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भ्रष्टाचार की ताकत का नैतिकता से कोई सरोकार नहीं (पंजाब केसरी)

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हमारी व्यवस्था की हास्यास्पद स्थिति देखिए। व्यवस्था में असमानता देखिए। एक दसवीं फेल बिहार का उपमुख्यमंत्री है और तमिलनाडु में शिक्षक भर्ती बोर्ड द्वारा उस छात्र को प्रवेश नहीं दिया गया जिसके 90 की बजाय 89 अंक आए थे। बिहार के उपमुख्यमंत्री बड़े गर्व से कहते हैं मुझे तो जनता ने चुना है।

वास्तव में मेरा देश महान है। शिक्षक बनने की चाह रखने वाले इस छात्र सहित देश के नागरिकों के भविष्य का फैसला अशिक्षित लोगों के हाथ में देने से भी बदतर स्थिति यह है कि राजद अध्यक्ष लालू का दसवीं फेल बेटा भ्रष्टाचार के आरोपों में घिर गया है और पूरी राज्य सरकार के लिए आफत बन गया है तथा कह रहा है कि यदि मुझे बर्खास्त कर सको तो करो। इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय और सी.बी.आई. ने लालू, उनकी पत्नी राबड़ी, तेजस्वी और परिवार के अन्य सदस्यों की 12 सम्पत्तियों पर छापे डाले तथा जब लालू यादव के विरुद्ध 2006 में रेल मंत्री रहते हुए रांची और पुरी में रेलवे के बी.एन.आर. होटल को निजी कम्पनी, सुजाता होटल को रख-रखाव तथा संचालन का अवैध ठेका देने के लिए आरोप पत्र दायर किया।

इस कम्पनी ने पटना में कीमती 3 एकड़ का प्लाट लालू के चमचे और पूर्व कार्पोरेट कार्य मंत्री प्रेमचंद्र गुप्ता की पत्नी सरला गुप्ता के स्वामित्व वाली डिलाइट मार्कीटिंग कम्पनी को डेढ़ करोड़ रुपए में बेचा, जबकि इसका सर्कल रेट 1.93 करोड़ और बाजार रेट 94 करोड़ था। सरला गुप्ता ने इस भूखंड को तेजस्वी की कम्पनी लारा प्रोजैक्ट्स एल.एल.पी. को हस्तांतरित किया। प्रवर्तन निदेशालय उन परिस्थितियों की जांच कर रहा है जिनके अंतर्गत तेजस्वी ने अवैध सौदों के माध्यम से ए.के. एक्सपोर्ट का अधिग्रहण किया।

नि:संदेश तेजस्वी को शीघ्र ही त्यागपत्र देना पड़ेगा या उन्हें बर्खास्त किया जाएगा। विशेषकर इसलिए लालू ने स्पष्ट कहा है कि उनके बेटे को आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने के मामले में कोई स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता नहीं है और लालू यह जता रहे हैं कि मैं तुम्हारा माई-बाप हूं जिसके चलते जद (यू) और राजद के बीच मतभेद बढ़ते जा रहे हैं। बिहार की स्थिति से मुझे कोई हैरानी नहीं है क्योंकि बेटा भी बाप की ही तरह है। आपको याद होगा कि 1997 में चारा घोटाले में लालू के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल होने के बाद उन्होंने आरम्भ में त्यागपत्र देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि ‘‘संविधान में कहां लिखा है कि जनता की अदालत द्वारा चुने गए व्यक्ति को केवल एक पुलिस द्वारा आरोपपत्र दायर करने पर त्यागपत्र देना पड़ेगा। नैतिकता का राजनीति से क्या सरोकार है।’’

नि:संदेह मामले के गुण-अवगुण का निर्धारण न्यायालय करेगा किन्तु इससे हमारे लोकतंत्र के बारे में अनेक प्रश्न उठते हैं। ऐसी स्थिति से हमारे राजनेता बिल्कुल विचलित नहीं होते हैं, जिन्होंने रिश्वत और भ्रष्टाचार को एक राजनीतिक खेल बना दिया है। ऐसी स्थिति पर वे शर्मसार नहीं होते या उनमें आक्रोश पैदा नहीं होता। तथापि, लालू एंड कम्पनी ने हमारे नेतागणों के पाखंड का पर्दाफाश कर दिया है। जब तक वे प्रशासन के अंग बने हुए हैं वे कानूनी खामियों का उपयोग और दुरुपयोग अपने लाभ के लिए करेंगे। इस संबंध में धर्मनिरपेक्ष दलों के बयान देखिए, वे कहते हैं कि यह साम्प्रदायिक भाजपा द्वारा राजनीतिक विद्वेष है। राजद अध्यक्ष ही एकमात्र ऐसे नेता नहीं हैं। कांग्रेस में यू.पी.ए.-2 के दौरान घोटालों की इतनी झड़ी लग गई थी कि देश को लोग घोटालों का गणतंत्र कहने लग गए थे।

