Breaking News
Home / न्यूज़ पटल / एडिटोरियल / आर्टिकल / ब्रह्माण्ड के रहस्यों को सुलझाने की दिशा में बढ़ा इन्सान का एक और क़दम

ब्रह्माण्ड के रहस्यों को सुलझाने की दिशा में बढ़ा इन्सान का एक और क़दम

Spread the love
  • 23
    Shares

सत्यम
मनुष्य हमेशा ही ब्रह्माण्ड के रहस्यों को समझने की कोशिश करता रहा है। 

हज़ारों साल पहले जब मनुष्य जंगलों में रहता था तब उसे प्रकृति के रहस्य जादू-टोने की तरह लगते थे और वह मौसम बदलने, बिजली गिरने, जीवन और मृत्यु जैसी प्राकृतिक घटनाओं को अदृश्य और जादुई शक्तियों के कारनामे के रूप में देखता था।* जिन चीज़ों को वह समझ नहीं पाता था और जिनसे उसे डर लगता था उनकी वह पूजा करने लगता था। बाद में मनुष्यता जैसे-जैसे ज्ञान-विज्ञान की राह पर आगे बढ़ती गयी, वैसे-वैसे कुदरत की किताब के पन्ने उसके आगे खुलते चले गये और अपने आसपास होने वाली घटनाओं के कारणों को मनुष्य समझने लगा। ख़ासतौर पर पिछले 200-300 वर्ष के दौरान तो विज्ञान का ज़बर्दस्त विकास हुआ है और मनुष्य अपनी धरती और पूरे ब्रह्माण्ड के बारे में अधिकाधिक ज्ञान हासिल करता गया है। 

प्रकृति के इन रहस्यों की समझदारी से मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाने वाले बहुत-से आविष्कार भी हुए और साथ ही समाज व्यवस्था को ज्यादा न्यायपूर्ण बनाने के संघर्ष में भी इस ज्ञान ने मनुष्य को राह दिखायी। इसीलिए शासक वर्ग हमेशा ही यह कोशिश करते रहे हैं कि आम लोगों तक विज्ञान की समझदारी और जीवन को देखने की वैज्ञानिक दृष्टि न पहुँच सके।
चार जुलाई 2012 विज्ञान की अनवरत यात्रा में एक यादगार दिन था। इस दिन वैज्ञानिकों ने घोषणा की कि उन्होंने ‘हिग्स बोसोन’ नाम के एक ऐसे सूक्ष्म कण को ढूँढ़ निकाला है जिसकी खोज में पिछले कई दशक से वैज्ञानिक लगे हुए थे। उन्होंने यह भी घोषणा की कि इस खोज से ब्रह्माण्ड के बहुत से रहस्यों पर से पर्दा उठने का रास्ता खुल जायेगा। अब इस बात को समझा जा सकेगा कि यह पूरा ब्रह्माण्ड, जिसका एक बहुत छोटा-सा हिस्सा हमारी धरती और सौरमण्डल है, पैदा कैसे हुआ।
आखिर क्या है यह ‘हिग्स बोसोन’?

 

