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मलेरिया का तो नाम ही mal (खराब) + aria (हवा) इसलिए पड़ा

मलेरिया का तो नाम ही mal (खराब) + aria (हवा) इसलिए पड़ा

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जानें उन महान वैज्ञानिकों को जिन्होंने मानवता के लिए अपने प्राणों की भी बाजी  लगा दी जैसे मलेरिया

मलेरिया का तो नाम ही mal (खराब) + aria (हवा) इसलिए पड़ा!
आज अधिकतर लोग जानते हैं कि संक्रामक रोग सूक्ष्म जीवों की वजह से होते हैं। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था। किसी समय आम लोग ही नहीं बल्कि डॉक्टर भी इन रोगों का कारण खराब हवा या प्रदूषण को मानते थे। मलेरिया का तो नाम ही mal (खराब) + aria (हवा) इसलिए पड़ा था। सिर्फ मलेरिया ही नहीं बल्कि काली मौत के नाम से प्रसिद्ध प्लेग, हैजा, चेचक आदि तमाम बीमारियां खराब हवा की वजह से मानी जाती थी। यह तो पढेलिखे लोग मानते थे। अधिकतर लोग तो इसको ( मलेरिया ) ईश्वरीय प्रकोप ही समझते थे। बहरहाल ईश्वरीय प्रकोप की थ्योरी की ही तरह इसका भी कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था। फिर 16वीं सदी में इटली में एक डॉक्टर हुए। उनका नाम था गिरोल्मो फ्राकस्टोरो। वे एक डॉक्टर थे, एक कवि भी थे (ऐसा कम ही देखने को मिलता है)। साथ ही वे एक गणितज्ञ थे, भूगोलशास्त्री और खगोलशास्त्री भी थे। मतलब वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। 19 साल की उम्र में वह विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बन चुके थे। अपनी डॉक्टरी की प्रैक्टिस के दौरान 1546 में उन्होंने कहा कि ये महामारियां हवा की खराबी नहीं बल्कि छोटे छोटे कणों की वजह से होती हैं। इन कणों को उन्होंने “स्पोर्स” का नाम दिया, हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि ये स्पोर्स असल में सूक्ष्म जीव हैं। लेकिन फिर भी उस समय के हिसाब से यह चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक छलांग थी जिसने अगली तीन शताब्दियों तक अपना लोहा मनवाया। भले ही यह थ्योरी काफी हद तक सही थी लेकिन अभी यह पूरी तरह से विकसित नहीं थी।

उन्नीसवीं सदी में भी जबकि पूरे यूरोप में चेचक के टीके लगाए जा रहे थे और कामयाब भी हो रहे थे, किसी को यह पता नहीं था कि ये टीके असल में काम कैसे करते हैं। *फिर 19वीं सदी में फ्रांस में एक वैज्ञानिक हुए। लुई पाश्चर। जब लुई पाश्चर पढ़ाई कर रहे थे तो उन्हें कोई मेधावी छात्र नहीं समझा जाता था। वे एक औसत छात्र माने जाते थे। लेकिन इसी औसत छात्र ने आगे चल कर प्रचलित चिकित्सा विज्ञान की बुनियादें हिला देनी थी। रसायन शास्त्र की कुछ खोजों के अलावा विज्ञान को उनकी सबसे महत्वपूर्ण देन है “रोगों का जीवाणु सिद्धांत” यानि germ theory of diseases. गिरोल्मो फ्राकस्टोरो के इस सिद्धांत को उन्होंने आगे विकसित करते हुए बताया कि *संक्रामक रोग सूक्ष्म जीवों की वजह से होते हैं।* इस सिद्धांत के प्रयोग से उन्होंने सिद्ध किया कि खमीर बनाने की प्रक्रिया को धीमा किया जा सकता है। *इसी सिद्धांत के द्वारा उन्होंने दूध को संरक्षित करने की तरकीब खोज निकाली। उन्होंने बताया कि दूध को पहले उच्च तापमान पर गर्म कर दिया जाए और फिर तेजी से बहुत कम तापमान पर ठंडा कर दिया जाए तो दूध में मौजूद जीवाणु तेजी से मर जाते हैं* जिससे दूध लंबे समय तक खराब नहीं होता। उनकी बताई हुई यह तकनीक डेढ़ सदी बाद आज भी दूध को संरक्षित करने के लिए प्रयोग में लाई जाती है। इसके खोजकर्ता लुई पाश्चर के नाम पर इस तकनीक को “पाश्चरीकरण” कहा जाता है। जर्म थ्योरी की उनकी खोज युगांतरकारी सिद्ध हुई। इसके बाद चिकित्सा विज्ञान ने एक लंबी छलांग लगाई और वस्तुओं पर से घातक जीवाणुओं को खत्म करने के नए नए तरीके खोज निकाला गए। इसी सिद्धांत पर आगे चल कर पहली एंटीबायोटिक पेनिसिलिन की भी खोज हुई और चिकित्सा विज्ञान को रोगों के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण अस्त्र प्राप्त हुआ जिसकी मदद से अनेक असाध्य रोगों पर विजय प्राप्त की गई। इसके अलावा लुई पाश्चर ने एक अन्य घातक रोग एंथ्रेक्स की वैक्सीन का आविष्कार किया। रेबीज एक और घातक रोग है जिसके होने का मतलब है शर्तिया मृत्यु। इस रोग की वैक्सीन बनाने का श्रेय भी हमारे इसी औसत छात्र रहे महान वैज्ञानिक को जाता है।

