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महर्षि अरविन्द से महामहिम कोविन्द तक गरीबों और किसानों की बात , फिर भी समस्या जस की तस !

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महर्षि अरविन्द से महामहिम कोविन्द तक गरीबों और किसानों की बात ,

फिर भी समस्या जस की तस !

आखिर इस मर्ज की दवा क्या है ?

मित्रों !

विजय के तत्काल बाद देश के भावी महामहिम माननीय कोविन्द जी का प्रथम वक्तव्य उनकी आत्मा की आवाज थी ,जिसने कोटि -कोटि आत्माओं को झंकृत किया है। उन्होंने कहा है कि मैं गरीबों का प्रतिनिधित्व करुँगा। उनके उक्त वक्तव्य के तत्काल बाद पराजित हुई श्रीमती मीराकुमार जी ने जिन मुद्दों की चर्चा की उसके केन्द्र में भी गरीब और किसान ही है। इससे पूर्व की सरकारों ने गरीबी हटाओ अभियान चलाया और वर्तमान सरकार भी गरीबों के उत्थान की बात कह रही है।

अब यहाँ स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि जब सब यही चाहते हैं कि गरीबी मिटे और किसान खुशहाल हों तो फिर मिटती क्यों नहीं है गरीबी और मर क्यों रहे हैं किसान ? कुछ तो खास बात है और कोई न कोई विशेष कारण तो है भाई कि दवा का असर नहीं हो रहा है ,मर्ज बढ़ता ही जा रहा है ?

आइये ,पता लगाते हैं कि मर्ज की जड़ कहाँ है ?

आपने सुना होगा कि कुछ बीमारियाँ वर्षों पूर्व जन्म ले चुकी होती है ,लेकिन असर बहुत बाद में दीखता है। यह बीमारी वैसी ही है भाई।

इस जान लेवा बीमारी के कीटाणुओं को सूक्ष्मदर्शी अरविन्द ने देखा और हमें सचेत करने हेतु 31 मार्च 1908 में हीं वन्देमातरम में लिखा —-

” जन साधारण की बढ़ती गरीबी असंख्य पम्पलेटों , भाषणों और समाचार -पत्रों के लेखों का विषय रही है। लिख और बोल कर ही हम अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। इसके हल को हम भविष्य के लिए छोड़ देते हैं और यह भूल जाते हैं कि जब तक इनके निवारण का समय आयेगा तब तक जन साधारण पतन के ऐसे गर्त में गिर चुके होगें जहाँ से उन्हें उबारना ही असंभव लगने लगेगा।

हम गरीबी के केवल आर्थिक पक्ष पर ही आदान -प्रदान करने के अभ्यस्त रहे हैं ,किन्तु इसका नैतिक पक्ष भी है जो उससे भी महत्वपूर्ण है। भारत के किसान वर्ग अपनी श्रेष्ठतर धार्मिकता ,विनम्रता ,सौम्यता ,पवित्रता ,मितव्ययिता और जन्मजात बुद्धिमत्ता के कारण सदैव यूरोप के कम सभ्य लोगों से अपनी पृथक पहचान रखता है। अब उन्हें बेमिसाल रूप से दबाकर उनके साथ नृशंसता बरती जा रही है। शराब की दुकानों से आकर्षित होकर ,जिसे परोपकारी सरकार उदारतापूर्वक उपलब्ध करा रही है ,हमारे किसान अनैतिक बनते जा रहे हैं। यह पतन भयावह तीव्रता के साथ हो रहा है। बुराई के इस ज्वार -भाटे को रोकने के लिए कुछ न किया गया तो यह अपने गंदले बहाव में भारत की आत्मा को ही वहा ले जायगा। ”

दोस्तों ! आज से 109 वर्ष पूर्व ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण उत्पन्न उक्त कीटाणुओं की ओर महर्षि श्री अरविन्द ने हमारा ध्यान आकर्षित किया था और अंग्रेजों के विरुद्ध हमारी लड़ाई का मूल उद्देश्य भी इन बुरा इयों को जन्म देने वाली व्यवस्था को मिटाना ही था। फिर क्या कारण है कि बुराइयाँ बढ़ती ही रही ?

हम आशा करते हैं कि भावी महामहीम के नेतृत्व में इस दिशा में रचनात्मक क्रांति का शुभारंम्भ होगा। आगे प्रभु की मर्जी। यह काम सरकार का नहीं हमारा ,आपका और समाज का है। किसानों के नाम पर राजनीति करने वालों से बच कर रहना है रे बाबा। बोलबम !

 

साभार : शैलेन्द्र प्रसाद सिंह

This post was written by sanjay dash.

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