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भारत छोड़ो आन्दोलन
भारत छोड़ो आन्दोलन में झारखण्डवासियों की भूमिका : महेश अमन

भारत छोड़ो आन्दोलन में झारखण्डवासियों की भूमिका : महेश अमन

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झारखण्डवासियों की भारत छोड़ो आन्दोलन में अहम भूमिका

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में 1942 की क्रांति का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। इस समय झारखण्ड के कुछ हिस्सों में ऐसी राजनीतिक घटनाएं हुई थी, जिससे अंग्रेजी सरकार के पैरों तले की जमीन खिसकने लगी थी। बर्मा एवं सिंगापुर सीमा पर अंग्रेजी सेना की हार से झारखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में दहशत का वातावरण फैल गया था। बर्मा में व्यापार एवं कार्य कर रहे लोग भागने लगे थे। उन्हें यह लगने लगा था कि अंग्रेज उनकी रक्षा नहीं कर सकेंगे। अपनी रक्षा के लिए उन्हें अपने आपको संगठित करना पड़ेगा। 1942 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की एक बैठक हुई, जिसमें यह निर्णय लिया गया कि बिहार के हर क्षेत्र में संगठन का कार्य तेजी से चलाया जाये।

        7 और 8 अगस्त, 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक में ‘ भारत छोड़ो आंदोलन ‘ पास हुआ। जिसका नेतृत्व गांधी जी को सौंपा गया। जिसमें गांधी जी ने लोगों को ‘करो या मरो‘ का महामंत्र दिया। गांधी जी ने अलाथा हेरिसन को लिखे पत्र में मेरी सुढृक धारणा है कि अंग्रेजों को व्यवस्थित ढंग से अभी भारत से चले जाना चाहिए। उनका इस समय भारत से चले जाना उच्च कोटि के साहस का परिचायक होगा।

        दूसरे दिन 9 अगस्त 1942 को भारत के चोटी के नेता गांधी, नेहरू, आजाद, कृपलानी, सरोजिनी आदि को सुबह में गिरफ्तार कर लिया गया। जनता नेतृत्व विहीन हो गई। इस क्रांति के बारे में शंकर दयाल सिंह ने लिखा है- दस हजार से अधिक लोग मारे गये तथा एक लाख से अधिक लोग जेलों में बंद किये गए। हवाई जहाज से गोले बरसाये गये तथा मशीनगंजों का प्रयोग किया गया। दूसरी और जनता ने भी अपनी ताकत का परिचय दिया। लोगों ने 206 पुलिस स्टेशनों और 945 पोस्ट ऑफिसों को या तो जला दिया या उखाड़ फेंका।

        इस आंदोलन ( भारत छोड़ो आन्दोलन )में झारखण्डवासियों को भी अहम भूमिका थी। रॉंची जिला जो अब लीन तीन जिलों का रूप ले लिया है- रॉंची, लोहरदगा और गुमला यहां भी स्वाधीनता की भीनी-भीनी सुगंध कण-कण में समायी हुई है। विमल दास गुप्त, केशव दास गुप्त एवं सुनील कुमार राज को भूमिगत होकर आंदोलन चलाने के लिए फहराया। रॉंची जेल में दो बंदियां- शालीग्राम अग्रवाल और मोतीलाल अमेठिया ने जेलन का गला दबाकर उससे चाभी छीन ली।

        16 अगस्त को गुमला में गंगा महाराज और गोविन्द भगत को पुलिस ने इसलिए गिरफ्तार कर जेल भेज दिया क्योंकि वे लोगों को आंदोलन ( भारत छोड़ो आन्दोलन ) के लिए प्रेरित कर रहे थे। थाने में झंडा फहराने के प्रयास से पुलिस ने गनपत खण्डेलवाल को गिरफ्तार कर लिया। 19 अगस्त को ओरमांझी 20 अगस्त को सोना-हातू थानों पर आक्रमण हुए और उनके टेलीफोन तार काट लिए गये। 22 अगस्त को उटकी रंगखाली के बीच रेल की पटरियों को उखाड़ दिया गया। चरक भगत भूमिगत होकर आंदोलन करने लगा। 25 अगस्त को सिल्ली थाना के अन्तर्गत रॉंची, पुरूलिया रेल लाईन को उखाड़ दिया गया। तार काट दिए गए। गुमला, खुंटी, अनुमंडलों से सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। लोगों पर सरकार ने सामूहिक जुर्माना लगाया।, परंतु इसका असर नहीं हुआ।

