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वे आ रहे हैं

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वे आ रहे हैं.

वे हजारों की संख्या में आ रहे हैं. हो सकता है भाषा का व्याकरण अनगढ़ हो. हेडलाइन में गलतियां हों. हो सकता है कि कैमरा देखकर बोलने का आत्मविश्वास न आया हो, जो वैसे भी पीढ़ियों में आता है, हो सकता है कि उन्होंने अपना वीडियो मोबाइल फोन से लिया हो, खबरें यहां-वहां से ली हों, लेकिन नजरिया अपना हो, उनके पास बात हो, लेकिन बोलने का तरीका न हो. तमाम दोष हो सकते हैं.
लेकिन वे आ रहे हैं.

भारत के मीडिया इतिहास में पहली बार सैकड़ों बहुजन मीडियाकर्मी आ रहे हैं. वे अपनी बात करेंगे. हो सकता है उनमें से कई असफल हो जाएं. कुछ हो  सकता है कि कानूनी झमेलों में फंसा दिए जाएं. हो सकता है कि समाज से उन्हें आर्थिक सहयोग न मिले. हो सकता है कि वे आलोचना का शिकार बन रहे हैं. हो सकता है कि उनका मजाक बनाया जाए. मुमकिन है कि हौसला बढ़ाने वाले चार हों और टांग खींचने वाले चालीस और वे अपने ही लोग हों.
लेकिन वे आ रहे हैं.

वे बहुजन मीडियाकर्मी हैं. वे ब्राह्मणवादी मीडिया का मुंह बंद करने आ रहे हैं. वे भारतीय मीडिया स्पेस को पहली बार लोकतांत्रिक बनाने आ रहे हैं. वे मीडिया में विविधता लाने आ रहे हैं. हो सकता है कि उनमें से कुछ बिक जाएं. हो सकता है कि कुछ को समझौता करना पड़े. कुछ भी हो सकता है. कामयाबी का विश्वास है, गारंटी नहीं है. तमाम जोखिम हैं.
लेकिन वे आ रहे हैं.

वे मूक बहुमत को आवाज देने आ रहे हैं. वे सवर्ण पत्रकारों पर बहुजनों की चली आ रही निर्भरता को खत्म करने के लिए आ रहे हैं.
वे कई शक्ल में हैं. उनके फेसबुक पेज हैं. ह्वाट्सऐप ग्रुप हैं. वेबसाइट हैं. ट्विटर हैंडल हैं. यूट्यूब चैनल हैं. अखबार और पत्र-पत्रिकाएं हैं. मेल ग्रुप हैं.
स्वागत नहीं करेंगे?

 

साभार : दिलिप सी मंडल (वरिष्ठ पत्रकार)कि फेसबुक वाल से

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