भारत के कई अख़बारों और टीवी चैनलों ने इस घटना की रिपोर्टिंग इस ढंग से की मानो यह कोई वैज्ञानिक खोज नहीं बल्कि दैवी चमत्कार हो। जिस इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विज्ञान की ख़बरों के लिए कभी जगह नहीं होती थी, उस पर पूरे दिन यह ख़बर छायी रही और अख़बारों के पहले पन्ने पर पहली ख़बर के रूप में इसे छापा गया। ज्यादातर ने इसे ”ईश्वरीय कण” की खोज घोषित कर दिया। कुछ ने तो यह दावा भी कर दिया कि इस खोज के साथ ही मनुष्य ईश्वर के बिल्कुल करीब पहुँच गया है! मगर इस ‘हिग्स बोसोन’ की असलियत क्या है? आख़िर ये है क्या बला?
वास्तव में इस कण का ईश्वर से कोई लेना-देना नहीं है। बोलचाल की भाषा में अंग्रेज़ी में इसे ‘गॉड पार्टिकल’ कहा गया था क्योंकि इसका पता ही नहीं चल रहा था। यह कोई सटीक वैज्ञानिक शब्द नहीं है। ज्यादातर वैज्ञानिक तो इस नाम का इस्तेमाल करने के विरोधी हैं क्योंकि इससे लोगों में गलत सन्देश जाता है और भ्रम पैदा होता है। लेकिन भारत में मीडिया इसी शब्द को क्यों ले उड़ा इसे समझना मुश्किल नहीं है। जो मीडिया लोगों के बीच वैज्ञानिक चेतना और समझदारी का प्रचार-प्रसार करने के बजाय दिनो-रात पोंगापन्थ और अन्‍धविश्‍वास फैलाने में लगा रहता है उससे कुछ और उम्मीद करना ही बेकार है।
‘हिग्स बोसोन’ को वह कण माना जाता है जिसके कारण ब्रह्माण्ड के तमाम कणों में आकार और भार होता है। जैसाकि हम जानते हैं, हमारा ब्रह्माण्ड, चाँद-सूरज-सितारे, आकाशगंगाएँ, सौरमण्डल, यह धरती और इस पर बसने वाले जीव, यह सबकुछ सूक्ष्म कणों से मिलकर बना है। पहले माना जाता था कि पदार्थ का सबसे छोटा कण परमाणु है लेकिन फिर पता चला कि इसके भीतर इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और क्वार्क नाम के और भी छोटे-छोटे कण होते हैं। ये कितने छोटे होते हैं इसका अन्दाज़ा इस बात से लगाइये कि एक महीन सुई की नोक पर लाखों परमाणु समा सकते हैं। 1964 में पीटर हिग्स नाम के वैज्ञानिक ने बताया कि इन कणों को आकार और भार देने वाला एक और कण है जिसे उन्हीं के नाम पर ‘हिग्स बोसोन’ कहा गया। बोसोन कणों का यह नाम प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्रनाथ बोस के नाम पर रखा गया जिन्होंने 1920 के दशक में महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ काम किया था और बहुत महत्वपूर्ण सैद्धान्तिक खोजें की थीं। मगर ‘हिग्स बोसोन’ का पता चलने से दुनिया के बारे में हमारी समझ बेहतर कैसे होगी, इस बात को समझने के लिए पहले कुछ और बातों को जान लेना ज़रूरी है।
*ब्रह्माण्ड को जन्म देने वाला ‘महाविस्‍फोट’*
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बारे में तरह-तरह की बातें की जाती हैं। ईसाई धर्म के अनुसार ईश्वर ने सृष्टि की रचना की। पहले दिन उसने रात और दिन बनाये, दूसरे दिन धरती और आकाश, तीसरे दिन पेड़-पौधे, चौथे दिन चाँद-सूरज और तारे, पाँचवे दिन तमाम पशु और पक्षी बनाये और फिर छठे दिन उसने मनुष्य की रचना की। इतना काम कर लेने के बाद थककर सातवें दिन ईश्वर ने आराम किया और इसीलिए सप्ताह के सातवें दिन छुट्टी का दिन माना गया। हिन्दू धर्म में बताया जाता है कि ब्रह्मा ने सृष्टि का निर्माण किया। ख़ुद ब्रह्मा का जन्म विष्णु की नाभि से हुआ था। कई अन्य धर्मों में सृष्टि की उत्पत्ति की अलग-अलग कहानियाँ मिलती हैं। लेकिन वैज्ञानिकों ने अब यह साबित कर दिया है कि ब्रह्माण्ड की शुरुआत एक ‘महाविस्‍फोट’ (बिग बैंग) से हुई थी। लगभग 14 अरब वर्ष पहले एक बिन्दु से ब्रह्माण्ड ने फैलना शुरू किया। इसे ही महाविस्‍फोट कहा जाता है। विस्‍फोट के समय पैदा हुई ऊर्जा प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन सहित विभिन्न सूक्ष्म कणों में तब्दील हो गयी। महाविस्‍फोट के कुछ ही मिनट बाद प्रोटॉन और न्यूट्रॉन के मिलने से पहलेपहल परमाणु नाभिक अस्तित्व में आये लेकिन उनके साथ इलेक्ट्रानों के जुड़कर परमाणु बनने में हज़ारों वर्ष का समय लग गया। सबसे पहले बनने वाला तत्व था हाइड्रोजन गैस जिसमें हीलियम और लिथियम की भी कुछ मात्रा थी। इन गैसों से बने विराटकाय बादल अन्तरिक्ष में घूमते रहते थे जो गुरुत्व बल के कारण घने हो-होकर लाखों वर्ष के दौरान तारे और आकाशगंगाएँ बन गये। हमारी धरती भी पहले आग का एक जलता हुआ गोला थी जो धीरे-धीरे करोड़ों वर्ष के दौरान ठण्डी हुई और कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण यहाँ पर पानी और फिर जीवन की उत्पत्ति हुई।
बिग बैंग सिद्धान्त को अच्छी तरह जाँचा-परखा गया है और दुनियाभर के वैज्ञानिक अब सृष्टि की उत्पत्ति के इसी सिद्धान्त को सही मानते हैं। कई लोग पूछ सकते हैं कि महाविस्‍फोट के पहले क्या था? इसका सीधा जवाब होगा, कुछ नहीं। वैसे यह सवाल ही अपनेआप में ग़लत है क्योंकि जिस क्षण महाविस्‍फोट हुआ वास्तव में उसी क्षण से क्या, कब, कहाँ, पहले, बाद में जैसी बातों की शुरुआत हुई। मनुष्य की चेतना काल और दिक् के आयामों से बाहर जाकर कुछ सोच ही नहीं सकती और ये आयाम भी उस क्षण पैदा हुए थे। पदार्थ, ऊर्जा, समय और स्थान की शुरुआत उसी बिन्दु से हुई थी। मगर इस विषय पर अभी इतना ही, वरना बात बहक जायेगी। इस पर हम आगे कभी अलग से चर्चा करेंगे।

