Breaking News
Home / न्यूज़ पटल / एडिटोरियल / आर्टिकल / फिल्‍म परिचय – एक रुका हुआ फ़ैसला

फिल्‍म परिचय – एक रुका हुआ फ़ैसला

Spread the love
  • 11
    Shares

फिल्‍म इस लिंक से ऑनलाइन देखी जा सकती है

‘एक रुका हुआ फ़ैसला’ 1986 में बनी बासु चटर्जी की फ़ि‍ल्‍म है। यह सिडनी ल्‍यूमेट की प्रसिद्ध अमेरिकी फ़ि‍ल्‍म ’12 ऐंग्री मेन’ का रीमेक है। 

कहानी अदालत में शुरू होती है जहाँ शहर की झुग्‍गी बस्‍ती में रहने वाले एक किशोर पर अपने पिता की हत्‍या का मुक़दमा चल रहा है। सारी दलीलें सुनने के बाद जज ने जूरी के 12 लोगों को अभियुक्‍त के दोषी या निर्दोष होने का फ़ैसला करने का निर्देश दिया है।

दोष सिद्ध होने का मतलब है सज़ाए-मौत। जूरी के सभी सदस्‍य राय बना चुके हैं कि गिरफ़्तार लड़का ही हत्‍यारा है और जल्‍द से जल्‍द फ़ैसला देकर निकल लेना चाहते हैं। सिर्फ़ एक व्‍यक्ति चाहता है कि सारे तथ्‍यों पर ठीक से विचार कर लिया जाये। उसके विरोध से जूरी के बाकी सदस्‍य खीझ उठते हैं और एक लम्‍बी बहस शुरू हो जाती है।

यह फ़ि‍ल्‍म कोई सस्‍पेंस थ्रिलर नहीं बल्कि लोगों के बारे में है। यह उस हत्‍या या उस लड़के के बारे में नहीं, बल्कि उसकी क़ि‍स्‍मत का फ़ैसला करने वाले लोगों के बारे में, उनके वर्गीय और सामाजिक पूर्वाग्रहों के बारे में है। लोग किन चीज़ों से नफ़रत करते हैं, किन चीज़ों का समर्थन करते हैं, और उसके पीछे की वजहें क्‍या होती हैं।* यह एक ऐसे व्‍यक्ति के बारे में है, जिसे जब महसूस होता है कि जूरी के कुछ लोग सिर्फ़ इस वजह से ‘दोषसिद्ध’ होने के पक्ष में वोट दे रहे हैं क्‍योंकि वह लड़का उनके बीच से नहीं है, तो वह आवाज़ उठाता है — क्‍योंकि ख़ुद उसका बचपन झुग्गियों में बीता है और वह भी ऐसे पूर्वाग्रहों का सामना कर चुका है। यह एक ऐसे व्‍यक्ति के बारे में है जो अपनी राय बदलने के लिए चौतरफ़ा दबावों का सामना करता है, लेकिन आख़ि‍र में, तर्क के आधार पर सच्‍चाई को स्‍वीकार करता है।

यह फ़ि‍ल्‍म एक ऐसे व्‍यक्ति के बारे में है जो ख़ुद में इतना डूबा है कि उसे इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि लड़का दोषी है या नहीं; वह बस इस लम्‍बी बहस के ख़त्‍म होने का इंतज़ार कर रहा है ताकि जल्‍दी से अपनी आरामदेह मध्‍यवर्गीय ज़ि‍न्‍दगी में लौट सके। यह भीड़ के पीछे चलने और हमेशा सुरक्षित राह चुनने वालों के बारे में है। यह उनके बारे में है जो ‘एकला चलने’ की हिम्‍मत दिखाते हैं। यह अपने पूर्वाग्रहों से अन्‍धे हो जाने बनाम सच के पक्ष में खड़े होने के बारे में है। यह अपने आप में मगन रहने की सोच, अहं और दंभ, ‘हम’ बनाम ‘वे’ के बारे में भी है। चौथाई सदी बाद भी यह फ़ि‍ल्‍म दिलो-दिमाग़ को झकझोरती है क्‍योंकि वर्ग, जाति, न्‍यायिक प्रणाली में मौजूद खामियाँ, वर्गीय और मानवीय पूर्वाग्रह आदि के सवाल आज भी हमारे सामने बने हुए हैं।

कुछेक छोटे-छोटे दृश्‍यों को छोड़कर पूरी फ़ि‍ल्‍म एक बन्‍द कमरे में चलती है लेकिन क्‍या मजाल कि दो घण्‍टे की इस फ़ि‍ल्‍म के दौरान आपको उठने की इच्‍छा भी हो।

निर्देशक बासु चटर्जी ने हर पात्र के लिए बहुत ही मँजे हुए अभिनेताओं का इस्‍तेमाल किया है। रंजीत कपूर के संवाद और अजय प्रभाकर का कुशल कैमरा वर्क लगातार दर्शकों को बाँधकर रखते हैं

मजदूर बिगुल

About Oshtimes

Check Also

अम्बेडकर आवास योजना jharkhand

अम्बेडकर आवास योजना : सरकार ने विधवायों को उनके आवास से वंचित रखा

Spread the love46Sharesडॉक्टर भीम राव अंबेडकर की 125वीं जयंती के अवसर पर झारखंड की रघुबर …