        1942 में धनबाद जिला मानभूम जिले का एक अनुमंडल था, जिसका मुख्यालय पुरूलिया था। मानभूम जिले में जगह-जगह पर रेल लाईनें उखाड़ दी जाती थी। डाकघरों को लूट लिया जाता था। सरकारी भवनों पर कब तिरंगा झंडा फहरा दिया जाता था, इसकी खबर अंग्रेजों को मिल भी नहीं पाती थी। उपायुक्त की रिपोर्ट से सरकार ने दमनात्मक कार्यवाही तेज कर दी। दमनात्मक कार्यवाहियों के अन्तर्गत तीन राष्ट्रकर्मियों को गिरफ्तार किया गया। वे थे- अशोक नाथ चौधरी, समरेन्द्र मोहन राय एवं सुशीलचंद्र दास गुप्ता। धनबाद-गोमो स्टेशनों के बीच तार काटने, पटरियॉं उखाड़ने की घटनाओं के कारण पूरे क्षेत्र में सैनिकों को तैनात कर दिया गया। उसका नेतृत्व कैप्टन पुलिस को दिया गया। स्थिति नियंत्रण से बाहर देख शासन द्वारा कतरास, झरिया, धनबाद में कर्फ्यू लगा दिया गया।

        हजारीबाग में भी आंदोलन तेजी में था। 1942 का हजारीबाग अब पॉंच जिलों में विभक्त हो गया है- हजारीबाग, गिरिडीह, बोकारो, चतरा और कोडरमा। भारत छोड़ो आंदोलन के कांग्रेसी संकल्प के तुरंत बाद इस जिले के सक्रिय नेता रामनारायण सिंह और सुखलाल सिंह को 9 अगस्त को ही गिरफ्तार कर लिया गया था। श्रीमती सरस्वती देवी को जुलूस का नेतृत्व करते हुए 11 अगस्त को गिरफ्तार कर लिया गया।

        11 अगस्त को पुलिस फायरिंग में शहीद छात्रों की सूचना पुलिस जिलों में दवाग्नि की तरह पहुॅच चुकी थी। इस सूचना को मिलते ही स्कूल और कॉलेजों के छात्र सड़कों पर आ गए। आयुक्त के कार्यालय भवन से यूनियन जैक के झंडे को उतार कर राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया।  

        स्थानीय सरकारी भवनों, डाकघर, डाकबंगले, स्टेशन, क्लब पर झंडे फहराये गए। सेंट कोलम्बस के छात्र इन कामों में सबसे अधिक सक्रिय रहे। सरकारी कर्मचारियों को उनके पदों से त्याग पत्र देकर आंदोलन ( भारत छोड़ो आन्दोलन )में भाग लेने के लिए प्रेरित करने के कारण जगदीश राम और डा0 त्रिवेणी प्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया।

        हजारीबाग जिले के गिरिडीह में झारखण्डवासियों का आंदोलन ( भारत छोड़ो आन्दोलन ) सबसे अधिक उग्र था। शहर में जुलूसों पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था। परंतु इसका कोई प्रभाव नहीं था। शहर में सेविकों की तैनाती कर दी गई। गिरिडीह के तीन प्रमुख कांग्रेसी नेता राजन सिंह, अजीत कुमार बाग और जग्रनाथ सहाय को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जिससे आंदोलन में कमी के बजाय तीव्रता आ गई। डुमरी थाना पर आक्रमण करने तथा संथालों को उसकाने के जुर्म में अनन्तलाल और कारू राम को गिरफ्तार कर लिया गया। धनवार थाने पर झंडा फहराने का प्रयास करते हुए छट्ठु ठठेरा, नारायण मोदी, लेखी राय और पुनीत राय को गिरफ्तार कर लिया गया।