जब इस वैक्सीन के लिए लुई पाश्चर जानवरों पर प्रयोग कर रहे थे तब कोई मरीज न होने की वजह से उन्होंने सोच लिया था कि वे पहले खुद को पागल कुत्ते से कटवाएंगे फिर इस वैक्सीन का प्रयोग करेंगे। यह जानते हुए भी कि यह बीमारी शर्तिया जानलेवा है और चूक का अर्थ मृत्यु है, मानवता का यह सेवक खुशी खुशी अपनी जान की बाजी लगा देना चाहता था। सौभाग्य से इसकी नौबत नहीं आयी और रेबिड कुत्ते का काटा हुआ एक मरीज उन्हें मिल गया जिसके माता पिता ने वैक्सीन लगाने की अनुमति दे दी। यह प्रयोग सफल रहा और मरीज की जान बच गई। इसके बाद उन्होंने साढ़े तीन सौ मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज किया। एकमात्र असफलता उन्हें तब मिली जब उनके पास एक अडवांस्ड स्टेज में बीमार लड़की को लाया गया। उस बच्ची ने लुई पाश्चर के हाथों में दम तोड़ दिया। आंखों में आंसू लिए इस महान वैज्ञानिक ने उसके मांबाप से कहा था “काश मैं आपकी बच्ची को बचा पाता।”

1895 में 73 साल की आयु में उनकी मृत्यु हुई। अंतिम दिन मृत्यु शैया पर उनके आखिरी शब्द थे, “मैं और जवान होना चाहता हूँ ताकि मैं बीमारियों के बारे में और अधिक अध्ययन कर सकूं।”* लुई पाश्चर एक कठिन परिश्रमी व्यक्ति थे। उन्होंने दूसरे वैज्ञानिकों को सलाह दी थी कि “जिस व्यक्ति को कठिन परिश्रम करने की आदत पड़ जाए तो वह उसके बिना नहीं जी सकता। कठिन परिश्रम इस दुनिया में हर चीज की नींव है।” वैज्ञानिक रिसर्च के लिए ज्यादा सुविधाएं हों इस हेतु वे जीवन पर्यंत लगे रहे थे और उन्होंने फ्रांस की सरकार से सुविधाएं लेने में सफलता भी पाई थी। नेपोलियन तृतीय के सामने उन्होंने दलील रखी थी कि “बिना प्रयोगशाला के एक वैज्ञानिक ऐसे ही होता है जैसे बिना हथियार के एक सैनिक।”

गिरोल्मो फ्राकस्टोरो और लुई पाश्चर ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने बीमारियों को लेकर पूरे चिकित्सा विज्ञान की अवधारणा को बदल दिया था। 19वीं सदी में लुई पाश्चर अकेले ऐसे आदमी थे जिन्होंने इंसान की औसत उम्र को बढ़ा दिया था। मानवता इन महान वैज्ञानिकों और इनकी काबिलियत की सदा ऋणी रहेगी।

Doctors for Society की तरफ से हम गिरोल्मो फ्राकस्टोरो और लुई पाश्चर को सलाम करते हैं।

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