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शरीर गलाकर, पेट काटकर जी रहे हैं मज़दूर

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सरकारी आँकड़ों में दावा किया जाता है कि देश के ग़रीबों को भी पहले से बेहतर खाना मिलने लगा है। इन दावों के झूठ की पोल खोलने के लिए बहुत-से अर्थशास्त्री दूसरे आँकड़े भी पेश करते हैं जो बताते हैं कि पिछले बीस वर्षों में जबसे देश में ”विकास” का घोड़ा तेज़ी से दौड़ रहा है तबसे ग़रीबों के भोजन में लगातार गिरावट आती जा रही है। लेकिन जब तक हम प्रत्यक्षत: अनुभव नहीं करते हैं, तब तक विश्वास करना मुश्किल है कि इस भयानक महँगाई के दौर में आम मज़दूर आबादी क्या खाती-पीती और कैसे जीती है।
एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में मज़दूरों के लाजों और झुग्गी बस्तियों में जाने पर जब हम उनकी ज़िन्दगी को करीब से देखते हैं और उसके भागीदार बनते हैं तब हमें जो अहसास होता है वह अहसास किताबी आँकड़ों से कभी नहीं हो सकता।
एक दिन हमारी मज़दूर कार्यकर्ता साथी शुभी ने बताया कि वह फैक्ट्री में अपने लंच में आलू की सब्ज़ी और रोटी ले गयी थी। लेकिन गर्मी की वजह से सुबह की बनी हुई सब्ज़ी ख़राब हो गयी थी तो वह उसे फेंकने लगी, तभी दो अन्य मज़दूर उसे डाँटने लगे कि सारी सब्ज़ी क्यों फेंक रही हो, सब्ज़ी में से आलू को निकालकर पानी से धो लो, खाने लायक हो जायेगा। उन्होंने ऐसा ही किया। मैंने पूछा कि ख़राब खाना खाने से क्या उनकी तबियत नहीं ख़राब होती है, आपने मना क्यों नहीं किया, तो उन्होंने बताया कि ऐसा तो अक्सर ही होता है। लोग सड़ी हुई सब्ज़ी खाते हैं और काम करते रहते हैं, उन्हें कुछ नहीं होता है। आदत पड़ जाती है। गर्मी के दिनों में सुबह 7.30 बजे तक खाना बनाकर, नाश्ता करके, बाकी लंच पैक करके काम पर निकल जाना पड़ता है। कारख़ाने के भीतर और भी गर्मी होती है। ऐसे में कई दिन सब्ज़ी तो ख़राब हो ही जाती है। रोज़-रोज़ फेंकने लगे तो फिर खायेंगे क्या?* वैसे भी महँगाई के कारण मज़दूर औरतें अक्सर बची-खुची, आधी ख़राब सब्ज़ी लेकर आती हैं। फिर उन्होंने ढेरों ऐसी घटनाएँ बतायीं जो रोंगटे खड़े कर देने वाली थीं।
अधिकांश मज़दूर परिवारों में बच्चों के लिए भी दूध नहीं नसीब होता है। माँएँ छोटे-छोटे बच्चों को पानी में आटे के बिस्कुट घोलकर पिलाती हैं। ये औरतें जाकर अपने बच्चे के ‘बॉडी मास इंडेक्स’ की जाँच तो नहीं करा सकती हैं, लेकिन देखकर ही जाना जा सकता है कि ये बच्चे कुपोषण के शिकार होते हैं। इन बस्तियों में आते-जाते जितने बच्चों को हम देखते हैं, उससे बिना अतिशयोक्ति के यह कहा जा सकता है कि इनमें सत्तर फीसदी बच्चे और शायद इतनी ही स्त्रिायाँ कुपोषण की शिकार हैं। पुरुष मज़दूरों की स्थिति भी इससे थोड़ी ही बेहतर है। सरकारी पैमाने से औद्योगिक मज़दूर को प्रतिदिन कम से कम 2700 कैलोरी भोजन मिलना चाहिए। भारी काम करने वालों को कम से कम 3000 कैलोरी मिलना चाहिए। लेकिन वास्तव में अधिकतर मज़दूर रोज़-रोज़ जो खाना खाते हैं उससे पेट भले ही भर जाये, मगर दिन भर काम करने के लिए ज़रूरी सन्तुलित और पौष्टिक भोजन वह नहीं होता। ऊपर से, इन मज़दूरों को कभी भी पूरा आराम नहीं मिलता। ज्यादातर मज़दूर रोज़ 12-13 घण्टे काम करते हैं, और अक्सर हफ्ते में सातों दिन बिना छुट्टी के काम करते हैं। ऐसे में शरीर अन्दर ही अन्दर कमज़ोर होता जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के पैमाने से अगर किसी इलाक़े की 60 प्रतिशत आबादी कुपोषण की शिकार है, तो उस इलाक़े को ”अकालग्रस्त” घोषित करके राहत के विशेष उपाय करने चाहिए। इस पैमाने के हिसाब से तो देश की राजधानी दिल्ली की आधी से ज्यादा आबादी को तत्काल ”अकालग्रस्त” घोषित किया जाना चाहिए! निश्चित ही, भारत सरकार ऐसा नहीं करेगी। क्योंकि ऐसा करने का मतलब होगा यह स्वीकार करना कि तथाकथित विकास की उसकी नीतियाँ ऊपर की 15 प्रतिशत आबादी के लिए ख़ुशहाली का स्वर्ग और बाकी जनता के लिए बदहाली का नर्क पैदा कर रही हैं।
