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भ्रष्ट व्यवहार पर शिकंजा

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राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के परिवार पर बेनामी संपत्ति के मामले में जांच एजेंसियों का शिकंजा कसा है। ऐसी मिसालें कम ही होंगी, जिनमें किसी सरकारी जांच एजेंसी ने किसी नेता के परिवार की संपत्ति जब्त की हो। बल्कि धारणा तो यह है कि राजनेता तमाम अवैध काम करके भी कानून की जद से बाहर बने रहते हैं। ऐसे तमाम संदिग्ध उदाहरणों से ही ये धारणा बनी है कि राजनेताओं में आपसी मिलीभगत होती है। अत: उनकी पार्टी चाहे सत्ता में रहे या नहीं, लेकिन उनका कुछ नहीं बिगड़ता। इसीलिए बेनामी संपत्ति के मामले में लालू प्रसाद की बेटी और राज्यसभा सांसद मीसा भारती पर हुई कार्रवाई महत्वपूर्ण है। उनकी कुछ संपत्तियों को जब्त किया गया है। आयकर विभाग ने इन्हें बेनामी संपत्ति माना है। मीसा भारती के पति शैलेश कुमार की भी कुछ जायदाद जब्त हुई है। कानूनी प्रावधान के मुताबिक जब्त संपत्ति को न तो बेचा जा सकता है और ना ही किसी को किराए पर दिया जा सकता है। खबरों के मुताबिक लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव की कुछ संपत्तियां भी अस्थायी तौर पर जब्त हुई हैं।

ध्यानार्थ है कि बेनामी संपत्ति मामले में मीसा भारती को आयकर विभाग ने कुछ दिन पूर्व समन जारी किया था। लेकिन दो बार नोटिस भेजने पर भी वे हाजिर नहीं हुईं। इसके बाद आयकर विभाग ने संपत्ति जब्ती का यह कदम उठाया। अब मीसा, तेजस्वी और शैलेश को यह साबित करना होगा कि उनकी अटैच की गईं संपत्तियां वैध तरीके से खरीदी गई हैं। हाल में कुछ अन्य कार्रवाइयों से भी लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार की मुश्किलें बढ़ी हैं। कुछ दिन पहले बिहार सरकार में मंत्री तेज प्रताप यादव के पेट्रोल पंप का लाइसेंस भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) ने रद्द कर दिया था, हालांकि बाद में एक स्थानीय अदालत ने इस फैसले पर स्टे लगा दिया। तेज प्रताप पर गलत तरीके से लाइसेंस हासिल करने का आरोप है।

इन कार्रवाइयों को लालू प्रसाद ने राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित बताया है। लेकिन भ्रष्टाचार के मामलों में ऐसे तर्क स्वीकार नहीं किए जा सकते। यह अच्छी बात है कि अब सरकारी एजेंसियां बड़े लोगों पर भी हाथ डाल रही हैं। उनसे अपेक्षित है कि वे ऐसी कार्रवाइयों को जल्द से जल्द अंजाम तक पहुंचाएं। यह अवश्य सुनिश्चित करने की जरूरत है कि जिन नेताओं या दूसरे रसूखदार लोगों पर वित्तीय या अन्य गड़बड़ियों के इल्जाम हैं, उन सब पर समान दृष्टि से कार्रवाई हो। इस मामले में सत्ता या विपक्ष में होने से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। इस मामले में यह कथन याद रखना आवश्यक है कि न केवल न्याय होना, बल्कि न्याय होता दिखना भी जरूरी होता है। ऐसा हो तो फिर लालू प्रसाद के परिवार से किसी को हमदर्दी नहीं होगी। वित्तीय गड़बड़ियों का कोई बचाव नहीं हो सकता। बल्कि यह एक सकारात्मक घटनाक्रम है कि अब सत्ता से जुड़े या जुड़े रहे लोगों के खिलाफ भी ऐसे कदम उठाए जाने लगे हैं।

सौजन्य – नईदुनिया।

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