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सहज व्यापार : एक सज्जन हाल में ही गुरु-दीक्षा लेकर आए। दो-चार सप्ताह तक उनमें शिष्यत्व का भाव रहा, वे उपदेश देने लग गए

सहज व्यापार : यह व्यवसाय बहुत ही लाभप्रद है – उदयमोहन पाठक (अधिवक्ता)

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सहज व्यापार : एक सज्जन हाल में ही गुरु-दीक्षा लेकर आए। दो-चार सप्ताह तक उनमें शिष्यत्व का भाव रहा। एक सच्चे सेवक की भाँति, जो भी उनके समीप जाता, उसके समक्ष गुरुवचन की थाली परोस देते। जब उन्हें पता चला कि उनके करीबी लोग उनकी बातों से प्रभावित हो रहे हैं, वे उपदेश देने लग गए। उन्होंने न आचरण बदला और न अपना स्वभाव, लेकिन अचानक गुरुत्व भाव का उदय होना उनके लिए वरदान बन गया। अब बिना किसी हिचक के किसी को भी उपदेश दे देते। कुछ लोग तो उनका उपदेश सुनने के लिए बाध्य थे, लेकिन कुछ लोग उनसे नजरें चुराने लगे। उन्हें जनाधार घिसकने का भय हो गया तो एक समिति बना डाली। प्रतिमाह नियत तिथि को सत्संग होने लगा। भजन-कीर्तन होने लगा। प्रसाद, भंडारा आदि का कार्यक्रम होने लगा। रसिक जन जुटने लगे। किसी को समय गुजारने की चाहत, किसी को भजन-कीर्तन से लगाव तो किसी को प्रसाद और भोजन से मतलब। विभिन्न लोगों की भक्ति विभिन्न चीजों में थी। समिति चल निकली। चंदा जमा होने लगा। कुछ लोग समिति प्रमुख बनने की होड़ में शामिल हो गए। धीरे-धीरे आलोचना का बाजार गर्म हो गया, फिर भी, गुरु से दीक्षा प्राप्त सज्जन की गद्दी को कोई खतरा नहीं था, क्योंकि इनके अनुभव, ज्ञान से सभी प्रभावित थे

सहज व्यापार : धीरे-धीरे वे सज्जन ‘गुरुजी’ के नाम से महिमा मंडित होने लगे। गुरुजी का मूल प्रवचन था, ”अपने काम से थोड़ा समय निकालो और केवल गुरु का ध्यान करो, तुम्हारे सारे कार्य अपने आप पूर्ण होते जायेंगे। इसमें कुछ भी विशेष कार्य करने की जरूरत ही नहीं।‘‘ इस प्रवचन का असर आम लोगों पर काफी पड़ा। आमजन सहज भाव से इनके शिष्य बनते गए। कुछ भी कार्य करो, कोई बात नहीं, केवल गुरु का ध्यान करो। कोई नियम नहीं। हृदय, मन, शरीर आदि की शुद्धि की कोई बात नहीं। जब भी समय मिले गुरु का ध्यान करो। एक सहज और स्वाभाविक, सस्ता और सुलभ प्रवचन भला किसको आकर्षित नहीं करता। गुरु-गद्दी की पूछ बढ़ने लगी। जिसका कोई पैर नहीं छूता था, आज उनकी चरण-वंदना होने लगी। शिष्यगण उनकी सेवा में लग गए। कुछ दरबारी गायक उनकी महफिल में आते और गीत के माध्यम से उनका स्तवन करते। कुछ मुस्टंडे उनके कमरे के दरवाजे पर सेवा-भाव दर्शाते हुए भक्तों पर अपनी घौंस जमाने लगे। वातानुकूलित कमरे में भी कुछ शिष्यायें पंखे से हवा करने लगीं। यह सब गुरु दीक्षा का चमत्कार था। थोड़ी वाक् चातुरी ने शिष्य को गुरु बना दिया। अब अहंकार आना स्वाभाविक था। लोभ तो पहले से उनमें था। दोनों शब्दों ने मिलकर ऐसा समा बांधा कि लोग बिना दर्शन शुल्क जमा किये गुरुजी से नहीं मिल पाते। समिति नित नई-नई कूटरचना कर धनागम का साधन ढूँढ़ने लगी।

सहज व्यापार : जब धन आ जाता है तो आदमी स्वतः गुणवान, बुद्धिमान और कद्रदान हो जाता है। कहा भी गया है- ”सर्वे गुणाः कांचनं आश्रयन्ति।“ गुरु को क्रोध आना स्वाभाविक प्रक्रिया है। शिष्या महिलाओं की सेवा प्राप्त करना उनके गौरव को दर्शाता है तथा भक्तों के आकर्षण का केन्द्र बनता है। इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी संतोष नहीं होता तो गुरु से भगवान बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। धनबल, बाहुबल, आत्मबल की प्राप्ति होते ही वे राजनीतिक बल प्राप्त करना शुरू कर देते हैं। राजनीतिक बल मिलते ही वे अपनी सम्पूर्णता मान लेते हैं। सारे सद्गुण स्वतः लुप्त होने लगते हैं। वैसे तो उनमें पहले से ही कुछ था नहीं, फिर भी…। ईश्वर बनने की चाहत में एक सफल नाटककार बन जाते हैं। उनका मन अब राग-रंग में रमने लगता है। ईश्वर की शरणागत होकर जब भक्त भयमुक्त हो जाता है तो स्वयं इस धरती के ईश्वर को कैसा भय? अब तो इनका जूठन इनके भक्तगण ईश्वर के प्रसाद की तरह ग्रहण करने लगते हैं। ईश्वर का यह मानवीय रूप आज आम है। न इसमें तपस्या की जरूरत है, न ही ज्ञानी होने की। थोड़ा-सा रूप बदल लो, टेलीविजन के माध्यम से प्रचार कराओ, कुछ पैसे खर्च कर भक्त पटाओ, चमत्कार दिखाओ और देवता बन जाओ। भले देवत्व का एक भी गुण उसमें हो या न हो। 

सहज व्यापार : आज के युग में ये बातें अकसर देखने-सुनने को मिलती हैं। यह व्यवसाय बहुत ही लाभप्रद है, यही सोचकर लोग इस व्यवसाय में आते हैं। जिस कारण सच्चे ज्ञानियों और तापसों की कोई कद्र नहीं रह गई है। वैसे ज्ञानियों और तपस्वीजनों को अपना प्रचार कराने में मजा नहीं आता। वे अपनी धुन में मस्त रहने वाले कठजीव हैं। उनमें लोभ, लालच, आडम्बर है ही नहीं। फिर भी, इस कलियुग में जी रहे हैं। यदि उनके ज्ञान से मुझे कुछ मिल जाता तो शायद मुझे उतना कहना ही पड़ता। 

 

 

This post was written by Uday Mohan Pathak.

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