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निष्क्रिय प्रतीक्षा का अवसरवादी तर्क (कविता )

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”जब बदलाव करना सम्‍भव था

मैं आया नहीं: जब यह ज़रूरी था

कि मैं एक मामूली सा शख्‍़स, मदद करूँ,

तो मैं हाशिए पर रहा।”

(बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट: ‘सेण्‍ट जोन ऑफ दि स्‍टॉकयार्ड्स’)

गतिरोध की स्थिति जब समाज को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है और प्रतिक्रिया और पुनरुत्‍थान का अँधेरा गहरा हो जाता है, तो आम मेहनतकशों के साथ ही मध्‍यवर्गीय बुद्धिजीवियों के जीवन तक भी अनिश्चितताओं, परेशानियों और जोखिमों की आँच पहुँचने लगती है। *ऐसे अधिकांश बुद्धिजीवी सामाजिक परिवर्तन की आवश्‍यकता और गतिकी को भलीभाँति समझते हैं, पर इस काम में स्‍वयं कोई सक्रिय भूमिका निभाने का जोखिम मोल लेने की जगह सलाहकार की भूमिका निभाना अधिक पसन्‍द करते हैं। यदि वे मार्क्‍सवादी भी होते हैं तो अपनी सारी वैज्ञानिक समझ का इस्‍तेमाल दुनिया की तरह-तरह से व्‍याख्‍या करने मात्र में ही करते हैं और उन व्‍याख्‍याओं पर अमल का काम दूसरों के भरोसे टाल देते हैं।

मेरे एक पुराने परिचित हैं, संवेदनशील भलेमानस हैं, दर्शन, इतिहास, अर्थशास्‍त्र और मार्क्‍सवाद के गम्‍भीर अध्‍येता हैं। समकालीन पूँजीवादी व्‍यवस्‍था के मानवद्रोही चरित्र, बर्बरताओं और संकट के बारे में मेरे उनके विचार लगभग एकसमान हुआ करते हैं। एक दिन उन्‍होंने कहा, ”मैं जानता हूँ कि क्रांति ही एकमात्र रास्‍ता है और एक न एक दिन वह होकर रहेगी। लेकिन अभी तो कहीं कुछ नहीं दिखता। लोग एकदम निराश हैं। ऐसी स्थिति में हम क्‍या करें?”

मित्र का सवाल बुनियादी था। क्रांति जब दूर है, तब हम क्‍या करें? इसका एकमात्र उत्‍तर यही हो सकता है कि चींटी, दीमक और मधुमक्‍खी की तरह लगातार, अनथक अपने काम में लगे रहो, क्रांति की तैयारी लगातार जारी रखो, जहाँ भी मौका मिले सत्‍ता के खिलाफ़ आवाज़ उठाओ, हर सम्‍भव तरीके से आम लोगों को जागृत, एकजुट और संगठित करने की कोशिशें अनवरत जारी रखो। अन्‍याय और अधिकारों के अपहरण के विरुद्ध रोज़-रोज़, जहाँ कहीं भी मौका और गुंजाइश हो, आवाज़ उठाओ और छोटे-छोटे अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए लोगों में यह यकीन पैदा करो कि लोग सामूहिक तौर पर जितने बड़े पैमाने पर संगठित होंगे, उतने बड़े पैमाने की जीत हासिल कर सकते हैं। समाज और देश-दुनिया के बारे में साम्राज्‍यवादी-पूँजीवादी मीडिया और सत्‍ताधर्मी बुद्धिजीवियों द्वारा जो भी बताया-समझाया जाता है, उसकी असलियत जानो-समझो और दूसरों को बताओ। यथास्थितिवादी जड़ता को तोड़कर क्रांतिकारी बदलाव के पक्ष में पब्लिक ओपीनियन तैयार करने के लिए वैकल्पिक क्रांतिकारी मीडिया संगठित करो। चीज़ों को बदलने के लिए लोगों की मानसिकता बदलो और खुद को भी बदलो।

प्रख्‍यात मार्क्‍सवादी दार्शनिक और ‘पब्लिक इण्‍टेलेक्‍चुअल’ स्‍लोवेज़ जिज़ेक की अवस्थितियाँ मरुभूमि की रेत की तरह स्‍थान-परिवर्तन करती रहती हैं, लेकिन अलग-अलग प्रसंगों में, टुकड़े-टुकड़े में, कई बार वे बहुत मार्के की बातें कह जाते हैं। जो लोग किसी क्रांतिकारी आंदोलन के खड़ा होने की प्रतीक्षा करते हैं और यह कहते हैं कि कोई क्रांतिकारी आंदोलन है ही नहीं कि वे उसमें शिरकत करें, उनके बारे में जिज़ेक लिखते हैं : ”प्रगतिशील उदार लोग प्राय: शिकायत करते हैं कि वे ”क्रांति” (या एक अधिक जुझारू मुक्तिकामी राजनीतिक आंदोलन) में शामिल होना पसंद करते हैं, लेकिन चाहे जितनी बेचैनी के साथ वे इसे खोजें, यह उन्‍हें कहीं नज़र नहीं आती (उन्‍हें सामाजिक स्‍पेस में कहीं भी ऐसी गतिविधि में संजीदगी के साथ संलग्‍न होने वाले संकल्‍प और ताकत वाला राजनीतिक अभिकर्ता नज़र नहीं आता)। हालाँकि इसमें एक हद तक सच्‍चाई है, लेकिन इसमें यह जोड़ना होगा कि इन उदारवादियों का रुख अपने आप समस्‍या का एक हिस्‍सा है: *यदि कोई व्‍यक्ति केवल एक क्रांतिकारी आंदोलन को ”देखने” का इन्‍तज़ार करता है, तो, निश्‍चय ही, वह कभी नहीं उठ खड़ा होगा, और वह उसे कभी नहीं देख पायेगा।”

