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जीएसटी कॉरपोरेट पे करम
जीएसटी कॉरपोरेट पे करम, जनता पे सितम:

जीएसटी : कॉरपोरेट पे करम, जनता पे सितम, की एक और औज़ार

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जीएसटी : आखि़र  केन्द्र-राज्यों में सत्ताधारी सभी पार्टियों ने पूर्ण सहमति से जीएसटी की दरें और नियम तय कर 1 जुलाई से इसे लागू कर दिया। पूँजीपति वर्ग के सभी संगठनों, कॉरपोरेट नियन्त्रित मीडिया और आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा इसे ऐतिहासिक आर्थिक सुधार बताकर इसकी भारी वाहवाही की जा रही है। जीएसटी क़ानून बनाने में एक राय से सहमति जताने वाले कुछ विपक्षी भी सिर्फ़ इस बात की आलोचना कर रहे हैं कि इसे बगै़र पूरी तैयारी के लागू किया जा रहा है। तो क्या माना जाये कि पूरी तैयारी से लागू होने पर यह जनता के हित में होता? लेकिन इस क़िस्म की आलोचना एक समान हितों वाले वर्ग-रहित समाज में ही की जा सकती है। किन्तु हमारा समाज ऐसा समानता पर आधारित समाज नहीं है। इसमें जहाँ एक ओर 81% सम्पत्ति के मालिक 10% लोग (कॉरपोरेट) हैं, वहीं ग़रीबी में जीते बहुसंख्यक मज़दूर-किसान और बहुत से छोटे काम-धन्धे करने वाले लोग भी हैं। इस समाज में कोई भी नीति ऐसी नहीं हो सकती जो सब वर्गों के लिए समान हितकारी हो और हर नीति का विश्लेषण इस आधार पर होना चाहिए कि इसका फ़ायदा किस तबक़े को होगा, नुक़सान किस तबक़े को। ऐसे वर्ग विभाजित, ग़ैर-बराबरी और शोषण पर आधारित समाज में प्रत्येक नीति का विभिन्न वर्गों की जि़न्दगी पर असर समझे बग़ैर की गयी कोई भी चर्चा निरर्थक या गुमराह करने वाली है। इस दृष्टिकोण से इसके कुछ अहम बिन्दुओं की चर्चा ज़रूरी है।

इसके कुछ अहम बिन्दुओं की चर्चा ज़रूरी है। (मुकेश असीम)

जीएसटी उत्पादन और बिक्री की प्रत्येक अवस्था में जोड़े गये मूल्य पर लगने वाला कर है, जिसे अन्तिम ख़रीदार या उपभोगकर्ता को चुकाना होता है। ऐसे करों को अप्रत्यक्ष कर कहा जाता है, क्योंकि ये कहने के लिए उत्पादक पर लगते हैं लेकिन इन्हें चुकाता उपभोक्ता है। पूँजीवादी जनवाद के दृष्टिकोण से भी देखा जाये तो अप्रत्यक्ष करों के दायरे को बढ़ाना एक प्रतिगामी क़दम है, क्योंकि इनकी दर सभी के लिए ‘समान’ होने से आमदनी के हिस्से के तौर पर देखें तो जितनी कम आमदनी हो उसका उतना बड़ा हिस्सा कर में देना पड़ता है और जितनी ज़्यादा आमदनी उतना कम हिस्सा। अर्थात इनका बोझ ग़रीब लोगों पर ज़्यादा और अमीर लोगों पर कम होता है। अगर तुलनात्मक रूप से विकसित पूँजीवादी देशों को भी देखें तो वहाँ कुल करों का दो तिहाई प्रत्यक्ष करों और एक तिहाई अप्रत्यक्ष करों से वसूल किया जाता है। भारत में पहले ही ठीक इसका उल्टा है अर्थात दो तिहाई अप्रत्यक्ष करों के ज़रिये आता है और अब इनका दायरा और बढ़ाया जा रहा है। इसके विपरीत ज़्यादा आमदनी पर ज़्यादा लगने वाले प्रत्यक्ष करों – आयकर, कारपोरेट कर, सम्पत्ति कर, विरासत कर, आदि में छूट दी जा रही है या ख़त्म किया जा रहा है। इस तरह जीएसटी के द्वारा अप्रत्यक्ष करों में वृद्धि से श्रमिकों को प्राप्त मज़दूरी का और बड़ा हिस्सा राज्य द्वारा लगान के रूप में लिया जाकर उनके शोषण को और तीव्र करेगा।