चतरा में नरसिंग भगत के नेतृत्व में एक जुलूस में अनुमंडल पदाधिकारी के कार्यालय भवन पर झंडा फहरा दिया। भागु मांझी स्थानीय डाक घर पर राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया। हंटरगंज थाना क्षेत्र में चौकीदारी, टैक्स देना बंद कर दिया।

कोडरमा में छट्टु राम, होरिल राम आंदोलन का संचालन करते थे। उनके संस्थान से पच्चासों लोग गिरफ्तार हुए। यहां एक जुलूस ने एक स्टेशन पर आग लगा दी। गिरफ्तार लोगों को कोड़ो से पीटा गया।

अंग्रेजी सरकार का दमनचक्र और तेज हो गया। डुमरी, झुमरी तिलैया, डोमचांच में सैनिकों को नियुक्त किया गया। कोडरमा एवं डोमचांच में सामूहिक जुर्माना लगाया गया 19 नम्बर को हजारीबाग केन्द्रीय कारा में एक सनसनीखेज घटना हुई। जेल से 6 कैदी दिवाल फांद कर फरार हो गये। भागने वाले कैदी थे- जयप्रकाश नारायण, रामानंद मिश्र, योगेन्द्र शुक्ल, सुरज नारायण सिंह, शालीग्राम सिंह तथा गुलाबी सोनार।

इस समय हजारीबाग के उपायुक्त ने सरकार को एक रिपोर्ट में लिखा हमें ऐसा प्रतीत होता है कि इस जिले के अधिकांश लोगों में असंतोष बना हुआ है। स्वतंत्रता के लिए इस आंदोलन ( भारत छोड़ो आन्दोलन )के प्रति सभी वर्ग का भारतवासी के मन में सहानुभूति जगी है।

        पलामू जिला स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई 1857 और उससे पूर्व से ही सक्रिय रहा है। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में पलामू की विशेष भूमिका रही है। वहां के छात्र, आदिवासी और किसान, मजदूर कदम-कदम पर अंग्रेजी शासन के विरूद्ध जंग का बिगूल फूंकते रहे है।

ग्रामीण क्षेत्र में पंचायती, रक्षा दलों एवं आदिवासी संगठनों को संगठित करने के प्रयास किये गये। इस कार्य में यदुवंश सहाय, राजकिशोर सिंह, भुवनेश्वर चौबे और वाचस्पति त्रिपाठी की भूमिका सराहनीय रही। कुमारी रमेश्वरी सरोज दास को अपत्तिजनक भाषण देने के लिए सजा दी गई।

न्यायालय भवन पर राष्ट्रीय झंडा फहराने के प्रयास में छात्रों के उपर लाठी चार्ज हुआ। मुंड के भरतमन, शहरपुर के नारायण साह और लेशलो गंज के रामेश्वर तिवारी को छह-छह माह की कड़ी सजा दी गई। जपला सिमेंट फैक्ट्री के श्रमिक नेता मिथिलेश कुमार सिन्हा ने हड़ताल करा दी। श्रमिकों ने भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेने का व्रत लिया। डालटेंनगंज में रेल तार व्यवस्था भंग कर दी गई।

गढ़वा में विद्यार्थियों ने सरकारी भवनों पर झंडा फहराया। छात्र नेता रामकिशोर तेली, गोपाल प्रसाद, गौरीशंकर और विश्वनाथ गिरफ्तार हुए। लातेहार क्षेत्र में ताना भक्तों ने गिरफ्तारियां दी। श्री जेठन सिंह खरवार, गुरो साह, नकछेदी कहार, भगीरथ सिंह खरवार, दुलारचंद प्रसाद और भुवनेश्वर प्रसाद को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। हर लोगों में भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रभाव था। सभी बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे। भारत छोड़ो आन्दोलन से प्रभावित होकर पलामू के उपायुक्त ने अपनी रिपोर्ट में रॉंची के आयुक्त को लिखा ‘नगर के लोगों से हमें सक्रिय नेताओं के बारे में कोई सूचना या सहयोग नहीं मिलता है। नगर में उनकी उपस्थिति के विषय में भी परस्पर विरोधी रिपोर्ट मिलती थी। इस कारण हमने सैयद काजी को गिरफ्तारी के विषय में उदासिनता का रवैया अपनाया। जिससे वह सामने आ जाए, परंतु इसके बाद भी उसके विषय में कोई कुछ सूचना नहीं दे सका।

