उदय मोहन पाठकव्यंग्य

प्रणाम : चारेां महानुभावों को मेरा प्रणाम! –उदयमोहन पाठक (अधिवक्ता)

प्रणाम
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एक किसान कही जा रहा था। रास्ते में उसे चार आदमी मिले। किसान ने उन्हें स्वभाववश प्रणाम किया और आगे बढ़ गया। कुछ आगे बढ़ते ही चारों यह कहकर आपस में लड़ने लगे कि किसान ने मात्र उसे प्रणाम किया। उन्होंने किसान को बुलाकर पूछा भाई तुमने किसे प्रणाम किया? किसान आश्चर्यचकित हो गया। उसने कहा कि आप लोगों मे जो सबसे बड़ा मुर्ख है, मैने उसे प्रणाम किया है। अब चारों ने बारी-बारी से अपनी मूर्खता का बखान करना शुरू किया। पहला बोला- मैं एक बड़ा जमींदार था। मेरे अधीन रहने वाले सभी लोग मेरा बहुत सम्मान करते थें। मैं उन्हें अपनी प्रजा समझता था। धन-संपति की कोई कमी नही थीं इसलिए मैं भोग-विलास में लगा रहता था। मुझे हाथी खरीदने का बड़ा शौक था। एक दिन मैं अपने मैनेजर के साथ हाथी खरीदने मेले में गया। मेले में डेढ़ लाख का एक हाथी पसंद आया। मैं पचास हजार रूपये लेकर ही मेले में गया था। मैंने हाथी विक्रेता को पच्चास हजार रूपये दिए और मेर घर आकर पैसे ले जाने को कहकर हाथी घर ले आया। दूसरे दिन हाथी विक्रेता आ गया, मेरे पास पैसे नहीं थे। इसलिए पचास हजार में मैंने अपनी जमींदारी उसके नाम कर दीं। जब उसने बाकी पचास हजार रूपये की मांग की तो मैंने उस उक्त बाकी रूपये के बदले में हाथी वापस दे दिया। मेरी जमींदारी भी गई और मेरा हाथी भी गया। तब से मुझे मेरी जमींदारी में रहने वाले लोग मुर्ख जमींदार कहते हैं। इसलिए मैं ही सबसे बड़ा मूर्ख हूँ। किसान ने मुझे प्रणाम किया है।

यह सुनकर दूसरा बोला- मैं एक कर्मकाण्डी ब्राह्मण हूँ।  मेरे हजारों यजमान हैं। एक अमावस्या की रात्रि को मेरे घर चोर घुसा। मेरी पत्नी ने उसे देख लिया, उसने मुझे जगाया। मैं शोर मचाने ही वाला था कि मुझे अपने पंचाग की याद आई और पंचाग देखने पर पता चला कि पूर्णिमा के बारह बजे रात को हल्ला करने का शुभ मुहूर्त है। हम दोनों चुपचाप सो गए। पूर्णिमा के दिन मेरा दामाद आए। हमलोग सभी खा -पीकर सेा गए। मेरे दामाद रात केा शौच के लिए निकले ही थे कि हल्ला करने का शुभ मुहुर्त हो गया। हम दोनों चोर-चोर चिल्लाने लगे। गांव के लोग उन्हें पहचानते नहीं थे। गाँववालों ने उन्हे चोर समझकर काफी मारा-पीटा और थाना ले गए। थानेदार साहब ने मुझे थाने बुलाया और मुझे चोर पहचाने के लिए कहा। मैं थाने में अपने दामाद को बंद देखकर आश्चर्यचकित था। मैने थानेदार से कहा कि ये मेरे दामाद है। कल ही शाम को मेरे घर आए हैं। थानेदार ने पूछा-आपके यहां कब चोरी हुई? ब्राह्मण ने कहा अमावस्या की रात। फिर कहा-सरकार, हल्ला करने का शुभमुहुर्त पूर्णिमा को था। मुझे पता नहीं था कि मेरे दामाद उसी समय शौच के लिए निकले हैं। गाँववालो ने उन्हें चोर समझ पीट दिया। तब से मुझे पूरा गाँव मुझे मुर्ख ब्राह्मण कहता है। क्योंकि मैंने अपने दामाद को ही पिटवा दिया।