क्रांति की दुनिया में पर्यवेक्षक के जड़ सन्‍दर्भ-चौखटे से चीज़ों को नहीं समझा जा सकता। आपको स्‍वयं किसी हद तक सक्रिय कारक तत्‍व बनना होता है। कारक ही यहाँ वस्‍तुनिष्‍ठ पर्यवेक्षक हो सकता है। यहाँ ‘तीन पाई ढूँढ़ने के लिए गहरे पानी पैठने’ की दरकार होती है। ‘रामझरोखे बैठकर जग का मुजरा’ तो लिया जा सकता है, लेकिन वस्‍तुनिष्‍ठ समालोचना नहीं की जा सकती। भावुकतावादी क्रांतिवादी बुद्धिजीवी प्राय: सदिच्‍छावान सदगृहस्‍थ होते हैं। वे ‘फेंससिटर’ और ‘आउटसाइडर’ होते हैं जो प्राय: आंदोलन की ठोस समस्‍याओं को दरकिनार करके क्रांतिकारियों को ”जल्‍दी-जल्‍दी क्रांति नहीं करने के लिए” कोसते-धिक्‍कारते हैं, स्‍वयं मात्र रायबहादुरी का काम करते हैं और क्रांतिकारी संघर्षों की हर विफलता के बाद रुदालियों की तरह छाती पीट-पीटकर विलाप करते हैं। ऐसे चतुर सुजान लोग ‘फेंससिटर’ होने या हाशिए पर खड़े या पड़े होने की सहूलियतों और फायदों से बखूबी वाकिफ़ होते हैं। उन्‍हें आलोचना करने और नसीहतें देने के अवसर हमेशा सुलभ होते हैं लेकिन आत्‍मालोचना की नौबत कभी नहीं आती। चूँकि वे सामाजिक-राजनीतिक प्रयोगों और सरगर्मियों में शामिल नहीं होते, इसलिए उनसे ग़लतियाँ होती ही नहीं। ऐसे लोग हाशिए पर धकेले नहीं जाते, बल्कि खुद ही जाकर खड़े हो जाते हैं और सुविधानुसार अपनी स्थिति का इस्‍तेमाल करते हैं। ऐसे ही लोगों पर थियोडोर अडोर्नो की यह उक्ति एकदम सटीक बैठती है : ”वह जो चीज़ों से किनारा करके खड़ा रहता है, उसके साथ यह जोखिम होता है कि वह अपने आपको दूसरों से बेहतर समझने लगे और समाज की अपनी आलोचना का दुरुपयोग अपने निजी हितों के तौर पर करने लगे।”

प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के बड़े हिस्‍से का मध्‍यवर्गीय अवसरवाद यह है कि वह दुनिया को न्‍यायपूर्ण और शोषणमुक्‍त देखना चाहता है, लेकिन इसके लिए स्‍वयं कोई जोखिम नहीं उठाता। यह तबका अपनी इस कमजोरी को भी बखूबी समझता है, लेकिन इसे दूर करने की कोशिश तो दूर, इसके बारे में बेलागलपेट बात करने की भी हिम्‍मत नहीं जुटा पाता। गोरख पाण्‍डे की प्रसिद्ध कविता ‘समझदारों का गीत’ ऐसे ही ”समझदार” बुद्धिजीवियों के जीवन का ‘थीम सांग’ है:

