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“मैं हूँ नेता “

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पहले कीमतें मैंने बढाई
फिर मैंने कहा मेरे पास जादू की छड़ी नहीं है भाई
जो मैंने यूँ घुमाई
और खत्म हो जाएगी महंगाई

मैं हूँ नेता , कुछ नही देता
बस लेता ही लेता
कभी मैं तुमसे नोट लेता
कभी मैं तुमसे वोट लेता
और बदले में लूट लेता खसोट लेता
बचे खुचे का मैं गला घोत देता
मैं हूँ नेता कुछ नही देता
बस लेता ही लेता

वादों के मैं ढेर लगाता
घोसनाओ के मैं पेड़ लगाता
फिर उनपर घोटालों के फल उगाता
सारे फंडो को चट कर जाता
मैं हूँ नेता , कुछ नही देता
बस लेता ही लेता

कागजों पर मैं सड़क बनाता
फाइलो में ही पुल बनाता
योजनाओं की बाढ़ हूँ लाता
परियोजनाओं के बोझ तले लोग दबाता
फिर सारे पैसे हो गये मेरे हवाले
किसकी मज़ाल जो मेरे अकाउंट खंगाले
मैं हूँ नेता , कुछ नही देता
बस लेता ही लेता

जेल तो अपना दूसरा घर है
यहाँ कहाँ किसी का डर  है
चैन से यहाँ कुछ दिन बिताते हैं
बाकी का काम चेले चमचे कर जाते हैं
दिन भर थकान मिटाते हैं
रात का प्रबंध थानेदार साहब कर जाते हैं
मैं हूँ नेता , कुछ नही देता
बस लेता ही लेता

जब आता है चुनाव का सीज़न
परेसानी का बढ़ जाता है रीज़न
लेता हूँ सारे कार्यकर्ता जुटा
पैसे तो देता हूँ पानी की तरह लूटा

धर्म के नाम पर मैं दंगे कराता
अलग अलग गुटों को मैं भिड़ाता
सबका हितैषी बन उनके पास जाता
अपने हित की वोते जुटाता
मैं हूँ नेता , कुछ नही देता
बस लेता ही लेता

कुर्सी की ही खाता हूँ
इसीलिए इसे ही बचाता हूँ
जब मुश्किल हो इसे बचाने में
भाई भतीजो के नाम इसे कर जाता हूँ
मैं हूँ नेता , कुछ नही देता
बस लेता ही लेता

पहले कीमतें मैंने बढाई
फिर मैंने कहा मेरे पास जादू की छड़ी नहीं है भाई
जो मैंने यूँ घुमाई
और खत्म हो जाएगी महंगाई

मैं हूँ नेता , कुछ नही देता
बस लेता ही लेता
कभी मैं तुमसे नोट लेता
कभी मैं तुमसे वोट लेता
और बदले में लूट लेता खसोट लेता
बचे खुचे का मैं गला घोत देता
मैं हूँ नेता कुछ नही देता
बस लेता ही लेता

वादों के मैं ढेर लगाता
घोसनाओ के मैं पेड़ लगाता
फिर उनपर घोटालों के फल उगाता
सारे फंडो को चट कर जाता
मैं हूँ नेता , कुछ नही देता
बस लेता ही लेता

कागजों पर मैं सड़क बनाता
फाइलो में ही पुल बनाता
योजनाओं की बाढ़ हूँ लाता
परियोजनाओं के बोझ तले लोग दबाता
फिर सारे पैसे हो गये मेरे हवाले
किसकी मज़ाल जो मेरे अकाउंट खंगाले
मैं हूँ नेता , कुछ नही देता
बस लेता ही लेता

जेल तो अपना दूसरा घर है
यहाँ कहाँ किसी का डर  है
चैन से यहाँ कुछ दिन बिताते हैं
बाकी का काम चेले चमचे कर जाते हैं
दिन भर थकान मिटाते हैं
रात का प्रबंध थानेदार साहब कर जाते हैं
मैं हूँ नेता , कुछ नही देता
बस लेता ही लेता

जब आता है चुनाव का सीज़न
परेसानी का बढ़ जाता है रीज़न
लेता हूँ सारे कार्यकर्ता जुटा
पैसे तो देता हूँ पानी की तरह लूटा

धर्म के नाम पर मैं दंगे कराता
अलग अलग गुटों को मैं भिड़ाता
सबका हितैषी बन उनके पास जाता
अपने हित की वोते जुटाता
मैं हूँ नेता , कुछ नही देता
बस लेता ही लेता

कुर्सी की ही खाता हूँ
इसीलिए इसे ही बचाता हूँ
जब मुश्किल हो इसे बचाने में
भाई भतीजो के नाम इसे कर जाता हूँ
मैं हूँ नेता , कुछ नही देता
बस लेता ही लेता

…अंकित कुमार (पुणे)

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