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मानव का स्वभाव
मानव का स्वभाव मूलरूप से विनाशकारी है, पर्यावरणविद व वैज्ञानिक के तर्क

मानव का स्वभाव मूलरूप से विनाशकारी है, पर्यावरणविद व वैज्ञानिक के तर्क -नवमीत

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मानव का स्वभाव मूलरूप से विनाशकारी है, पूँजीवाद और महाविनाश की आहट

पृथ्वी यूँ तो ब्रह्माण्ड का एक बहुत ही छोटा सा हिस्सा है। लेकिन साथ ही यह सबसे विशिष्ट हिस्सा भी है। इस विशिष्टता का कारण यह है कि पृथ्वी ही एकमात्र ज्ञात स्थान है जहाँ ब्रह्माण्ड की सबसे महान और विशिष्ठ घटना घटती है और वह घटना है जीवन। अपनी शुरुआत से लेकर कई उतार चढ़ावों और लगातार विकास के साथ जीवन आज अत्यंत वैविध्यपूर्ण और विशाल रूप में पृथ्वी पर मौजूद है। अलग-अलग जीव प्रजातियों की संख्या की बात की जाये तो अभी तक 1580000 विभिन्न जीवों की प्रजातियों की पहचान की जा चुकी है और वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह संख्या 2000000 से 8000000 तक हो सकती है। यह जानना भी दिलचस्प होगा कि यह संख्या धरती पर जीवन की शुरुआत से आज तक मौजूद रही तमाम जैव प्रजातियों का सिर्फ 1 प्रतिशत है। मतलब हम कह सकते हैं कि शुरू से अभी तक धरती पर कुल मिलकर 2 से 8 खरब तक विभिन्न जैव प्रजातियाँ रही हैं। लेकिन यह विविधतता सिर्फ प्रजातियों की संख्या तक ही सीमित नहीं है। बल्कि एक ही प्रजाति में भी आनुवांशिक विविधताएँ भी विद्यमान रहती हैं। इसके अलावा एक ही प्रजाति के अलग-अलग जीवों के बीच आपस में और विभिन्न प्रजातियों के बीच भोजन श्रृंखला के माध्यम से पारस्परिक सम्बन्ध भी होते हैं। एक विशेष स्थान पर मौजूद सभी जीवों के समूह, जिसमें हम यानी मनुष्य भी शामिल हैं, और उनके बीच पारस्परिक संबंधों को पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) कहते हैं। इस प्रकार भिन्न-भिन्न जीव प्रजातियों की विविधता, एक ही प्रजाति के बीच की आनुवांशिक विविधता व पारिस्थितिकी तंत्र की विविधता ये सब मिलकर समग्र रूप से जैव विविधता का निर्माण करते हैं। यही जैव विविधता यानि सजीव प्रकृति जब निर्जीव प्रकृति के साथ मिलती है तो हमारे पूरे परिवेश का निर्माण होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो अन्य सभी जीवों की तरह ही एक प्रजाति के रूप में मानव के आपसी सम्बन्ध और फिर प्रकृति के साथ भी इसके सम्बन्ध इसी पूरे तंत्र का हिस्सा हैं। हालाँकि दूसरे जीवों और मानव में एक बड़ा अंतर यह है कि मानव प्रकृति को इसका हिस्सा होते हुए भी चेतन रूप से प्रभावित करता है, इसको निरंतर बदलता है और इस प्रक्रिया में खुद को भी बदलता है जबकि अन्य जीव अपनी सहज वृति के साथ प्रकृति का हिस्सा मात्र होते हैं, इसको चेतन रूप में प्रभावित नहीं करते। इस तरह से हम समझ सकते हैं कि जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र और समग्र रूप से प्रकृति का हमारे जीवन में कितना महत्त्व है।