आप पूछ सकते हैं, यह सारी कायनात जिस पदार्थ से बनी है वह किन बुनियादी कणों से मिलकर बनता है? उसका सबसे छोटा-से-छोटा रूप क्या है जिसे आगे और छोटे कणों में नहीं तोड़ा जा सकता? इन्सान बहुत पहले से इसके बारे में माथापच्ची करता आया है। लगभग दो हज़ार वर्ष पहले एक यूनानी दार्शनिक डेमोक्रिटस ने कहा था कि हर चीज़ बिल्कुल छोटी-छोटी इकाइयों से मिलकर बनी है। उसने इस कण को ‘ऐटम’ का नाम दिया। भारत में कणाद मुनि ने भी ईसा से दो शताब्दी पहले ही इस बात की चर्चा की थी कि हर चीज़ ‘अणु’ नाम के छोटे-छोटे कणों से बनी है जिन्हें और छोटे कणों में बाँटा नहीं जा सकता। बाद में वैज्ञानिक भी इसी नतीजे पर पहुँचे। बीसवीं सदी में वैज्ञानिकों ने ऐटम यानी परमाणु के भीतर भी घुसकर इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन की खोज कर ली। बाद में वैज्ञानिकों ने न्यूट्रॉन और प्रोटॉन के भीतर क्वार्क नामक कणों का पता लगाया। 1970 के दशक से वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड के जिस सिद्धान्त को मानते रहे हैं उसे ‘स्टैण्डर्ड मॉडल’ कहा जाता है। इसके अनुसार, प्रकृति में दो तरह के बुनियादी कण हैं : 12 सूक्ष्म कण जिन्हें फर्मियॉन कहते हैं, जिनसे पदार्थ बनता है। इनमें इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और क्वार्क होते हैं। दूसरी तरह के कण हैं चार बोसोन जो फर्मियॉनों के बीच अलग-अलग तरह के बल का आदान-प्रदान करते हैं। अलग-अलग कणों के मिलने से कोई पत्थर, या तारा, या मानव शरीर, या फूल बनेगा या वे मिलेंगे ही नहीं, यह प्रकृति की चार मूल शक्तियों  विद्युतचुम्बकीय, मज़बूत बल, कमज़ोर बल और गुरुत्वाकर्षण पर निर्भर करता है। गुरुत्वाकर्षण को छोड़कर ‘स्टैण्डर्ड मॉडल’ की अन्य सभी बातों को वैज्ञानिक प्रमाण सहित साबित कर चुके हैं। लेकिन एक गुत्थी बनी हुई थी, कि इन सभी कणों में भार कहाँ से पैदा होता है। ‘हिग्स बोसोन’ की परिकल्पना सामने आने के बाद सिद्धान्त रूप में इस बात का जवाब भी मिल गया था। लेकिन इस कण को अब तक न किसी ने देखा था और न ही इसके होने का कोई सबूत मिला था। इसकी खोज के लिए दुनियाभर में प्रयोग जारी थे।

