राइट टू प्राइवेसी : निजता लोगों का अधिकार है, उल्‍लंघन ना हो : अंबेडकर -मुकेश सिंह

राइट टू प्राइवेसी (निजता का अधिकार) एक मौलिक अधिकार है: सुप्रीम कोर्ट

एक बेहद अहम फैसले के तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार, यानी राइट टू प्राइवेसी को मौलिक अधिकारों, यानी फन्डामेंटल राइट्स का हिस्सा करार दिया है। कोर्ट का यह फैसला देश के हर नागिरक को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में प्रभावित करेगा। नौ जजों की संविधान पीठ ने कहा कि राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकारों के अंतर्गत प्रदत्त जीवन के अधिकार का ही हिस्सा है। राइट टू प्राइवेसी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आती है।

नौ जजों की संविधान पीठ राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकारों के अंतर्गत मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहर की अध्यक्षता में बनाई गयी न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ में न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति एस ए बोबड़े, न्यायमूर्ति आर के अग्रवाल, न्यायमूर्ति रोहिंगटन फली नरीमन, न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं।

कोर्ट ने कहा कि निजता का आकार इतना बड़ा है कि ये हर मुद्दे में शामिल है। अगर हम निजता को सूचीबद्ध करने का प्रयास करेंगे तो इसके विनाशकारी परिणाम होंगे। निजता सही में स्वतंत्रता का एक सब सेक्शन है।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर मैं अपनी पत्नी के साथ बेडरूम में हूं तो ये प्राइवेसी का हिस्सा है। ऐसे में पुलिस मेरे बैडरूम में नहीं घुस सकती लेकिन अगर मैं बच्चों को स्कूल भेजता हूं तो ये प्राइवेसी के तहत नहीं है क्योंकि ये राइट टू एजूकेशन के तहत आता था।

उन्होंने कहा कि आप बैंक में अपनी जानकारी देते हैं, मेडिकल इंशोयरेंस और लोन के लिए अपना डाटा देते हैं। ये सब कानून द्वारा संचालित है यहां बात अधिकार की नहीं है। आज डिजिटल जमाने में डेटा प्रोटेक्शन बड़ा मुद्दा है। सरकार को डेटा प्रोटेक्शन के लिए कानून लाने का अधिकार है।

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने प्रधान न्यायाधीश जे एस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष बहस शुरू की और कहा कि जीने का अधिकार और स्वतंत्रता का अधिकार पहले से मौजूद नैसर्गिक अधिकार हैं।

राइट टू प्राइवेसी : प्रमुख तथ्य

राइट टू प्राइवेसी का पर फैसला देते हुए नौ जजों की संविधान पीठ ने साल 1954 और साल 1962 में दिए गए फैसलों को पलट दिया। साथ ही सरकार के तर्कों को भी दरकिनार कर दिया। हालांकि जजों ने यह भी कहा कि व्यक्तिगत स्तर पर इस अधिकार पर तर्क की सीमा में रहकर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

फैसले में यह भी साफ किया कि राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकारों के अंतर्गत प्रदत्त जीवन के अधिकार का ही हिस्सा है। भारत के लोकतंत्र को ताकत स्वाधीनता और स्वतंत्रता से मिलती है।

इस मामले में याचिकाकर्ता सजन पूवइय्या (Sajan Poovayya) ने कहा- राज्य जो भी फैसला लेता है उसकी परख इस फैसले पर की जाएगी। उन्होंने कहा कि यह ऐतिहासिक पल है। उन्होंने एनडीटीवी से कहा कि यह राज्य की शक्तियों में एक हद तक कटौती करता है।

सरकार के दावे को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार समाज के सभी वर्गों की आकांक्षा में हैं और हर सामान्य नागरिक निजता का अधिकारी है फिर चाहे वह अमीर हो या गरीब हो। कोर्ट के इस फैसले का कई अन्य केसेस पर भी असर पड़ेगा। यह असर उस केस पर भी पड़ेगा जिसमें कि भारतीय वॉट्सऐप यूजर्स की डीटेल फेसबुक द्वारा ऐक्सेस किए जाने को चुनौती दी गई है। इस बाबत भी याचिकाकर्ता ने प्राइवेस की उल्लंघन की बात कही है।

गे-सेक्स यानी समलैंगिक संबंधों पर बैन को लेकर भी एक बार फिर बहस शुरू हो सकती है और इस बाबत कोई नई अपील की जा सकती है। इस फैसले के बाद डीएनए बेस्ड टेक्नॉलॉजी बिल 2017 पर भी असर पड़ सकता है, जिसके तहत सरकार को डीएनए डाटा बैंक बनाने की इजाजत है। इसके तहत सरकार को इस डाटा का प्रयोग फोरेंसिक कारणों से करने भी इजाजत है।

क्‍या है आर्टिकल 21?

संविधान का ये आर्टिकल देश के हर नागरिक को जीवन जीने की आजादी और व्यक्तिगत आजादी के संरक्षण की व्‍याख्‍या करता है. इसमें कहा गया है, ‘किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन और शरीर की स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।’

इतिहास:

आपको जानकर हैरानी होगी कि 1895 में ये मुद्दा उठाया गया था। उस सयम कहा गया था कि भारतीय संविधान बिल में निजता के अधिकार को शामिल किया जाए। इसके बाद 1925 में ‘कॉमनवेल्‍थ ऑफ इंडिया बिल’ में भी निजता के अधिकार पर जोर दिया गया था। इस समिति के सदस्‍य महात्‍मा गांधी भी थे। फिर 1947 में खुद अंबेडकर ने कहा था कि निजता लोगों का अधिकार है। इसका उल्‍लंघन ना हो, इसके लिए कड़े नियम बनाने होंगे।

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