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मोदी सरकार के वैज्ञानिक तथ्य-विश्लेषण आधारित कुछ भविष्यवाणियाँ! -कात्यायनी

मोदी सरकार के वैज्ञानिक तथ्य-विश्लेषण आधारित कुछ भविष्यवाणियाँ! -कात्यायनी

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मोदी सरकार के सवा तीन वर्ष पूरे हो चुके हैं व मोदी के सत्‍तासीन होने के छह महीने बाद लिखे गये इस लेख में से अब तक बहुत सारी वैज्ञानिक भविष्‍यवाणियां सही साबित हो चुकी हैं।

आने वाले चार-पाँच वर्षों के दौरान:

विदेशों में जमा काला धन का एक पाई भी नहीं आयेगा। देश के हर नागरिक के खाते में 15 लाख रुपये आना तो दूर, फूटी कौड़ी भी नहीं आयेगी। कुल काले धन का 80 फ़ीसदी तो देश के भीतर है। उसमें भारी बढ़ोत्तरी होगी।
विदेशों से आने वाली पूँजी अतिलाभ निचोड़ेगी और बहुत कम रोज़गार पैदा करेगी। निजीकरण की अन्धाधुँध मुहिम में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को हड़ताली देशी- विदेशी कम्पनियाँ जमकर छँटनी करेगी। पुराने उद्योगों में बड़े पैमाने पर तालाबन्दी होगी। नतीजतन न केवल ब्लू कॉलर नौकरियों बल्कि व्हाइट कॉलर नौकरियों की भी अभूतपूर्व कमी हो जायेगी और इंजीनियरों, तकनीशियनों, क्लर्कों की नौकरियाँ भी मुहाल हो जायेंगी। बेरोज़गारी की दर नयी ऊँचाइयों पर होंगी और छात्रों-युवाओं के आन्दोलन बड़े पैमाने पर फूट पड़ेंगे।

मोदी के “श्रम सुधारों” के परिणामस्वरूप मज़दूरों के रहे-सहे अधिकार भी छिन जायेंगे, असंगठित मज़दूरों के अनुपात में और अधिक बढ़ोत्तरी हो जायेगी, बारह-चौदह घण्टे सपरिवार खटने के बावजूद मज़दूर परिवारों का जीना मुहाल हो जायेगा। नतीजतन औद्योगिक क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर मज़दूर असन्तोष उग्र संघर्षों के रूप में फूट पड़ेंगे। दलाल और सौदेबाज़ यूनियनें अप्रासंगिक हो जायेंगी। इन स्वतःस्फूर्त मज़दूर उभारों की क्रान्तिकारी वाम की कोई धारा यदि सही राजनीतिक लाइन से लैस हो, तो सही दिशा में आगे बढ़ा सकती है।

जल, जंगल, ज़मीन, खदान: सब कुछ पहले से कई गुना अधिक बड़े पैमाने पर देशी-विदेशी कॉरपोरेट मगरमच्छों को सौंपे जायेंगे, लोगों को बन्दूक़ की नोंक पर विस्थापित किया जायेगा और उसके हर प्रतिरोध को बर्बरतापूर्वक कुचलने की कोशिश की जायेगी। नया भूमि अधिग्रहण क़ानून लागू होने के बाद किसानों को उनकी जगह-ज़मीन से बलात बेदख़ल करना एकदम आसान हो जायेगा। खेती में तेज़ी से बढ़ती देशी-विदेशी पूँजी की पैठ छोटे किसानों के सर्वहाराकरण और विस्थापन में अभूतपूर्व तेज़ी ला देगी। शहरों में प्रवासी मज़दूरों और बेरोज़गारों का हुजूम उमड़ पड़ेगा।