लापता कण की तलाश में सोलह वर्ष से जारी महाप्रयोग



यूरोप के बीस देशों ने मिलकर 1996 में ‘हिग्स बोसोन’ की तलाश के लिए एक बहुत बड़े प्रयोग पर काम शुरू किया। यूरोपीय नाभिकीय अनुसन्धान संगठन (सर्न) की अगुवाई में फ़्रांस और स्विट्ज़रलैण्ड की सीमा पर ज़मीन से करीब सौ मीटर नीचे लगभग 27 किलोमीटर लम्बी गोलाकार सुरंग बनायी गयी। करीब 500 अरब रुपये की लागत से इसमें ‘लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर’ (एल.एच.सी.) नाम की एक विराटकाय वैज्ञानिक मशीन बनायी गयी है। इसे पार्टिकल एक्सलेरेटर यानी कणों की रफ्तार तेज़ करने वाली मशीन कहा जाता है। इसका इस्तेमाल करके वैज्ञानिकों ने उन सूक्ष्म कणों का अध्ययन करना शुरू किया जिनसे मिलकर सृष्टि की हर चीज़ बनती है। इसके ज़रिए वैज्ञानिक ठीक उसी तरह की परिस्थितियाँ पैदा करना चाहते थे जैसी कि महाविस्‍फोट के समय हुई थीं। उस महामशीन में अरबों सूक्ष्म कण एक-दूसरे से उल्टी दिशा में ज़बर्दस्त रफ्तार से चलते हुए आमने-सामने से टकराये जाते हैं जिससे कि ज़बर्दस्त ऊर्जा पैदा होती है। प्रकृति में प्रकाश की गति सबसे तेज़ यानी लगभग तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकण्ड होती है। इस मशीन में वैज्ञानिकों ने प्रकाश की गति की 99.99 प्रतिशत रफ्तार से कणों को चलाकर एक-दूसरे से टकराने में कामयाबी हासिल की। इतनी प्रचण्ड गति से हुई टकराहट के कारण कुछ ऐसे कण पैदा होते हैं जो केवल बहुत अधिक ऊर्जा पर ही अस्तित्व में आते हैं। विशेष डिटेक्टर यंत्रों द्वारा इन कणों का अध्ययन किया जाता है। दुनिया के करीब 110 देशों के वैज्ञानिकों की टीमें इस अध्ययन में लगी हुई हैं। इन विस्‍फोटों से पैदा होने वाले आँकड़ों का अम्बार कितना अधिक है इसका अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि एल.एच.सी. मशीन में हर एक सेकण्ड में लगभग 60 करोड़ टक्करें होती हैं।
वर्ष 2008 से वैज्ञानिक लगातार इन प्रयोगों में जुटे हुए थे लेकिन उन्हें सफलता मिलने की सम्भावना कम ही लग रही थी। मगर इस वर्ष अप्रैल से लेकर 18 जून तक लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर मशीन में हुए प्रयोगों के अध्ययन से ऐसा लगने लगा था कि वैज्ञानिक आख़िर उस छुपे रुस्तम के आसपास पहुँच गये हैं। 4 जुलाई को यह घोषणा की गयी कि आख़िरकार हिग्स बोसोन जैसे कण की मौजूदगी का पता चल गया है। लेकिन अभी इसे पूरी तरह साबित करने के लिए वैज्ञानिकों को कई महीने तक काम करना पड़ेगा। अगर यह वही हिग्स बोसोन है जिसकी तलाश थी, तो ब्रह्माण्ड के बारे में विज्ञान अब तक जो कहता आया है, उसकी पुष्टि हो जायेगी। और अगर पता चलता है कि यह उससे मिलता-जुलता कोई नया कण है तो भी बहुत बड़ी कामयाबी होगी। इससे फिर बहुत-सी नयी और उत्तेजक वैज्ञानिक खोजों के लिए रास्ता खुल जायेगा। यह कुछ ऐसा ही होगा जैसे आपको थोड़ी दूरी पर एक जाना-पहचाना चेहरा नज़र आता है, और आप सोचते हैं कि ये आपका वही गहरा दोस्त है जिसकी आपको काफी समय से तलाश थी। लेकिन पास जाने पर आप देखते हैं कि वह तो आपके दोस्त का जुड़वाँ भाई है जिसके साथ मिलकर आप फिर नयी-नयी यात्राओं पर निकल सकते हैं।


इस खोज से मनुष्यता को क्या मिलेगा?