सिंगभूम में भारत छोड़ो आन्दोलन के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। 9 अगस्त की सूचना जमशेदपुर में मिल गई। त्रेता सिंह और जोन के नेतृत्व में टाटा वर्कस युनियनसं ने हड़ताल कर दी और कांग्रेस को पूर्ण सहयोग देने का संकल्प लिया गया। 15 अगस्त को बीपी सिन्हा को गिरफ्तार कर लिया गया। छात्रों तथा मजदूरों ने चायबासा में जुलूस निकाला और देश को आजादी दिलाने की प्रतिज्ञा ली। आंदोलनकारियों के जवान ने कवि के ये पंक्तियां श्रृगांर बन गई थी।

ऐ जन्मभूमि जननी सेवा तेरी करूंगा, तेरे लिए जिऊंगा, तेरे लिए मरंगा।

हर जगह, हर समय में तेरा ही ध्यान होगा!

निज देश और भाषा का भक्त मैं रहूंगा।

टाटा के श्रमिकों को भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित करने के आरोप में 19 अगस्त को एम.डी. मदन को गिरफ्तार कर लिया गया। सरकार की दमनात्मक कार्रवाईयों के कारण सफाई कर्मचारियों ने भी हड़ताल कर दी। सरकारी भवनों, शराब की दुकानों, सड़क, रेल, तार, टेलिफोन सभी संचार के साधनों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। फलस्वरूप आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर कोडों से पीटा गया। रस्सों में बांध कर लोगों को सड़कों पर घुमाया गया। गिरफ्तार लोग गाते जा रहे थे।

होगी हराम मुझको दुनियां की एैसों आराम,

जब तक स्वतंत्रत तुझको, माता मैं न कर लूंगा।

हम हिन्द के है बच्चे, हिन्दुस्तां हमारा!

मरते दम तक कहता ही रहूंगा!

सिंहभूम के छात्रों को संबोधित करने के लिए एक पंपलेट निकाला गया था। रातों-रात हर छात्रों तक पहुचा दिया गया। छात्रों से अपील किया गया-

‘करो या मरो, वीरता ही जीवन है‘

कायर मृतकों के समान है वीरो! तुम क्या देख रहे हो?

पानी में आग लगा दो। ये छात्र भाईयों मैं तुम्हारा बलिदान देख चूंका हूॅं। धूप हो या वर्षा तुमने खुले शीत, भुखे-प्यासे भी जुलूस निकाली है। मैंने भी देश के लिए जीने या मरने का निर्णय किया है। अतः मैं सैनकों के बीच काम कर रहा हूं, तुम नगर, देहातों में ।

यह अपील पंजाब रेजीमेंट में कार्यरत एक अधिकारी की ओर से थी। छात्रों के साथ पुलिस, सेना, सरकारी सेवकों से भी एैसी ही अपील की गई और उन्हें वांछित उत्तर भी दिया।

झारखण्डवासियों की भारत छोड़ो आन्दोलन में योगदान के बारे में डॉ0 दर्त्ता की पुस्तक ‘बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास‘ नामक पुस्तक से मिलती है। उपरोक्त पंत्तियों में मैंने भारत की स्वाधीनता आंदोलन की क्रम में भारत छोड़ो आंदोलन झारखण्डवासियों के भूमिका को उजागर करने का प्रयास किया है। वैसे स्वतंत्रता सेनानियों को इतिहास के पन्नों से लोगों के बीच मैंने लाने का प्रयास किया है। जिन्हें शायद हर कोई जान नहीं पाता। इतिहास के पन्नों में आज कई ऐसे वीर भरे पड़े हैं जिन्हें कोई जानता भी नहीं है। उपरोक्त पंत्तियों में मैंने उन छुटे आंदोलनकारियों का उल्लेख करने का प्रयास किया है।

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