हवा का रुख कैसा है, हम समझते हैं

हम उसे पीठ क्‍यों दे देते हैं, हम समझते हैं

हम समझते हैं खून का मतल‍ब

पैसे की कीमत हम समझते हैं

क्‍या है पक्ष में विपक्ष में क्‍या है, हम समझते हैं

हम इतना समझते हैं

कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं

चुप्‍पी का मतलब भी हम समझते हैं

बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम

हम बोलने की आज़ादी का

मतलब समझते हैं

टुटपुँजिया नौकरी के लिए

आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं

मगर हम क्‍या कर सकते हैं

अगर बेरोजगारी अन्‍याय से

तेज़ दर से बढ़ रही है

हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनो के

ख़तरे समझते हैं

हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं

हम समझते हैं

हम क्‍यों बच जाते हैं, यह भी हम समझते हैं

हम सरकार से दुखी रहते हैं

कि समझती क्‍यों नहीं

हम जनता से दुखी रहते हैं

कि भेडि़याधसान होती है

हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं

हम समझते हैं

मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी

हम समझते हैं

यहाँ विरोध ही वाजिब कदम है

हम समझते हैं

हम कदम-कदम पर समझौते करते हैं

हम समझते हैं

हम समझौते के लिए तर्क गढ़ते हैं

हर तर्क गोल-मटोल भाषा में

पेश करते हैं, हम समझते हैं

हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी

समझते हैं

वैसे हम अपने को किसी से कम

नहीं समझते हैं

हर स्‍याह को सफेद और

सफेद को स्‍याह कर सकते हैं

हम चाय की प्‍यालियों में

तूफान खड़ा कर सकते हैं

करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं

अगर सरकार कमज़ोर हो

और जनता समझदार

लेकिन हम समझते हैं

कि हम कुछ नहीं कर सकते

हम क्‍यों कुछ नहीं कर सकते हैं

यह भी हम समझते हैं

क्रांति अभी दूर है, यह सोचकर कुछ न कुछ करना और अपने आसपास घट रहे तमाम अनाचार-अत्‍याचार-भ्रष्‍टाचार-अन्‍याय-बर्बरता-अमानवीकरण से आँखें मूँदकर बस अपने में मस्‍त होकर जीना, बस अपनी तरक्‍की और सुविधाओं के बारे में सोचना वास्‍तव में पूँजीवादी सनक और उन्‍माद की उम्र बढ़ाना है। क्रांति अभी दूर है, यह सोच कर उसे और दूर धकेलना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

क्रांति एक सचेतन सामूहिक और वैज्ञानिक क्रिया है। जितनी मेहनत और लगन से लोगों को इसके लिए तैयार किया जायेगा, इसे उतना ही निकट लाया जा सकता है। क्रांति अभी दूर है तबतो आराम एकदम हराम है। तब तो क्रांति की तैयारी में अपनी पूरी ताकत झोंक दी जाये, यही तार्किक निष्‍कर्ष होना चाहिए।

आज से एकदम भिन्‍न, एकदम नयी, समूची दुनिया सम्‍भव है। एक बेहतर भविष्‍य सम्‍भव है। लेकिन हमें उठ खड़ा होना होगा और उसके लिए लड़ना होगा। अपने आसपास के पतन और पागलपन की ओर, अराजकता और अलगाव की ओर, सत्‍ताधारियों की लूटपाट और अपराधों की ओर, अंधी प्रतिस्‍पर्धा में एक-दूसरे को रौंद-कुचलकर आगे बढ़ते लोगों की ओर, महज़ ज़‍न्दिा रहने के लिए आम आदमी द्वारा रोज़-रोज़ किये जा रहे संघर्षों की ओर और असीम दु:खों के महासमुद्रों में जगमगाते ऐश्‍वर्य-द्वीपों की ओर नज़र दौड़ाओ। मनुष्‍यता को यदि बचाना है तो पूँजीवाद को एक गहरी क़ब्र खोदकर उसमें दफ़्न करना होगा।

पूँजीवाद ‘इतिहास को अन्‍त’ कत्‍तई नहीं हो सकता। मनुष्‍यता को अभी इससे आगे, बहुत आगे जाना है। वैज्ञानिक इतिहास-दृष्टि से जन्‍में इस विश्‍वास को प्रख्‍यात मार्क्‍सवादी विचारक ग्‍यॉर्गी लूकाच ने इन शब्‍दों में अभिव्‍यक्‍त किया है: ”यह सच है कि हमारी संस्‍कृति इस समय अँधियारे के बीच से गुजर रही है, परन्‍तु इतिहास दर्शन के ऊपर यह दायित्‍व है कि वह इस बात निर्णय ले कि जो अँधियारा इस छाया हुआ है वह हमारी संस्‍‍कृति की, और हमारी अन्तिम नियति है, अथवा भले हम तथा हमारी संस्‍कृति एक लम्‍बी, अँधेरी सुरंग के बीच से गुजर रहे हों, अन्‍तत: हम उससे बाहर आयेंगे और प्रकाश के साथ हमारा साक्षात्‍कार एक बार फिर होगा। बुर्जुआ सौन्‍दर्यशास्त्रियों का विचार है कि इस अँधियारे के चंगुल से उबरने का कोई भी रास्‍ता शेष नहीं बचा, जबकि मार्क्‍सवादी इतिहास-दर्शन मनुष्‍यता के विकास की व्‍यवस्‍था के क्रम में हमें यह निष्‍कर्ष देता है कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि मनुष्‍य की यह विकासयात्रा निरुद्देश्‍यता या निरर्थकता में ही समाप्‍त हो जाये। वह एक निश्चित, सार्थक गन्‍तव्‍य तक अवश्‍य पहुँचेगी।”

 

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