कॉरपोरेट पे करम, जनता पे सितम…

बहुत सारे छोटे व्यवसाय अब तक कर के दायरे से बाहर थे। अब इनमें से बहुत सारे कर के दायरे में आयेंगे। इससे इनकी लागत – कर की रक़म और प्रशासनिक लागत – दोनों तरह से बढ़ेगी। छोटे कारोबारियों की लागत बढ़ने, अन्तरराज्यीय कारोबारियों की लागत और प्रशासनिक बोझ कम होने, एक राज्य से दूसरे में यातायात-सप्लाई की रुकावटें कम होने से छोटे, अनौपचारिक कारोबारों को मिलने वाला स्थानीयता का लाभ समाप्त होगा। बड़े उद्योगों को उत्पादन और भण्डारण दोनों को कम स्थानों पर केन्द्रित कर पाना सम्भव होगा, जिसके चलते वह बड़े पैमाने के उत्पादन को अधिक पूँजी निवेश द्वारा और अधिक मशीनीकृत-स्वचालित कर उत्पादकता को बढ़ा पायेंगे। इस स्थिति में छोटी पूँजी वाले उद्योग और व्यापार बड़ी पूँजी वाले उद्योग-व्यापार के मुक़ाबले प्रतियोगिता में नहीं टिक पायेंगे। इसी तरह बहुत से कारीगर, दस्तकार, बुनकर, पॉवरलूम चलाने वाले स्वयं के धन्धे में लगे या कुछ मज़दूर लगाकर काम करने वाले उद्यमी भी बढ़ती लागत से अब बाज़ार में नहीं टिक पायेंगे और बड़े पूँजीपति के कारोबार में श्रमिक बन जायेंगे। उदाहरण के तौर पर निर्माण उद्योग के बाद श्रमिकों की संख्या की दृष्टि से दूसरे सबसे बड़े टेक्सटाइल उद्योग में स्थिति लघु इकाइयों के सामने संकट अत्यन्त गहरा है। महाराष्ट्र टेक्सटाइल प्रोसेसर एसोसिएशन के सेक्रेटरी ने कहा ही है – ‘85% लूम्स में बहुत छोटे व्यापारी हैं। जीएसटी डिसेण्ट्रलाइज़ सेक्टर को ख़त्म कर देगा। कम्पोज़िट मिल से हमारा कपडा महँगा हो जायेगा और सिर्फ़ बड़े संगठित प्लेयर को फ़ायदा होगा।’ इसीलिए सूरत, भिवण्डी, मुम्बई सब जगह ये उद्यमी अपने लूम्स को बन्द कर हड़ताल, धरना, प्रदर्शन में लगे हैं। इसी तरह छोटे दुकानदारों की क़ीमत पर बड़े मॉल और कारपोरेट स्टोर्स को लाभ होगा तथा छोटे दुकानदार इनमें कर्मचारी बनने के लिए मजबूर होंगे। इससे बडे पूँजीपतियों की इजारेदारी बढ़ेगी। इसीलिए पूँजीपतियों के सारे संगठन और उनका भोंपू मीडिया इसके पक्ष में इतने साल से माहौल बना रहा है।

 

लेकिन आज भारत में 90% रोज़गार अनौपचारिक, लघु क्षेत्र में है। संगठित क्षेत्र के बड़े उद्योगों को उन्नत आधुनिक तकनीक, श्रमिकों पर अधिक उत्पादकता के दबाव, परिमाण की मितव्ययिता, आदि की वज़ह से उतने ही उत्पादन के लिए कम श्रमिकों की आवश्यकता होती है। इसलिए इसलिए अनौपचारिक, लघु उद्योगों की क़ीमत पर बड़े उद्योगों की इज़ारेदारी के बढ़ने से रोज़गार के अवसर और भी कम होंगे। साथ ही इन छोटे उद्यमियों के समाप्त होकर श्रमिक बन जाने से बेरोज़गारों की रिज़र्व फ़ौज और बड़ी होगी जिससे पूँजीपति वर्ग अपने मुनाफ़े को बढ़ाने के लिए श्रम शक्ति के मूल्य अर्थात मज़दूरी को और भी कम करने का प्रयास करेगा। इस प्रकार मालिक पूँजीपति और श्रमिक वर्गों के बीच अन्तर्विरोध और संघर्ष और गहन एवं तीव्र होगा।

सेण्टर फ़ॉर मॉनिटरिंग इण्डियन इकोनॉमी

छोटे, अनौपचारिक उद्योगों पर इस संकट की मार पहले ही नोटबन्दी के द्वारा शुरू हो चुकी है, जिसके बाद के 4 महीनों जनवरी-अप्रैल में सेण्टर फ़ॉर मॉनिटरिंग इण्डियन इकोनॉमी के अनुसार 15 लाख नौकरियाँ कम हुई हैं। अब जीएसटी लागू होने के बाद यह प्रक्रिया और तेज़ होगी। लुधियाना, सूरत, भिवण्डी जैसे स्थानों से आने वाली रिपोर्टें पहले ही इसकी पुष्टि कर रही हैं, जहाँ लघु औद्योगिक इकाइयों द्वारा उत्पादन में कमी से श्रमिकों को छँटनी का सामना करना पड़ रहा है, उद्यमी कारीगरों-दस्तकारों के पास माल बनाने के आॅर्डर से उनका काम भी बन्द है और इनके माल के छोटे व्यापारी बिक्री के अभाव में ख़ाली बैठे हैं या जुलूस-धरने में लगे हैं।