बहरहाल यह तो हुई जीव विज्ञान की बात, लेकिन इससे इतर भी जैव विविधता हमारी ज़िन्दगी में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। मसलन हमारा सांस्कृतिक विकास, कला, साहित्य, कविता, भाषा आदि सभी चीजें किसी न किसी रूप में जैव विविधता के साथ हमारे सम्बन्धों से प्रभावित होते रहे हैं। बहुत शुरू से ही जीव जंतुओं के साथ हमारे तमाम संबंधों ने हमारी कल्पनाओं, लोक कथाओं, हमारे सामाजिक अनुष्ठानों और इस प्रकार समग्र रूप से हमारी संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। मनुष्य की चेतना को विकसित करने में भी उसके आसपास की सजीव और निर्जीव प्रकृति की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। जैव विविधता के हमारे जीवन पर पड़ने वाले तमाम स्पष्ट और अस्पष्ट प्रभाव बहुमुखी होते हैं तथा ये हमारे पूरे जीवन के तमाम अनुभवों में नजर आते हैं। लेकिन मौजूदा दौर में हमारे और सजीव- निर्जीव प्रकृति के बीच के हमारे सम्बन्ध व समग्र रूप से सम्पूर्ण जैव विविधता ही एक भयानक संकट के दौर से गुजर रहे हैं, एक ऐसा संकट जो प्राकृतिक नहीं बल्कि मानव और प्रकृति पर थोप दी गयी  पूँजीवादी व्यवस्था की देन है।
कुछ दशक पहले वैज्ञानिकों ने ऑस्ट्रेलिया में मेंढक की एक दुर्लभ प्रजाति खोजी थी। पेट को फुलाने वाले इस मेंढक की मादा अपने बच्चों को पूर्ण विकसित होने तक अपने पाचन तंत्र में रखती है और विकसित हो जाने के बाद उनको अपने मुँह के रास्ते बाहर निकाल देती है। खोज के कुछ समय बाद ही आज यह मेंढ़क धरती से विलुप्त घोषित किया जा चुका है। सिर्फ यही नहीं पूरी दुनिया की एक तिहाई उभयचर (पानी और जमीन दोनों जगह रहने वाले जीव) विलुप्ति के कगार पर खड़े हैं। लेकिन बात सिर्फ उभयचर जीवों की भी नहीं है। उत्तरी अमेरिका के कुछ विश्वविद्यालयों द्वारा किये गये अध्ययन के अनुसार सम्पूर्ण जीवन ही खतरे के निशान पर पहुँच चुका है। इन अध्ययनों की मानें तो पृथ्वी अपनी छठी महान जैव विलुप्ति के चक्र में प्रवेश कर गयी है। इससे पहले धरती पर 5 बार ऐसी जैव विलुप्तियाँ आ चुकी हैं जिन्होंने पृथ्वी को लगभग जीवन विहीन बना दिया था। पिछली प्रलय साढ़े छः करोड़ साल पहले आयी थी जब डायनासोरों का अंत हुआ था। पूँजीवादी व्यवस्था और स्वयं जीवन के बीच चल रहे मौजूदा टकराव के आने वाले परिणाम को दर्शाता है। क्या आप जानते हैं कि यह सम्भावित परिणाम क्या हो सकता है? यह हो सकता है जैव विविधता का खात्मा और जीवन विलुप्ति व महाविनाश।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से ही जैव विलुप्ति की यह दर अद्वितीय रूप से बढ़ रही है और पिछले 40 वर्षों में तो इसकी गति कई गुणा तेज हो चुकी है। दुनिया में वन्य जीवन की देखरेख करने वाली संस्था ‘वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फण्ड’ की ‘लिविंग प्लेनेट इंडेक्स’ यानि “एलपीआई” नामक स्कीम के तहत 3038 विभिन्न रीढ़धारी जीव प्रजातियों (जिनमें मछलियाँ, उभयचर, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी जीव आते हैं) की जनसंख्या व अन्य पहलुओं पर नजर रखी जाती है। इस योजना के अन्तर्गत  जारी किये गये  साल 2014 के आँकड़ों   के अनुसार 1970 से 2010 के बीच निगरानी में आने वाली इन सभी प्रजातियों की जनसंख्या  में 52 प्रतिशत की कमी दर्ज की गयी  है। इसको अलग-अलग इलाकों के हिसाब से देखें तो 1970 से 2010 के बीच ऐसे इलाकों में जहाँ तापमान चरम पर नहीं पहुँचता है, यह कमी 36 प्रतिशत है लेकिन उष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों   में जनसंख्या में यह कमी 56 प्रतिशत रही। मीठे पानी के जैव आवासों में यह कमी 76 प्रतिशत दर्ज की गयी । और अधिक विस्तार में जाएँ तो दक्षिण अमेरिका के नव उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में इसी समय अन्तराल के दौरान यह कमी 83 प्रतिशत दर्ज की