पहली बात यह कि इस खोज से कुदरत को समझने का इन्सान का सफर ख़त्म नहीं होता, बल्कि यहाँ से नयी शुरुआत होगी। इस विराट ब्रह्माण्ड में अभी बहुत कुछ खोजने और जानने को पड़ा हुआ है। ब्रह्माण्ड में एक चींटी से लेकर करोड़ों मील दूर स्थित नक्षत्र तक, जो कुछ भी हम देखते हैं वह सामान्य कणों से मिलकर बना है। इन सब कणों को एक साथ पदार्थ (मैटर) कहते हैं, जिससे कि ब्रह्माण्ड का 4 प्रतिशत बना हुआ है। माना जाता है कि बाकी 96 प्रतिशत हिस्सा डार्क मैटर और डार्क एनर्जी से मिलकर बना है, लेकिन उनका पता लगाना और अध्ययन करना वैज्ञानिकों के लिए अब तक एक चुनौती बना हुआ है। इस प्रयोग से आगे चलकर ब्रह्माण्ड के इस अनजान अँधेरे हिस्से पर भी रोशनी पड़ सकती है।
दूसरे, यह नहीं भूलना चाहिए कि बीसवीं सदी की शुरुआत में जब महान वैज्ञानिक अर्नेस्ट रदरफोर्ड ने परमाणु की बुनियादी संरचना का पता लगाया था कि इसमें एक नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाते हुए इलेक्ट्रॉन होते हैं, तो किसी ने भी नहीं सोचा था कि इस खोज से कैसे परिणाम निकलेंगे। जेम्स वॉटसन और फ़्रांसिस क्रिक नाम के दो वैज्ञानिकों ने जब डीएनए की संरचना की खोज की थी तो भी ऐसा ही हुआ था। लेकिन आज हम जानते हैं कि परमाणु विज्ञान और चिकित्सा विज्ञान के लिए इन दो खोजों का कितना बड़ा महत्व था। निश्चित तौर पर, हिग्स बोसोन जैसे कणों की खोज और सर्न के महाप्रयोग से भी कई व्यावहारिक लाभ सामने आ सकते हैं। लेकिन यहीं पर एक बड़ा सवाल हमारे सामने आकर खड़ा हो जाता है।
आज विज्ञान और तकनोलॉजी आज़ाद नहीं हैं। उनसे होने वाली खोजों का किसके फायदे के लिए और क्या इस्तेमाल किया जाये, यह फैसला समूची इन्सानियत के हाथों में नहीं है। विज्ञान और तकनोलॉजी भी उन्हीं वर्गों के हाथों बन्धक हैं जिन वर्गों का उत्पादन के सारे साधनों पर कब्ज़ा है। जिस तरह कारख़ानों में काम करने वाले मज़दूर मुनाफा पैदा करने के लिए पूँजीपतियों के ग़ुलाम बना दिये गये हैं, उसी तरह बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाओं में काम करने वाले वैज्ञानिक अपने को आज़ाद भले ही समझते हों, पर हकीक़त में वे भी पूँजी के चाकर ही बनकर रह गये हैं। यही कारण है कि विज्ञान की शानदार तरक्की का लाभ दुनिया के 90 प्रतिशत लोगों तक पहुँचता ही नहीं। आज इन्सान चाँद और मंगल ग्रह पर पानी की खोज कर रहा है लेकिन धरती के बहुत बड़े हिस्से में करोड़ों लोग आज भी गन्दा पीने को मजबूर हैं। यही वजह है कि विज्ञान और तकनीक की हर नयी प्रगति करोड़ों मेहनतकशों की ज़िन्दगी को आसान बनाने के बजाय उनके लिए और अधिक शोषण, बेरोज़गारी और बदहाली लेकर आती है। विज्ञान को समस्त मानवता की सेवा में लगाने के लिए ज़रूरी है कि इस दुनिया को उलट-पलट दिया जाये। लूट और मुनाफे पर टिकी समाज व्यवस्था का नाश करके एक ऐसी व्यवस्था बनायी जाये जो सबके लिए इंसाफ, भाईचारे और बराबरी पर क़ायम हो। इसके लिए भी हमें विज्ञान को जानना और समझना होगा। दुनिया को चलाने वाले नियमों को जानना होगा और समाज को चलाने वाले नियमों को भी समझना होगा। हमें सवाल उठाना सीखना होगा और उन सवालों के जवाब ढूँढ़ने की हिम्मत जुटानी होगी।

About Oshtimes

Check Also

सत्ता के बूट

मौजूदा सत्ता के बूट (जूते) भारतीय संविधान से भी मजबूत

Spread the love68Sharesक्या मौजूदा सत्ता के बूट (जूते) भारतीय संविधान से भी ज्यादा मजबूत हैं  …