विश्वव्यापी मन्दी और आर्थिक संकट की जिस नयी प्रचण्ड लहर की भविष्यवाणी दुनियाभर के अर्थशास्त्री कर रहे हैं, वह तीन-चार वर्षों के भीतर भारतीय अर्थतन्त्र को एक भीषण दुश्चक्रीय निराशा के भँवर में फँसाने वाली है। महँगाई और बेरोज़गारी तब विकराल हो जायेगी। व्यवस्था का क्रान्तिकारी संकट अपने घनीभूततम और विस्फोटक रूप में सामने होगा।

उग्र जनउभारों को कुचलने के लिए सत्ता पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों का खुलकर इस्तेमाल करेगी। भविष्य के “अनिष्ट संकेतों” को भाँपकर मोदी सरकार अभी से पुलिस तन्त्र, अर्द्धसैनिक बलों और गुप्तचर तन्त्र को चाक-चौबन्द बनाने पर सबसे अधिक बल दे रही है। घनीभूत संकट के दौरान शासक वर्गों की राजनीतिक एकजुटता भी छिन्न-भिन्न होने लगी और बढ़ती अराजकता भारतीय राज्य को एक “विफल राज्य” जैसी स्थिति में भी पहुँचवा सकता है। जन-संघर्षों और विद्रोहों को कुचलने के लिए सन्नद्ध दमन तन्त्र भारतीय राज्य को एक ‘पुलिस स्टेट’ जैसा बना देगा।

मोदी के अच्छे दिनों के वायदे का बैलून जैसे-जैसे पिचककर नीचे उतरता जायेगा, वैसे-वैसे हिन्दुत्व की राजनीति और साम्प्रदायिक तनाव एवं दंगों का उन्मादी खेल ज़ोर पकड़ता जायेगा ताकि जन एकजुटता तोड़ी जा सके। अन्धराष्ट्रवादी जुनून पैदा करने पर भी पूरा ज़ोर होगा। पाकिस्तान के साथ सीमित या व्यापक सीमा संघर्ष भी हो सकता है, क्योंकि जनाक्रोश से आतंकित दोनों ही देशों के संकटग्रस्त शासक वर्गों को इससे राहत मिलेगी।
लुब्बेलुबाब यह कि मोदी सरकार की नीतियों ने उस ज्वालामुखी के दहाने की ओर भारतीय समाज के सरकते जाने की रफ्तार को काफ़ी तेज़ कर दिया है, जिस ओर घिसटने की यात्र गत लगभग तीन दशकों से जारी है। भारतीय पूँजीवाद का आर्थिक संकट ढाँचागत है। यह पूरे सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है। बुर्जुआ जनवाद का राजनीतिक-संवैधानिक ढाँचा इसके दबाव से चरमरा रहा है। मोदी सरकार पाँच वर्षों के बाद लोगों के सामने अलग नंगी खड़ी होगी। भारत को चीन और अमेरिका जैसा बनाने के सारे दावे हवा हो चुके रहेंगे। भक्तजनों को मुँह छुपाने को कोई अँधेरा कोना नहीं नसीब होगा। फिर ‘एण्टी-इन्कम्बेंसी’ का लाभ उठाकर केन्द्र में चाहे कांग्रेस की सरकार आये या तीसरे मोर्चे की शिवजी की बारात और संसदीय वामपन्थी मदारियों की मिली-जुली जमात, उसे भी इन्हीं नवउदारवादी नीतियों को लागू करना होगा, क्योंकि कीन्सियाई नुस्खों की ओर वापसी अब सम्भव ही नहीं।

आने वाले वर्षों में व्यवस्था के निरन्तर जारी असाध्य संकट का कुछ-कुछ अन्तराल के बाद सड़कों पर विस्फोट होता रहेगा। जब तक साम्राज्यवाद विरोधी पूँजीवाद विरोधी सर्वहारा क्रान्ति की नयी हरावल शक्ति नये सिरे से संगठित होकर एक नये भविष्य के निर्माण के लिए आगे नहीं आयेगी, देश अराजकता के भँवर में गोते लगाता रहेगा और पूँजीवाद का विकृत से विकृत, वीभत्स से वीभत्स, बर्बर से बर्बर चेहरा हमारे सामने आता रहेगा।

 

 

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