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तुम्हे याद हो कि न याद हो

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तुम्हे याद हो कि न याद हो

“पुरखे हमारे थे बादशाह,

तुम्हे याद हो कि न याद हो।

अब भारत में हम है तबाह,

तुम्हे याद हो कि न याद हो।

इतिहास में जो नामवर ,

थे वीर पराक्रमी धनुर्धर।

थे सभ्यता में अग्रसर,

तुम्हे याद हो कि न याद हो।

आये थे आर्य यहां नए,

हमको हजम जो कर गए।

छल-बल से वे मालिक भये,

तुम्हे याद हो कि न याद हो।

यदि खून में कुछ जोश हो,

आ बेहोश कौमो,जो होश हो।

तुम क्यों पड़े खामोश हो,

तुम्हे याद हो कि न याद हो।

 ‘गुलशन’ समय अनुकूल है,

अब भी न चेतो,भूल है।

गहरी तुम्हारी मूल है,

तुम्हे याद हो कि न याद हो।

 

लेखक:दुर्गेश यादव”गुलशन”* *(लेखक भारतीय मूलनिवासी संगठन मध्यप्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष है।)

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