समाज की मेहनतकश जनता को बाँटने के लिए इस्तेमाल करती है, के क्रान्ति के द्वारा ख़ात्मे का सवाल बेशक एजेण्डे पर होना चाहिए किन्तु यह भी उतना ही सच है कि व्यापक जाति विरोधी आन्दोलनों को खड़ा किये बग़ैर मेहनतकश आबादी को एकजुट नहीं किया जा सकता। तमाम जातियों से आने वाले इन्साफ़पसन्द लोगों को जातीय उत्पीड़न का विरोध करना चाहिए और जाति तोड़ो संगठन खड़े करने चाहिए। आरक्षण जैसे मुद्दों को उभारकर मेहनतकशों को बाँटे जाने के शासक वर्ग के षड्यन्त्रों का भण्डाफोड़ किया जाना चाहिए। आज पहचान की राजनीति करने वाले जातियों के अलम्बरदार मेहनतकशों की एकजुटता को तोड़ने और शासक वर्ग के फूट डालो और राज करो की नीति में सहायक की भूमिका निभा रहे हैं

इस गहन और विस्तृत परिचर्चा के बाद प्रश्नोत्तर सत्र भी चला जोकि काफ़ी सकर्मक रहा। कुल मिलाकर परिचर्चा का आयोजन जीवन्त और सफल रहा तथा इस तरह की गतिविधियों को आगे भी जारी रखने की आवश्यकता पर बात की गयी।

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