यह सुनकर तीसरे ने कहा कि मैं एक व्यापारी हूँ। लोग मुझे मूर्ख सेठ कहकर पुकारते हैं। मैं अपने घर से एक मील दूर एक हाट में दुकान लगाता हूँ। मैं सुबह दुकानदारी का सारा सामान लेकर मंडी में जाता हूँ। सारा दिन दुकानदारी करता हॅूं । शाम को थका-हारा घर लौटता हूँ और जल्दी खा-पीकर सो जाता हूँ। एक बार आधी रात को मैं मूत्रत्याग हेतु उठा तो देखा कि हर घर में दीपमालाएं सजी हुई हैं। मैंने तुरंत अपनी पत्नी को जगाया ओर कहा कि आज दीपावली है और तुमने मुझे बताया नहीं। चलो दीया जलाओं। गणेश-लक्ष्मी के पूजन की तैयारी करो। मेरी पत्नी ने तुरंत दीये जलाये ओर हम दोनों ने गणेश और लक्ष्मी जी का पूजन किया। पूजन के समय मैंने घर के सारे दरवाजे खेाल दिये ताकि लक्ष्मी जी का आगमन सुगमतापूर्वक हो सके। फिर हम दोनों ने सेठ धर्म के नाते कुछ लाभ कमाने के लिए आपस में एक शर्त रखी कि जो पहले बोलेगा, वह सौ रूपये हार जायेगा और उस वह अपने विपक्षी को सौ रूपये देगा। हम दोनों चुपचाप बैठ गए। दरवाजा खुला था। चोर घुस गए। हम दोनों ने चोर को देखा किन्तु चुप रहे क्योंकि दीपावली के दिन हारना अशुभ था। चोर घर का सामान उठाकर आंगन में जमा करने लगे। कुछ उन सामानों का गट्ठर बाँधने लगे। जैसे ही चोर ने मेरी सेठानी का बक्सा उठाया, वह चिल्लाने लगी- देखो चोर मेरा बक्सा ले जा रहा है। मैं चोर से बक्सा छीनने की जगह सेठानी से सौ रूपये मांगने लगा क्योंकि दीपावली में हारना अशुभ था। चोर मेरा लाखों का सामान ले गए, लेकिन मैं सौ रूपये के फेर में पड़ा रहा। तब से सारे लोग मुझे मुर्ख सेठ कहते हैं। इसलिए इस किसान ने मुझे प्रणाम किया क्योंकि वह मुझे पहचानता हेागा।

चौथे ने कहा-अजी छोड़ो मूर्खता में कोई मेरी बराबरी नहीं कर सकता मैं एक अमीन हूँ। जमीन का नाप-जोख करता हूँ लेकिन मैंने आाज तक हिसाब में कभी गलती नहीं की है। एक बार की बात हे कि मैं दिन भर के काम से थका-मांदा घर पहूँचा तो मेरी पत्नी मायके जाने की जिद कर बैठी। मैंने भी गुस्से से कह दिया कि तैयारी करो। मैं तुम लोगों को सुबह पहूँचा दूंगा। पत्नी तैयारी करने लगी और मैं सो गया। रात में काफी वर्षा हुई। चारों तरफ पानी ही पानी था। मेरी पत्नी के मायके पैदल ही जाना पड़ता था। इसलिए सुबह सभी पैदल ही गंतव्य की ओर निकल पड़े। पत्नी ने दोनों बच्चों का हाथ पकड़ा और मैंने सारा समान उठा लिया। घर से दो मील की दूरी पर एक नदी थी। नदी की स्थिति देखकर मेरी अमीनी बुद्धि जाग गई। मैंने उन मछुआरों में से एक को बुलाया ओर पैसे देखाकर नदी में पानी नापने के लिए राजी किया। मैंने उसके हाथ में चैन थमा दीं वह नदी में उतरा और पानी नापने लगा। कहीं आधा फीट, कहीं एक फीट, कहीं 5 फीट तो कहीं दस फीट। फिर आधी नदी के बाद घटते पानी को नापा फिर मैंने पूरा हिसाब निकालकर औसत निकाला कि पूरे नदीं में औसत के हिसाब से ढाई फीट पानी है। मैंने पत्नी ओर बच्चों को कहा कि कोई डरने की बात नहीं है। पानी में उतरो ओर नदी पार कर जाओ। पत्नी और बच्चे आगे बढ़े ओर मैं पीछे सामान लेकर चला। नदी में चार-पांच मीटर की दूरी तय करते ही मेरी पत्नी ओर बच्चे बह गए। पानी का बहाव तेज था। मैं उन्हें बचा नहीं सका। मैंने फिर अपने हिसाब को देखा, जोड़-घटाव किया, लेकिन मेरा हिसाब सही था। मेरा संसार उजड़ गया और मैं अपना हिसाब सही पाकर इतराता रहा। तब से सभी लोग मुझे मुर्ख अमीन कहकर बुलाते हैं। इतना सूनते ही वह किसान जोर-जारे से हॅंसने लगा ओर बोला-आप चारों ने मूर्खता में कीर्तिमान हासिल किया है। इसलिए आप चारों प्रणम्य है। मैंने आप चारों को ही प्रणाम किया।

 

This post was written by Uday Mohan Pathak.

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