Breaking News
Home / कविता / शायद अब हमारी बारी है
kavita

शायद अब हमारी बारी है

Spread the love
  • 2
    Shares

मेला है, देखो मेला है
भूखों का लगा
ये मेला है
क्या पार्टी, क्या झंडा
कोई मंत्री आया है,
फिर से वादे करने,
झूठे सपने दिखाने,
बातों में उलझाने,
सुना है, ये भी गरीब था,
पर क्या मेरे पेट की आग बुझा पायेगा ?
मेरे बाप दादा भूख से मर गये,
शायद अब हमारी बारी है |

This post was written by sanjeet kumar.

The views expressed here belong to the author and do not necessarily reflect our views and opinions.

About sanjeet kumar

Check Also

झामुमो आई.टी. सेल्स

आई.टी. सेल्स : झारखंड में सोशल-मीडिया की लडाई में झामुमो सब पर भारी

Spread the love285Sharesझारखंड में फासीवादियों ने जहाँ एक तरफ गोदी मीडिया के माध्यम से अपने …