गयी  है व दक्षिण पूर्वी एशिया व ऑस्ट्रेलिया में यह आँकड़ा 67 प्रतिशत का है। एलपीआई के अनुसार इसमें से 45 प्रतिशत कमी तो आवासों के खत्म होने से आयी है, 37 प्रतिशत कमी मनुष्य के सीधे हस्तक्षेप (यथा शिकार, खेती या मछली मारना) की वजह से और बची हुई यानि 18 प्रतिशत कमी जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और बीमारियों आदि की वजह से है। प्रजातियों के लुप्त होने की मौजूदा गति साढ़े छह करोड़ साल पहले हुई महाविलुप्ति के समय की गति को भी मात करती नजर आ रही है। कुछ सर्वे बताते हैं कि

सन 1500 से 1980 के बीच रीढ़धारियों की विलुप्ति की यह गति पिछली बार यानि साढ़े छह करोड़ साल पहले के मुकाबले 24 से 85 गुणा ज़्यादा  रही। 1980 के बाद से, जबकि नवउदारवाद ने अपने पाँव पसार लिए, यह दर 71 से 297 गुणा ज़्यादा  हो गयी  है। अगर यही दर जारी रहती है तो अगली एक सदी से भी कम समय में ये सभी 3038 प्रजातियाँ पूरी तरह से दुनिया से विलुप्त हो जाएँगी। प्रतिष्ठित अन्तर्राष्ट्रीय  विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ में साल 2011 के एक अंक में पिछली महाविलुप्ति के दौरान की दरों और मौजूदा समय की दर की तुलनाओं के बारे में छपा था और ज़्यादा  से ज़्यादा  अनुदार तुलनाएँ भी एक ही तरफ इशारा कर रही थीं। वो ये कि महाविनाश की कहानी छठी बार फिर से दोहरायी जाने वाली है। और यह सिर्फ कुछ ही सदियों की बात है। इन तमाम शोधकर्ताओं के अनुसार इससे पहले के  महाप्रलय प्राकृतिक कारणों जैसे ज्वालामुखी, उल्कापिंड या भूकम्पों के कारण हुए थे । लेकिन इस बार कारण उल्का या ज्वालामुखी नहीं बल्कि मनुष्य होगा।
पश्चिम के पूँजीवादी विज्ञानी हालाँकि अध्ययन तो अच्छा करते हैं और नतीजे भी निकाल देते हैं। लेकिन इसके मूल कारण को कभी नहीं पकड़ते। मूल कारण मनुष्य नहीं है। ये सभी बुर्जुआ पर्यावरणविद व वैज्ञानिक बेशर्मी के साथ तर्क देते हैं कि मानव का स्वभाव मूलरूप से विनाशकारी है। ये लोग मनुष्य के स्वभाव, सामाजिक व्यवस्था व संस्कृति तक के कारण मनुष्य के डीएनए , बायोलॉजी और जैविक विकास में तलाशते हैं। और इस तरह भूख, गरीबी, युद्ध आदि के साथ प्रकृति के विनाश का जिम्मेदार भी समाज व्यवस्था की बजाय मानव के स्वभाव को बता दिया जाता है। लेकिन ये महानुभाव भूल जाते हैं कि मानव का स्वभाव कोई जड़ वस्तु नहीं है जो लाखों वर्षों पहले, जब मनुष्य का वानर से उद्गम हुआ था, से अभी तक मानव समाज के विकास के साथ मानव का स्वभाव भी विकसित हुआ है। असल में मानव समाज और उसके साथ मानवीय स्वभाव का ऐतिहासिक और भौतिक आधार मानव, मानव की उत्पादक गतिविधियों और प्रकृति के बीच द्वंद्वात्मक संबंधों पर टिका होता है। इसका मतलब है कि प्रकृति को बदलने की प्रक्रिया यानि उत्पादक गतिविधियों के पूरे इतिहास के दौरान मानव समाज भी तब से आज तक उत्पादक गतिविधियों के अनुसार विकसित हुआ है और इस तरह से मानव स्वभाव भी मानव समाज और सामाजिक व्यवस्थाओं के अनुसार विकसित होता आया है। प्रकृति को बदलने की प्रक्रिया में मानव खुद को भी बदलता ही बदलता है। और यह बदलाव लाखों वर्ष से जारी है और आगे भी जारी रहेगा। जाहिर है कि मनुष्य और मनुष्य का स्वभाव इस महाविनाश के लिए जिम्मेदार नहीं है। मनुष्य तो पृथ्वी पर 2 लाख साल से विद्यमान है। और यह जैव विलुप्ति की दर में तेजी महज 400 साल से ही आई है। तो फिर क्या कारण हो सकता है? हम अगर गौर करें तो पाते हैं कि पूँजीवाद भी इसी दौरान यानि पिछले 400 साल से मानव सभ्यता पर काबिज हुआ है। मुनाफ़ा आधारित पूँजीवादी व्यवस्था मुनाफ़े  के लिए मनुष्य और प्रकृति दोनों का ही निर्मम दोहन करती है और पिछले 100 साल में तो यह दोहन अपनी चरम अवस्था पर जा पहुँचा है। फिर नवउदारवादी नीतियाँ लागू होने के बाद की स्थिति को देखने के बाद पूँजीवाद की भूमिका किसी भी सन्देह की गुंजाईश नहीं छोड़ती है।
