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ढूंढते रह जाओगे... (अपनी छोटी-बड़ी समस्यायों के समाधान) -उदय मोहन पाठक

ढूंढते रह जाओगे… (अपनी छोटी-बड़ी समस्यायों के समाधान) -उदय मोहन पाठक

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ढूंढते रह जाओगे… दस-दस फीट के दस गड्ढे खेादने के बजाय एक सौ फीट का कुआॅं खोद लो, पानी जरूर मिलेगा। अन्यथा छोटे-छोटे गड्ढों में पानी ढूॅंढ़ते रह जाओगे कम उम्र से ही लोग अपनी छोटी-बड़ी समस्या के समाधान के लिए ईश्वर को ढूंढते रहते हैंं, शायद कभी किसी समस्या का समाधान हो भी जाता है फिर भी समाधान हेतु हमारी खोज चलती ही रहती हैं अपने सुख-समृद्धि के लिए दूसरों को परेशान करने का उपाय ढूंढते रहते हैं लेकिन समय के प्रवाह में यदि दूसरे सुखी हो जाते हैं तो अपनी पेरशानी का कारण भी ढूंढते रह जाते है।

हर चुनाव में हार के बाद हम उस हार का पता लगाने के लिए चिन्तन बैठक करते हैं और उसके संभावित कारणें पर चर्चा करते हैं। लेकिन फिर भूल जाते हैं। ज्यों-ज्यों समाज में शिक्षित लोगो की तादाद बढ़ती जायेगी उम्मीदवारों को पता ही नहीं चलेगा कि जनता किसे चाहती है, ओर किसे नहीं ? तब आपके बाहुबल, घनबल का प्रदर्शननहीं चलेगा। उस समय जनबल और जनमत सर्वेापरि हो जायेगा। तब तुम अपने वोटरों को ढूंढते रह जाओगे।

हाल के झारखण्ड चुनाव के नतीजे चैकाने वाले हुए। कुछ नामी-गिरामी नेताओं को हार का मुख देखना पड़ा । कारण चाहे जो भी हो आप खुद पता कर लों। लगता है एक शायर की बात यहॅा सटीक बैठती है-

                                                                      ‘‘आज के दौर में उम्मीदें वफा किससे करें,

                                                                         घूप में बैठा है खुद पेड़ लगाने वाला।’’

अलग झारखण्ड राज्य के संघर्ष का नेतृत्व करनेवाले उन सभी नेताओं का आज कैसा लगता होगा? अलग राज्य के लिए उन्होंने क्या-क्या सपने देखे थे? किन्तु राजनीति के झंझावातों ने उनके सपने बिखेर दिये। प्राकृतिक ओर खनिज सम्प्रदाओं से भरा हुआ यह राज्य चैदह वर्षों के बाद भी विकास क सीमा के नीचे ही रह गया। नदियाॅंं तो हैं लेकिन सूखी हुई। तालाब हैं लेकिन जाड़े में ही सूखी हुई। अनेकों प्रकार के खनिज हैं लेकिन संबंधित उद्योग-धन्धे नहीं। शिक्षित लोग है लेकिन नौकरी नहीं। अनेक ज्ञानी-विज्ञानी लोग हैं लेकिन उनके ज्ञान को लेनेवाला कोई नहींं अथक प्रयास से थोड़ा विकास तो हुआ मानो वर्षो से सूखी-बंजर धरती पर एक घंटे की वर्षो हो गई हो। कुछ दूब घास उग आये फिर जैसे थे, वैसे हो गए।

शुरूआती दौर में अनेक शिलान्यास हुए, अनेक घेाषणायें की गई लेकिन बात नहीं बनीं उपराजधानी का सपना, तकनीकि महाविद्यालय का सपना कई उद्यानों का सपना, उन्नत कृषि का सपना जनता की सूरक्षा का सपना आदि-आदि सब टूट गये। राम के वनवास की अवधि चैदह वर्ष की ही थी। अब तो रामराज्य आना ही चाहिएं सर्वे भवन्तु सूखिन्, सर्वे सन्तु निरामया का भाव आना ही चाहिए। विकास चहूॅं ओर दिखना चाहिए। अगर अब भी नहीं संभले तो प्रजातांत्रिक देश में अपनी अस्मिता को ढूंढते रह जाओगें।

यह वर्षो से सहते आ रहे पीड़ा का भाव है। अन्तरमन व्यथित हो चुका है। जब तक आशा का दीप जला हुआ है तब-तक सौ फीट का कुआॅं खोद लो, पानी जरूर मिलेगा। एक निश्चित लक्ष्य की ओर बढ़ने से सफलता जरूर मिलेगी। सच्चे मन से विकास को गति देने पर, राज्य जरूर विकसित होगा अन्यथा दस-दस फीट के दस गड्ढों में पानी ढूंढते रह जाओगे।

This post was written by Uday Mohan Pathak.

The views expressed here belong to the author and do not necessarily reflect our views and opinions.

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