कुपोषण की यह स्थिति भला क्यों न हो। पिछले 15-20 सालों में कारख़ाना मज़दूरों की वास्तविक मज़दूरी लगातार कम होती गयी है। वैसे तो दिल्ली सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मज़दूरी (अकुशल मज़दूर की) 7020 रुपये में भी आज परिवार का गुज़ारा बहुत मुश्किल है, लेकिन 95 प्रतिशत मज़दूरों को तो वह भी नहीं मिलती। ज्यादातर औद्योगिक क्षेत्रों में मज़दूरों को औसतन 120 से लेकर 160 रुपये प्रतिदिन की दर से मज़दूरी मिलती है और वह भी अक्सर पूरे महीने की नहीं मिलती। बात-बात पर मालिक और ठेकेदार पैसे काट लेते हैं या पैसे दबा लेते हैं। इतने कम पैसे में गुज़ारा चलाने के बारे में जब मज़दूर सोचता है तो वह सबसे पहले अपने खाने-पीने में ही कटौती करता है, क्योंकि मकान का किराया या बिजली बिल देने में कटौती नहीं कर सकता है। कहने को तो पिछले 3 वर्ष में मज़दूरी में 1000 से लेकर 1500 रुपये तक की बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन इसी बीच मकान के किराये से लेकर खाने-पीने की चीज़ों तक की महँगाई लगभग दोगुनी बढ़ चुकी है। मज़दूर बस्तियों में किराने की दुकानों पर मिलने वाले राशन, तेल-मसाले आदि की क्वालिटी तो घटिया होती ही है, अक्सर वे महँगी भी होती हैं। इन परिस्थितियों में जीने और काम करने के कारण स्त्री-पुरुष मज़दूर और उनके बच्चे आये दिन बीमार भी होते हैं और उनका ठीक से इलाज भी नहीं हो पाता।
ऊपरी तौर पर देखा जाये तो भले ही मज़दूरों के पास मोबाइल आ गया हो, वे जींस और टीशर्ट पहनने लगे हों, लेकिन उनकी ज़िन्दगी पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो गयी है। बहुत से सरकारी आँकड़े भी इस सच्चाई को उजागर कर देते हैं। ‘असंगठित क्षेत्र में उद्यमों के बारे में राष्ट्रीय आयोग’ की 2004-05 की रिपोर्ट के अनुसार करीब 84 करोड़ लोग (यानि आबादी का 77 फीसदी हिस्सा) रोज़ाना 20 रुपये से भी कम पर गुज़ारा करते हैं। इनमें से भी 22 फीसदी लोग रोज़ाना केवल 11.60 रुपये की आमदनी पर, 19 फीसदी लोग रोज़ाना 11.60 रुपये से 15 रुपये के बीच की आमदनी पर और 36 फीसदी लोग रोज़ाना 15-20 रुपये के बीच की आमदनी पर गुज़ारा करते हैं। देश के करीब 60 प्रतिशत बच्चे खून की कमी से ग्रस्त हैं और 5 साल से कम उम्र के बच्चों के मौत के 50 फीसदी मामलों का कारण कुपोषण होता है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार 63 फीसदी भारतीय बच्चे अक्सर भूखे सोते हैं और 60 फीसदी कुपोषण ग्रस्त हैं। दिल्ली में अन्धाधुन्ध ”विकास” के साथ-साथ झुग्गियों या कच्ची बस्तियों में रहने वालों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ी है और लगभग 70 लाख तक पहुँच चुकी है। इन बस्तियों में न तो साफ पीने का पानी है और न शौचालय और सीवर की उचित व्यवस्था है। जगह-जगह गन्दा पानी और कचरा इकट्ठा होकर सड़ता रहता है, और पहले से ही कमज़ोर लोगों के शरीर अनेक बीमारियों का शिकार होते रहते हैं।
आज से बीस साल पहले मनमोहन सिंह जब वित्त मंत्री थे तब उन्होंने दावा किया था कि नयी आर्थिक नीतियों के कारण जब समाज के शिखरों पर अमीरी आयेगी तो रिस-रिसकर उसका कुछ लाभ नीचे वालों तक भी पहुँच जायेगा। लेकिन वास्तव में इसका उलटा हो रहा है, अमीरी रिसकर नीचे तो नहीं आ रही है, बल्कि नीचे के तबकों को निचोड़कर, कंगाल बनाकर ऊपर के शिखरों पर जगमगाहट आयी है। अब बीस साल बाद आँकड़ों और जीवन की सच्चाइयों ने उनके झूठ को तार-तार करके रख दिया है।

मजदूर बिगुल

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