तो चलिये, देखते हैं कि पूँजीवाद इसमें आख़िर किस तरह से मुख्य और एकमात्र भूमिका निभा रहा है। मानव समाज और पृथ्वी की जैव विविधता के बीच सबसे महत्वपूर्ण अन्तर्सम्बन्ध हमारी भोजन श्रृंखला यानी खेती, पशुपालन और मछली पालन के माध्यम से बनता है। दस हजार साल पहले हुई कृषि क्रान्ति के बाद और उससे पहले भी हालाँकि मानवीय क्रियाकलापों की वजह से कुछ जैव प्रजातियों को विलुप्ति की तरफ धकेला था, जिनमें मैमथ जैसे बड़े जीव भी शामिल थे, लेकिन यह भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि इसका कारण सिर्फ मानवीय गतिविधियाँ ही थीं या फिर जलवायु परिवर्तन का भी इसमें बड़ा योगदान रहा था। हालाँकि मानव प्रकृति और इस प्रकार साथ ही साथ जैव विविधता को भी शुरू से ही प्रभावित करता रहा है लेकिन फिर पूँजीवाद में ऐसा क्या हुआ कि जैव विविधता इतनी तेजी से विनाश की तरफ जाने लगी? इसके लिए हमको पूँजीवाद की कार्यप्रणाली को समझना होगा। पूँजीवादी उत्पादन का सबसे महत्वपूर्ण लक्षण है उत्पादित मालों का संग्रह। पूँजीवाद का यही गुण इसको इससे पहले की समाज व्यवस्थाओं से अलग करता है। पूँजीवाद से पहले के उत्पादन के अन्तर्गत  लोग मुख्यतः अपने उपभोग के लिए मालों का उत्पादन करते थे, जबकि पूँजीवाद में उत्पादन बेचने और मुनाफ़ा कमाने के लिए किया जाता है। तो इसका जैव विविधता के खात्मे की परिस्थितियाँ पैदा होने में क्या योगदान है? वह यह कि जितनी भी मानवेतर जैव प्रजातियाँ माल उत्पादन की प्रक्रिया के दायरे से बाहर होती हैं, उनकी कोई ज़रूरत  नहीं होती और वे खत्म होना शुरू हो जाती हैं। लेकिन यह जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के खात्मे का एकमात्र कारण नहीं है, बल्कि यह तो पूँजीवाद के उन कई विध्वंसकारी परिणामों में से एक है जो लगातार मानव और प्रकृति दोनों को खत्म करते जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की खाद्य और कृषि संस्था के आँकड़ों  के अनुसार लगभग 18 जीवों की प्रजातियाँ और 155 फसलों की प्रजातियाँ ही ऐसी हैं जो मालों के तौर पर दुनिया में पैदा की जाती हैं और खरीदी बेची जाती हैं। इनमें से भी केवल कुछ ही ऐसी हैं जिनसे ज़्यादा  मुनाफ़ा होता है और ये ही ग्लोबल मार्केट में ज़्यादा  हावी हैं। तो इससे क्या होता है? पहली बात तो यह कि न सिर्फ खेती के लिए बल्कि लकड़ी, खनिजों की लूट व अन्य संसाधनों के दोहन के लिए भी वनों की अन्धाधुन्ध कटाई पूरी दुनिया में की जा रही है जिसकी वजह से वनों में रहने वाले जन्तुओं का प्राकृतिक आवास पूरी तरह से नष्ट हो रहा है। यही हाल पहाड़ों के खनन का है। आवास नष्ट होने के चलते इन सभी जैव प्रजातियों पर अस्तित्व का संकट आ खड़ा हुआ है जिसकी परिणिति इनकी विलुप्ति में हो रही है। आवास नष्ट होने की यह प्रक्रिया सिर्फ वनों तक सीमित नहीं है बल्कि जलीय जीवों के सामने भी इसी तरह का संकट है क्योंकि पानी भी इतना अधिक प्रदूषित हो चुका है कि अधिकतर जीवों के