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सल्लेख यानी कडा तप 

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सल्लेख किसे कहते हैं ? 

सुख विहार क्या हैं? 

शान्त विहार क्या हैं? 
एक समय तथागत बुद्ध श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।  वहां पर उन्होंने आयुष्मान महाचुन्द के एक प्रश्न का समाधान करते हुए कहा – – 
” संसार में आत्मवाद अथवा लोकवाद को लेकर जो अनेक प्रकार की दृष्टियां उत्पन्न होती हैं, जहां ये आश्रय ग्रहण करती हैं, जहां ये व्यवह्दत होती हैं, वहां ‘ यह मेरा नहीं’ , ‘ न यह मैं हूं’, ‘न यह मेरी आत्मा है ‘– इस प्रकार इसे यथार्थ तौर पर सम्यक प्रज्ञा से देख कर इन दृष्टियों का प्रहाण, परित्याग होता है। 

” यदि प्रथम ध्यान करते हुए कोई भिक्षु समझे कि मैं कडा तप ( सल्लेख ) करते  हुए विहर रहा हूं, तो यह ऐसा नहीं है।  आर्यविनय में इसे दृष्टधर्म सुखविहार कहते हैं, इसी जन्म में सुखपूर्वक विहार करना सुखविहार है।  यही बात द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ ध्यान के बारे में भी चरितार्थ होती हैं। 

”  यदि कोई भिक्षु आकाशानन्त्यायन, विज्ञानानन्त्यायन, आकिंचन्यायतन और नैवसंज्ञानासंज्ञियतन को प्राप्त होकर विहरते समय ऐसा समझे कि मैं कडा तप ( सल्लेख ) कर रहा हूं, तो यह ऐसा नहीं है।  आर्यविनय में इन्हें शान्तविहार कहते हैं। ”

कडा तप ( सल्लेख ) इसे  कहते हैं  – 

दूसरे हिंसक होंगे, हम अहिंसक रहेंगे,

दूसरे प्राण लेने वाले होंगे, हम इससे विरत रहेंगे, 

दूसरे बिना दिया लेने वाले, हम इससे विरत रहेंगे,

 दूसरे अब्रह्मचारी होंगे, हम ब्रह्मचारी रहेंगे, 

दूसरे झूठ बोलने वाले होंगे, हम इससे विरत रहेंगे, 

दूसरे चुगली खाने वाले होंगे, हम इससे विरत रहेंगे, दूसरे कठोर वचन कहने वाले होंगे, हम इससे विरत रहेंगे, 

दूसरे व्यर्थ प्रलाप करने वाले होंगे, हम इससे विरत रहेंगे आदि – सल्लेख हैं। 

नमो बुद्धाय ???

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