सामाजिक-आर्थिक शोषण से त्रस्त

मुकेश असीम

1931 की जनगणना के अनुसार देश में 27 लाख घरेलू कामगार थे, अधिकाँश पुरुष। स्वतंत्रता के पश्चात् साहबी कम हुई, जमींदारों की बेगार बंद हुई और विस्तार लेती पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में नई सरकारी-निजी नौकरियाँ आईं तो 1971 में यह तादाद घटकर 67 हजार रह गई।

उसके बाद 80 के दशक में नवउदारवादी नीतियों से जहाँ एक ओर नया शहरी मध्यम वर्ग उभरा वहीं गाँवों में सामाजिक-आर्थिक शोषण से त्रस्त, खेती में रोजगार की सम्भावना के अभाव और बड़े पैमाने पर जंगल-जमीन पर कॉर्पोरेट कब्जे से उजाड़े गए लोगों के बड़े समूह भी इन शहरों की और पलायन के लिए मजबूर हुए। 1991 में घरेलू कामगारों की तादाद 10 लाख पार कर गई। उसके बाद यह सँख्या और भी तेजी से बढ़ी। 2004 के NSSO के रोजगार सर्वे के मुताबिक यह तादाद 47 लाख हो गई लेकिन अब इसमें अधिक तादाद 71% अर्थात 30 लाख स्त्रियाँ हैं। 2004 में शहरी कामगार स्त्रियों के लिए सबसे बड़ा रोजगार स्रोत यही था। उसके बाद भी यह प्रक्रिया जारी है और आज सँख्या और भी ज्यादा है।

इनका भयंकर शोषण होता है, कोई न्यूनतम वेतन और अन्य कायदे यहाँ लागू नहीं। असुरक्षा, शारीरिक-यौनिक अत्याचार भी है। संगठन का अभाव है। लेकिन दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों से आती खबरें बताती हैं कि संगठित होने की शुरुआत पहले मालिक तबके ने की है। हाउसिंग सोसायटीज़ इकठ्ठा होकर वेतन कम रखने, लिफ्ट इस्तेमाल न करने देने, जैसे अमानवीय नियम बना रही हैं।

निश्चय ही इसका प्रतिवाद असंतोष और गुस्से में होगा। लेकिन उसे संगठित प्रतिरोध की शक्ल लेनी होगी। मजदूर कार्यकर्ताओं के लिए काम का वक्त है।

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