‘धीमी मौत’ – ये कविता पाब्लो नेरूदा नहीं बल्कि ब्राज़ीलियन कवयित्री मार्था मेदेइरोस की है

kavita

धीमी मौत कविता काफी प्रचलित है। इण्टरनेट पर अक्सर पाब्बल रूदा के नाम से शेयर होने वाली ये कविता असल में ब्राज़ीलियन कवयित्री मार्था मेदेइरोस की है। आगे से आप भी अगर धीमी मौत कविता शेयर करते हैं तो वहां कवि का नाम सही कर लें। हिन्दी में इसके कई अनुवाद प्रचलित है। ये वाला अनुवाद मुझे ज्‍यादा बेहतर लगता है। 
जो बन जाते हैं आदत के गुलाम,
चलते रहे हैं हर रोज़ उन्हीं राहों पर,

बदलती नहीं जिनकी कभी रफ्तार,

जो अपने कपड़ों के रंग बदलने का जोखिम नहीं उठाते,

और बात नहीं करते अनजान लोगों से,

वे मरते हैं धीमी मौत।
जो रहते हैं दूर आवेगों से,

भाती है जिन्हें सियाही उजाले से ज़्यादा,

जिनका ‘मैं’ बेदखल कर देता है उन भावनाओं को,

जो चमक भरती हैं तुम्हारी आँखों में,

उबासियों को मुस्कान में बदल देती हैं,

ग़लतियों और दुःखों से उबारती हैं हृदय को,

वे मरते हैं धीमी मौत।
जो उलट-पुलट नहीं देते सबकुछ

जब काम हो जाये बोझिल और उबाऊ,

किसी सपने के पीछे भागने की ख़ातिर

चल नहीं पड़ते अनजान राहों पर,

जो जिन्दगी में कभी एक बार भी,

समझदारी भरी सलाह से बचकर भागते नहीं,

वे मरते हैं धीमी मौत।
जो निकलते नहीं यात्राओं पर,

जो पढ़ते नहीं,

नहीं सुनते संगीत,

ढूँढ़ नहीं पाते अपने भीतर की लय,

वे मरते हैं धीमी मौत।
जो ख़त्म कर डालते हैं ख़ुद अपने प्रेम को,

थामते नहीं मदद के लिए बढ़े हाथ,

जिनके दिन बीतते हैं

अपनी बदकिस्मती या

कभी न रुकने वाली बारिश की शिकायतों में,

वे मरते हैं धीमी मौत।
जो कोई परियोजना शुरू करने से पहले ही छोड़ जाते हैं,

अपरिचित विषयों के बारे में पूछते नहीं सवाल,

और चुप रहते हैं उन चीज़ों के बारे में पूछने पर

जिन्हें वे जानते हैं,

वे मरते हैं धीमी मौत।
किश्तों में मरते चले जाने से बचना है

तो याद रखना होगा हमेशा

कि जिन्दा रहने के लिए काफ़ी नहीं बस साँस लेते रहना,

कि एक प्रज्ज्वल धैर्य ही ले जायेगा हमें

एक जाज्वल्यमान सुख की ओर।

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