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रोजगार पैदा करने वाला हो एफडीआई (पत्रिका)

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भारत की अर्थव्यवस्था में एक अनोखा अंतर्विरोध दिखाई दे रहा है। बीते कुछ दशकों में, खास तौर से विकासशील देशों में यह पाया गया है कि मेक्रो इकॉनोमिक्स में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के लिए रामबाण है। ज्यादा एफडीआई आने का मतलब देश की आर्थिक नीतियों की स्वीकार्यता के साथ अर्थव्यवस्था की बेहतर सेहत का संकेत भी माना जाता है। पिछले कुछ वर्षों तक स्थिर रहने के बाद बीते तीन वर्ष में भारत में एफडीआई 28.2 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रहा है। यह एफडीआई के नियमों में राहत देने और कारोबार करने में आसानी के लिए किए गए उपायों के चलते हुआ है।

फिर भी, भारत में रोजगार की दर घटी है। देश के 30 फीसदी से ज्यादा युवा बेरोजगार हैं। भारत की रोजगार सापेक्षता 1991 के 0.3 फीसदी से गिरकर 0.15 फीसदी पर आ गई है। स्टार्टअप निवेश को लेकर जैसा हो-हल्ला मचा था, उस हिसाब से नौकरियों का ढेर लग जाना चाहिए था। लेकिन इसकी जगह हुआ क्या? नौकरियों में छंटनी का दौर शुरू हो गया और पिछले साल 10,000 लोग नौकरी गंवा चुके हैं। अगले कुछ वर्षों में टेलीकॉम और ऑटोमोबाइल सेक्टर में कंपनियों के विलय और रोजगार पैदा करने वाले आईटी जैसे प्रमुख सेक्टर में वीजा कानूनों में बदलाव व ऑटोमेशन के कारण बड़े पैमाने पर पुनर्गठन होगा।

इनसे रोजगार के अवसर और कम होंगे। वस्तुत: भौगोलिक और क्षेत्रीय विषमताओं ने असर दिखाया है। एफडीआई महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे शहरी आधार वाले राज्यों में अधिक आई जहां 2014 से 2017 के बीच कुल मिलाकर 13.4 लाख करोड़ रुपए से अधिक की एफडीआई का प्रवाह हुआ। यह देश में आए कुल एफडीआई का 75 फीसदी है। भौगोलिक रूप से बड़े क्षेत्र वाले उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश को 2014 से 2017 के दौरान एफडीआई का मात्र एक प्रतिशत ही मिल पाया। इससे होगा यह कि जैसे-जैसे एफडीआई बढ़ेगा शहरीकृत संपन्न राज्य और संपन्न होंगे, जिससे अन्य राज्यों के लिए पूंजी आकर्षित करना ज्यादा कठिन होता जाएगा।

सेवाओं और आईटी क्षेत्र में रोजगार के अवसर सीमित हैं। जबकि परंपरागत रूप से बड़ी संख्या में रोजगार सृजित करने वाले निर्माण क्षेत्र में एफडीआई की हिस्सेदारी घट रही है। टेक्सटाइल एवं लेदर जैसे अन्य सेक्टर में, जिनमें भारत को कुछ स्वाभाविक लाभ हैं, वर्ष 2000 से एफडीआई में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई। धातु और रसायन उद्योग भी निचले पायदान पर बना हुआ है। पूंजी आकर्षित करने में जाहिरा तौर पर भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे उभरते बाजारों से आगे हैं, लेकिन बड़ी संख्या में रोजगार पैदा करने वाले क्षेत्र में पूंजी लाने में विफल रहा है। सीधे तौर पर हम रोजगार-विहीन विकास कर रहे हैं।

भारत में एक मध्यम व लघु उद्योगों के लिए कानून होना चाहिए, जिसमें भूमि अधिग्रहण, श्रमिकों के मामले, फैक्ट्री बनाने या किराए पर लेने जैसी सारी बातें समाहित हों। इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कर नीतियों में सूक्ष्म इकाइयों को 10 साल की ‘कर छूट’ दी जा सकती है। लघु और मध्यम दर्जे की इकाइयों के लिए नीची कर दरें लागू की जा सकती हैं। एफडीआई में क्षेत्रीय असमानता को दूर करते हुए अधिक रोजगार देने वाले क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में एफडीआई आकर्षित करने के लिए पिछड़े राज्यों में काम शुरू करने पर शर्तें आसान करनी होंगी। यह कदम शहरों की तरफ पलायन रोकने में भी मददगार होगा।

गरीब राज्यों में समान विकास के लिए एफडीआई में भौगोलिक बिखराव को नियंत्रित करना काफी मुश्किल है। चीन ने अपने दूरस्थ इलाकों में निवेश आकर्षित करने के जो नीतिगत उपाय अपनाए हैं उनका अध्ययन करके इन्हें अपने यहां लागू किया जा सकता है। निवेश बढ़ाने के लिए सिर्फ नीतिगत उपाय करना ही काफी नहीं हैं। पिछड़े राज्यों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने व उद्योगों के लिए आधारभूत सुविधाओं का ढांचा बढ़ाने की भी जरूरत है।

रिकॉर्ड एफडीआई आने के बाद भी सेवा क्षेत्र में रोजगार सृजन में मंदी के हालात का सामना करने के लिए राष्ट्रीय निर्माण नीति से तालमेल रखते हुए सेवाओं के लिए एकीकृत नीति बने। सेवाओं को लेकर फिर से सरकारी नीतियों में सही दिशा में ध्यान देने की जरूरत है, जिसमें सबसे निचले पायदान की शारीरिक श्रम से लेकर उच्च स्तर की इंटरनेट आधारित सेवाएं शामिल की जानी चाहिए। बिना तैयारी के दूसरे देशों से किए गए व्यापारिक समझौतों से हमें कच्चे माल पर ऊंची दर से आयात शुल्क देना पड़ा जबकि तैयार माल पर कम शुल्क मिला।

इससे हमारे निर्माण क्षेत्र को भारी हानि उठानी पड़ी। जरा सोचिए, पोशाकें, भारत में बिना शुल्क दिए आयात की जा सकती हैं, जबकि उनके लिए कच्चे माल- हाथ से निर्मित धागे पर 10 फीसदी शुल्क अदा करना पड़ता है। लेपटॉप और मोबाइल फोन को आयात करना आसान है, जबकि इनके पुर्जों पर ऊंची दर का आयात शुल्क लगता है। इस किस्म के व्यापारिक समझौते भारत के निर्यात के लिए बाजार खोलने में विफल रहे हैं। याद रखना होगा कि एफडीआई के आर्थिक फायदे अल्पकालिक और अप्रत्याशित हैं इसलिए स्वदेशी निवेश को बढ़ावा देना जरूरी है जो सामाजिक-आर्थिक प्रतिफल देता है। वरुण गांधी सांसद, भाजपा

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This post was written by ajit gupta.

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