Breaking News
Home / न्यूज़ पटल / एडिटोरियल / आर्टिकल / दुनिया को आतंकवाद से खतरा है छाया आतंकवाद से नहीं- सूरज कुमार बौद्ध

दुनिया को आतंकवाद से खतरा है छाया आतंकवाद से नहीं- सूरज कुमार बौद्ध

Spread the love

आतंकवाद की चर्चा जोरों पर है। लोग आतंकवाद की अलग-अलग परिभाषाएं भी बना लिए हैं और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो  आतंकवाद को अच्छा आतंकवाद और बुरा आतंकवाद के रूप में देखते हैं। हद तो तब होती है जब अपने आप को पढ़ा लिखा और  राष्ट्रभक्त बताने वाले उच्चकोटि के सत्ताखोर  भी अपनी दकियानुसी मानसिकता का परिचय देते हुए आतंकवाद को अपने फायदे के हिसाब से परिभाषित करते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि आतंकवाद अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बनकर उभरा हुआ है। इसका खात्मा होना चाहिए। आतंकवाद को आधुनिक लोकतांत्रिक युग में किसी भी तरीके से जायज नहीं ठहराया जा सकता लेकिन इसके साथ ही साथ इस बात से भी हम सबको सहमत होना चाहिए कि आतंकवाद के नाम पर किसी धर्म, जाति या नस्ल विशेष को कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता है क्योंकि धर्म को किसी ठेकेदार की जरूरत नहीं होती है। मैं किसी धर्म को नहीं मानता हूं लेकिन यह बात दावे से कह सकता हूं कि आतंकवादी किसी धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान।

पिछले माह जून में हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी अमेरिका की यात्रा पर गए थे जहां उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से वैश्विक व द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा किया। प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के बाद दोनों ने साझा बयान जारी किया जिसमें ‘इस्लामिक आतंकवाद’ के खात्मे की बात कही गई। अखिर यह इस्लामिक आतंकवाद क्या है? कुछ आतंकवादी इस्लाम का नाम लेकर वैश्विक स्तर पर आतंक फैलाए हुए हैं लेकिन क्या इससे इस्लाम आतंकवादी हो गया? जब इसी तरह के शब्दों का इस्तेमाल किसी मजहब विशेष के खिलाफ किया जाएगा तो प्रतिक्रिया स्वरुप मालेगांव धमाके, मक्का मस्जिद धमाका (हैदराबाद), समझौता एक्सप्रेस धमाका अौर अजमेर शरीफ दरगाह धमाका, ISI एजेंट ध्रुव सक्सेना, लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी संदीप शर्मा….. जैसे अनेकों तथ्यों का हवाला देते हुए हिंदू आतंकवाद का नाम आना तय है। दरअसल इस्लामिक आतंकवाद शब्द वैश्विक शासकों की बहुत बड़ी साजिश है। इसी साजिश का हिस्सा बने भारत में ब्राह्मणवादी लोग भी ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द का इस्तेमाल करते रहते हैं जबकि वह अपने गिरेबान में कभी झांककर नहीं देखते।

यकीनन सच्चाई यह है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। उदाहरण के तौर पर  मैं हाल के दो घटनाओं का जिक्र करना चाहूंगा। पहली यह की पिछले 10 जुलाई को जम्मू कश्मीर से लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी संदीप शर्मा गिरफ्तार किया गया। सूत्रों का कहना है कि आतंकवादी संदीप शर्मा ने कई विस्फोटों को अंजाम दिया है। संदीप शर्मा हिंदू है। दूसरी घटना यह है कि 11 जुलाई को अनंतनाग में अमरनाथ यात्रा पर गए श्रद्धालुओं से भरी बस पर घात लगाए आतंकवादियों ने अंधाधुंध गोलियां चलाना शुरू कर दिया लेकिन लेकिन गोलियों से बेपरवाह बस के जांबांज़ ड्राइवर सलीम खान अपनी जान पर खेलकर 50 से अधिक हिंदू श्रद्धालुओं की जान बचा लेते हैं। 7 लोगों की जान जाती है। सलीम शेख़ मुस्लिम हैं। वह इंसान इस घटना से कुछ सीख लेने की समझ नहीं रखता, वह इंसानियत का पोषक कभी नहीं कहा जा सकता है। एक साथी इस्लामिक आतंकवाद शब्द का समर्थन एवं हिंदू आतंकवाद शब्द का विरोध करते हुए यह कह रहे थे कि चूंकि संदीप शर्मा अपना गुप्त नाम आदिल रखा इसलिए आतंकवादी बना। मुझे उनकी बुद्धि पर तरस आता है। उन्हें कौन समझाए कि संदीप शर्मा आतंकवादी है इसलिए वह अपना गुप्त नाम आदिल रखा, न कि आदिल नाम रखने के शौक़ में आतंकवादी बना। अगर विश्व में शांति एवं सुरक्षा को सुनिश्चित करना है तो छाया आतंकवाद (Shadow Terrorism) से नहीं बल्कि वास्तविक आतंकवाद (Actual Terrorism) से लड़ाई लड़ने की जरूरत है।

छाया आतंकवाद वैश्विक शासकों की सोची समझी एक गहरी साजिश है जबकि वास्तविक आतंकवाद अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा एवं मानवीय अधिकारों पर हिंसक हमला है। दरसल छाया आतंकवाद वास्तव में आतंकवाद है ही नहीं। यह बस वास्तविक आतंकवाद की एक छाया है। वैश्विक स्तर के शासकों ने पूरी दुनिया के आम आवाम, मजदूरों का ध्यान वास्तविक मुद्दे से हटाने के लिए आतंकवाद को धर्म विशेष से जोड़ते रहते हैं ताकि पूरी दुनिया जाति, नस्ल और धर्म में फंसकर लड़ती कटती मरती रहे और इन ब्राह्मणवादियों एवं पूंजीपतियों की सत्ता बरक़रार रहे। देश और दुनिया को सत्ताखोरों के इस आपराधिक साजिश को समझने की जरूरत है ताकि हमारी असली लड़ाई छाया आतंकवाद से ना होकर वास्तविक आतंकवाद से हो। तभी जाकर के तीर निशाने पर लगेगा और दुनिया में अमन चैन बहाल हो सकेगा। यही रास्ता होगा जब हम धर्म के नाम पर आतंक फैला रहे आतंकवादियों को सबक सीखा सकते हैं।

द्वारा -सूरज कुमार बौद्ध
(लेखक भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

This post was written by suraj kumar bauddh.

The views expressed here belong to the author and do not necessarily reflect our views and opinions.

About suraj kumar baudh

Check Also

झामुमो आई.टी. सेल्स

आई.टी. सेल्स : झारखंड में सोशल-मीडिया की लडाई में झामुमो सब पर भारी

Spread the love285Sharesझारखंड में फासीवादियों ने जहाँ एक तरफ गोदी मीडिया के माध्यम से अपने …