 

जहाँ तक क़ीमतों का सवाल है, अधिक उत्पादों और कारोबारियों को कर दायरे में आने की वजह से बहुत से उत्पादों की क़ीमतें बढ़ना तय है। हालाँकि पहले से कर दायरे में आने वाले औपचारिक, संगठित क्षेत्र के उद्योगों को पिछले टैक्स का क्रेडिट अगले चरण में मिलने की वजह और कुछ उत्पादों पर कर की कम दर से उनके कुछ उत्पादों की क़ीमतें कम होंगी जैसे महँगी कारों या आई फ़ोन की क़ीमतों में कमी आयी है। इससे उच्च और मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं के लिए महँगाई का असर सम्भवतः उतना ज़्यादा नहीं भी हो, पर ग़रीब जनता द्वारा उपभोग की वस्तुओं पर महँगाई निश्चित ही बढ़ेगी, क्योंकि ये अधिकतर अनौपचारिक क्षेत्र के कर दायरे से बाहर के उत्पादों को छोटे दुकानदारों से ख़रीदते रहे हैं, जो अब कर दायरे के अन्दर होंगे।

जीएसटी का एक मुख्य लाभ

पहले जीएसटी का एक मुख्य लाभ यह भी बताया गया था कि समान दरों, सरल प्रक्रियाओं से भ्रष्टाचार और कर चोरी कम होगी। लेकिन अब निर्धारित कई दरों, अधिभार, वस्तुओं के जटिल वर्गीकरण और दुरूह प्रक्रियाओं ने इससे चोरी-भ्रष्टाचार कम होने वाली बात की भी हवा पहले ही निकाल दी है। जैसे इंस्टेण्ट कॉफ़ी और रोस्टेड कॉफ़ी अलग दरों में आती हैं, होटल के कमरों पर किराये के आधार पर अलग दरें हैं। यही सब चीज़ें नौकरशाही के लिए सबसे प्रिय होती हैं, क्योंकि यह उन्हें मनमानी तरीक़े से कर निर्धारण और हेराफे़री का मौक़ा देती हैं। पर शायद कुछ और होने की आशा ही ग़लत होती, क्योंकि पहले से मौजूद क़ारोबारी-राजनीति-नौकरशाही गँठजोड़ के इस आधार को ही ख़त्म करने का जोखिम इनमें से कौन लेता!

 

जीएसटी का एक और पहलू विकास में क्षेत्रीय असन्तुलन है। असन्तुलित, असमतल आर्थिक विकास सामाजिक पैमाने पर अव्यवस्थित पूँजीवादी उत्पादन प्रक्रिया का अनिवार्य परिणाम है। योजनाबद्ध विकास के अभाव वाली पूँजीवादी व्यवस्था की वजह से पहले से ही भारत में भी विभिन्न राज्यों-क्षेत्रों के बीच असमतल विकास और क्षेत्रीय असन्तुलन एक बड़ी समस्या है जिसका प्रभाव राजनीति में जनता के बीच क्षेत्रीय वैमनस्य को पैदा करने के लिए किया जाता रहा है। पहले से ही असमतल क्षेत्रीय विकास की स्थिति में एक समान कर और एक बाज़ार की यह नीति इस इलाक़ाई असन्तुलन को और बढ़ायेगी, जैसे कि 1949 की पूरे देश में हर दूरी के लिए समान रेलवे भाड़ा नीति ने किया था और खनिज सम्पदा वाले राज्य जैसे तबका बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास में पिछड़ गये क्योंकि वहाँ प्राप्त होने वाले खनिज समान क़ीमत पर दूर-दराज के राज्यों में भी उपलब्ध थे और इस नीति से उन्हें इस खनिज उत्पादन का कोई लाभ नहीं मिला।

कुल मिलाकर देखा जाये तो पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजी के संकेन्द्रण और इजारेदारी को बढ़ाने वाली जीएसटी की नीति से पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में अन्तर्निहित किसी समस्या का समाधान होने वाला नहीं है। बल्कि यह तात्कालिक रूप से इजारेदार पूँजी के मुनाफ़े को बढ़ाने हेतु टटपुँजिया वर्ग को बरबाद कर उन्हें श्रमिकों की श्रेणी में धकेलने की प्रक्रिया तेज़ करेगी, बेरोज़गारी की फ़ौज की तादाद को बढ़ायेगी, श्रमिकों की माँग और मज़दूरी को नीचे की और ले जायेगी। इससे उनकी क्रय शक्ति और कुल बाज़ार माँग कम होगी। इसके नतीजे में कुछ समय बाद बाज़ार में अतिउत्पादन का और भी गहरा संकट पैदा होगा

 

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