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जात न पूछो साधु की पूछ लीजे ज्ञान…

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” जात न पूछो साधु की पूछ लीजे ज्ञान, मोल करो तलवार का पड़ा रहने दो म्यान ” ये बातें मैंने नहीं कही बल्कि कबीर दास जी ने वर्षों पहले ही ये कह दिया था . लेकिन उन्होंने ये बात क्यों कहा था इसका पता करना जरूरी है ; शायद उन्होंने उसी समय इस बात का आकलन कर लिया था की आने वाले समय में जाती प्रथा लोगों के लिए एक जटिल समस्या हो जाएगी

भारतवर्ष में जाति प्रथा के जनक महाराज मनु माने जाते हैं . उनके मुताबिक जाति व्यक्ति के जन्म से नहीं उसके कर्म से निर्धारित होनी थी. अर्थात जो व्यक्ति जिस काम में पारंगत होगा उसकी जाति का मानक वही होगा. जातियां चार भागों में विभाजित की गई . जो वेदों का अध्यन अध्यापन करे वो ब्राह्मण , जो युद्ध कला में शामिल हो वो क्षत्रिय, जो व्यापार करे वो वैश्य और कृषक मजदूरों को शूद्र बना दिया गया. चूँकि ये विभाजन कर्म के हिसाब से थे जिसके कारण एक परिवार में चारों तरह की जातियां हो सकती थी . मनु महाराज ने ये उत्तम व्यवस्था बनाई ताकि समाज में सबको बराबर का हक़ मिलता रहे हलाँकि इसमें शूद्र का शोषण हो रहा था लेकिन इस बात की पूर्णतः आशा थी की शूद्र का पुत्र यदि चाहे तो वो कोई भी जाति में जा सकता था.

समय बदलता गया और लोगों की जरूरतें भी बदलती गयी और बदलती जरूरतों के हिसाब से इन जातियों का पुनः विभाजन हुआ और मूल चार जातियों के अंतर्गत अनेक जातियां आ गयी . लेकिन मनु महाराज के द्वारा बनाई गयी व्यवस्था को उनके वंशजों ने अपने मुताबिक बनाना शुरू कर दिया और इस कर्म प्रधान जाति प्रथा को जन्म प्रधान जाति प्रथा बना दिया जिसके मुताबिक किसी के पास जाति चुनने का विकल्प ही न हो जो ब्राह्मण के घर जन्मे भले ही कर्मों से राक्षस हो ,वो भी ब्राह्मण ही बन गया. जातियां सिर्फ मजहब और जन्म के हिसाब से ही नहीं बनती बल्कि आज के वर्तमान देश में आपके गृह राज्य के हिसाब से भी आपकी जाति का निर्धारण किया जाता है.

अब जो समाज की भयावह दुर्दशा हो गयी उसका बखान करने के लिए हम अपने आस पास खुद देख सकते हैं भले ही समाज में छुआछूत की प्रचलन खत्म होने के कगार पे हो लेकिन ये सिर्फ शहरों से ही खत्म हुई है आज भी गावों में ये प्रचलन सरेआम प्रचलित है.  हमने कबीर दास की कही बात को अपने हिसाब से परिणत कर लिया और वो अब ” कबीर दास की उलटी वाणी , बरसे कम्बल भीगे पानी ” के समान हो गयी . आज कल जातिगत लड़ाई होती है जाति और धर्म के नाम पर दंगे होते हैं .अगर आज कबीर दास जी जिन्दा होते तो कहते

पहले जात ही पूछ लो साधु की फिर सोचना लेना है की नहीं ज्ञान ;

जब लोहे का हो तलवार और सोने की म्यान तो खुद सोचो कहाँ लगेगा ध्यान

दुनिया कहाँ से कहाँ चली जा रही है और हमारा देश अभी तक जातिगत बंधनो में बंधा हुआ है . और हमारे देश के नेता और हमारे यहाँ मौजूद इस जातिगत बंधन का पूरा इस्तेमाल अपना उल्लू सीधा करने के लिए करते हैं . इस जातिगत बंटबारे की आग में कोई रोटियां सेकने का हुनर जनता है तो हमारे देश के राजनेता हैं .बानगी देखिये की चुनाव जो लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है उसमें भी जातिगत वैमनस्य विराजमान है . राजनैतिक पार्टियां उम्मीदवारों का निर्धारण उस क्षेत्र में मौजूद जाति बाहुल्य के हिसाब से करती हैं और बाहुल्य जाति वाले उम्मीदवार जीत भी जाते हैं लेकिन वो अपनी ही जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं बाकियों को अक्सर भूल जाते हैं और हाशिये पे खड़ी गरीब जातियां हाशिये से बाहर पहुंच जाती है. अब तो सरकारी नौकरियां भी जाति विशेष के हिसाब से आवंटित की जाति है और इस वजह से जरूरतमंद अपनी जरूरत लिए मरता रहता है और उसकी जगह कोई और ही मौज करता रहता है

 

समाज में मौजूद ये जातिगत बंधन हमारे देश की विकास में प्रचुर बाधक हैं, यदि हमारे देश से जातिगत ऊंच नीच खत्म हो जाये तो हमारा देश वो क्षमता रखता है की वो सोने का शेर बन कर विश्वपटल पर अंकित हो जायेगा और उसकी दहाड़ से  बाकि देश खौफ खाएंगे . लेकिन कुछ नीच अराजक तत्वों की गन्दी और लालची मानसिकता से हमारा देश अपने विकास को कुंठित कर रहा है . महाराज मनु की संतानें अपने गौरवशाली अतीत को भूल लोगों से जाति पूछने पे लगी है . कुछ नेता तो अब ये भी मांग करते हैं की हर जगह जातिगत जनगणना की जाए से लोग ही अपने स्वार्थ के नशे में देश का अहित करने लगे हैं. मैं दावे के साथ कहता हूँ की यदि ऐसा हो जाए तो देश स्वर्णिम युग में आ जायेगा और ऐसे साम्राज्य का निर्माण होगा जिसकी कल्पना व्यक्ति व्यक्ति के रोम रोम में आनंद का संचार करती रहेगी . लेकिन उसके लिए हमारे देश के दुश्मनो को दूर करना होगा ; हमारे खुद के अंदर छुपे  हुए  जाति प्रथा में बंधे दैत्य को दूर करना होगा . तो आज से ही ये प्रण करें की हम किसी जातिगत भेदभाव से नहीं बंधेंगे और इसके ऊपर उठ कर एक आदर्श देश का निर्माण करेंगे

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