इस दौरान 2-जी, सी.डब्ल्यू.जी., आदर्श, कोलगेट आदि कई बड़े घोटाले हुए। ये घोटाले हमारी शासन व्यवस्था के अनैतिक पहलू को उजागर करते हैं जिसमें व्यक्ति को तब तक ईमानदार माना जाता है जब तक वह पकड़ा न जाए। लगता है नीतीश कुमार कुछ समय में इस बारे में निर्णय ले लेंगे। 2 वर्ष पूर्व लालू के सत्ता में आने के समय से ही उन्हें अनेक विरोधाभासों का सामना करना पड़ रहा है और लगता है कि ये दोनों फिर से राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन जाएंगे। ऐसा इसलिए भी है कि लालू हमेशा नम्बर एक बना रहना चाहते हैं और यह मानते हैं कि वह ही असली किंगमेकर हैं और इस मामले में वह हैं भी।

राजनीतिक शिक्षा-दीक्षा और जीवन के मामले में नीतीश और लालू लगभग एक जैसे हैं किन्तु स्वभाव और शासन के मामले में दोनों एक-दूसरे के विपरीत हैं। जहां एक ओर नीतीश की विकास, सुशासन वाली स्वच्छ छवि है तो वहीं लालू की जंगलराज वाली छवि है। नीतीश कुमार गठबंधन में लालू के बढ़ते प्रभाव से परेशान हैं। ‘नीतीश ब्रांड’ की राजनीति पर भ्रष्टाचार के आरोपों का साया पडऩे लगा है। यह ब्रांड उन्होंने स्वच्छ और भ्रष्टाचार मुक्त शासन के वायदे पर बनाया था। आज नीतीश आगे कुआं, पीछे खाई की स्थिति में फंस गए हैं क्योंकि वह भ्रष्टाचार को बिल्कुल सहन नहीं करते हैं तथा जहां एक ओर वह बेनामी संपत्ति धारकों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं तो दूसरी ओर उन्हें सत्तारूढ़ गठबंधन टूटने का भय भी है।

यह समय ही बताएगा कि वह अपने शेष कार्यकाल को किस प्रकार पूरा करते हैं। उन्होंने कथित रूप से सोनिया और राहुल से मुलाकात कर कहा है कि वे लालू को मनाएं कि तेजस्वी के त्यागपत्र में विलम्ब न किया जाए और गठबंधन का भविष्य खतरे में न डाला जाए। यदि लालू सरकार से अलग होते हैं तो उन्हें अपनी सरकार बचाने के लिए अपनी पुरानी सहयोगी भाजपा से पुन: गठबंधन करना पड़ेगा या फिर से चुनाव कराने पड़ेंगे। नीतीश के सहयोगी पहले ही कहने लगे हैं कि उन्हें भाजपा के साथ गठबंधन में कभी कोई परेशानी नहीं रही। दोनों दलों का गणित भी उनके पक्ष में है। जद (यू) के 71 और भाजपा के 58 विधायक हैं और दोनों दलों के 129 विधायक साधारण बहुमत के लिए पर्याप्त हैं।

भाजपा भी इस गठबंधन से परहेज नहीं करेगी क्योंकि उसके वरिष्ठ नेता दोनों दलों की जुगलबंदी के 17 वर्षों को याद कर रहे हैं और उन्होंने नीतीश को बाहर से समर्थन देने की इच्छा जताई है। मोदी के लिए यह स्थिति एक तीर से दो शिकार करने जैसी है। इससे बिहार में उनके पांव जम जाएंगे और 2019 में भारत की गद्दी के लिए विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में नीतीश की महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लग जाएगा। नीतीश जानते हैं कि अपने विकास के एजैंडा को पूरा करने के लिए उन्हें केन्द्र के साथ मिलकर काम करना होगा ताकि राज्य को अधिक पैसा मिल सके। विडम्बना देखिए जिन लोगों ने मोदी और नीतीश के साथ काम किया है उनका कहना है कि दोनों में अनेक समानताएं हैं। दोनों ईमानदार और परिश्रमी हैं। दोनों गरीब घरों से आए हैं तथा दोनों पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वे निरंकुश और अहंकारी हैं।

दोनों की राजनीति अलग हो किन्तु इससे भविष्य में दोनों के मिलन की संभावना बढ़ गई है। बिहार का यह घटनाक्रम उस पुरानी चिंगारी को भड़का सकता है कि राजनीति में कभी विराम नहीं लगता है। इसलिए सत्ता की सांझीदारी ही असली खेल है किन्तु ङ्क्षचता का विषय उच्च राजनीतिक समाज में निम्न नैतिकता का पनपना है। हमारे लोकतंत्र में ऐसी स्थिति में तत्काल सुधार की आवश्यकता है और लालू की स्थिति को देखते हुए हमारे नेताओं को इस बात पर ध्यान देना होगा कि ‘‘राजनीति शायद अब बदमाशों का अंतिम अड्डा नहीं रह पाएगी।’’

सौजन्य – पंजाब केसरी।

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