लिए इसमें रह पाना लगातार असम्भव होता जा रहा है। कृषि की बात करें तो ज़्यादा  मुनाफ़े  के लिए ज़्यादा  से ज़्यादा  फसल उत्पादन के चक्कर में कीटनाशकों, कृत्रिम उर्वरकों का विवेकहीन इस्तेमाल किया जा रहा है जिसकी वजह से कृषि भूमि की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति लगभग खत्म हो चुकी है और साथ में इस भूमि पर और मिट्टी के अंदर रहने वाले जीव भी। लेकिन ये विनाशकारी प्रभाव सिर्फ कृषि भूमि तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि ये गैर कृषि भूमि और जल स्रोतों को भी अपनी चपेट में ले चुके हैं। कीटनाशकों व रसायनों के अन्धाधुन्ध  इस्तेमाल की वजह से फायदा सिर्फ पूँजीपति को, खाद्य कम्पनियों को और रसायन कम्पनियों को होता है। अधिकतर जनता को फिर भी भूखा नंगा ही मरना पड़ता है और प्रकृति की कीमत पर उत्पादित खाद्य और अन्य सामान मुनाफ़े  की भेंट चढ़ जाता है। मुनाफ़े  की अन्धी  दौड़ को कायम रखने के लिए पूँजीवाद ने प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट करके अपना ही एक कृत्रिम परिस्थितिकी तंत्र बना लिया है जिसका हिस्सा कुछ खास तरह के मालों के रूप में बिकने वाली फसलें और जैव प्रजातियाँ हैं बाकी सब जो इससे बाहर हैं उन पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। लेकिन यह सिर्फ कृषि की बात नहीं है, मुनाफ़ा आधारित तमाम अन्य उद्योग भी हर तरह के माल का उत्पादन इंसानी ज़रूरत  के हिसाब से नहीं बल्कि मुनाफ़े  के लिए करते हैं जिसमें प्रकृति का वैसे ही दोहन होता है और यहाँ भी बदले में प्रकृति को प्रदूषण और पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश ही मिलता है। ग्लोबल वार्मिंग और उसके प्रभाव सीधे-सीधे इसी व्यवस्था की देन हैं जो जलवायु परिवर्तन के जरिये जैव आवासों को नष्ट करने में एक महती भूमिका अदा कर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार अगले कुछ दशकों में ग्लोबल वार्मिंग के चलते आर्कटिक और अंटार्कटिक की बर्फ पिघल जाएगी और समुद्र किनारे बसी तमाम मानव बस्तियाँ जलमग्न हो जाएँगी, पहले से संकटग्रस्त जैव विविधता पर जो कहर टूटेगा वह अलग से।
साफ है कि पूँजीवाद किस प्रकार इस पूरे महाविनाश के लिए जिम्मेदार है। पूँजीवाद मानवजाति की एक ऐसी बीमारी है जो परजीवी की तरह न केवल मानवजाति को बल्कि पूरी प्रकृति को खाये जा रही है। और अगर यह यूँ ही जारी रहा तो जैसा कि रोजा लक्ज़मबर्ग ने कहा था कि समाजवाद न आने की कीमत मानवता को बर्बरता के तौर पर चुकानी पड़ेगी। लेकिन आज के सन्दर्भ में रोजा लक्ज़मबर्ग का यह कथन भी अधूरा प्रतीत होता है। आज हम निश्चित तौर पर दृढ़ता के साथ कह सकते हैं और न सिर्फ कह सकते हैं बल्कि हमें यह कहना ही चाहिए कि समाजवाद के न आने की कीमत हमको न केवल बर्बरता से बल्कि महाविनाश से चुकानी पड़ेगी। समाजवाद न आया तो मानवता ही नहीं पृथ्वी से जीवन ही खत्म हो जाएगा। तो हमको समस्या पता है, समस्या का कारण पता है और इस कारण का निवारण भी पता है। इसलिए आज के समय में यह जरूरी है कि इस बात को समझा जाए कि सिर्फ और सिर्फ मेहनतकश के नेतृत्व में होने वाली क्रांति और उसके द्वारा पूँजीवाद का विनाश व समतामूलक समाजवादी व्यवस्था की स्थापना ही मानवता, प्रकृति और पृथ्वी पर जीवन को को बचा सकती है। इसके अलावा और कोई चारा हमारे पास नहीं है।

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