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स्त्री को एक वस्तु बनाकर पेश कर रहा सिनेमा जगत
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स्त्री को एक वस्तु बनाकर पेश कर रहा सिनेमा जगत (बॉलीवुड) “रोशन”

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स्त्री को एक वस्तु बनाकर पेश कर रहा सिनेमा जगत

स्त्री को एक वस्तु बनाकर पेश कर रहा सिनेमा जगतसिनेमा आज कला का सबसे अधिक प्रभावी और सबसे अधिक व्यापक पहुँच वाला माध्यम है। ऐसे समाज में जहाँ सम्पत्ति के मालिकों व उज़रती मज़दूरों के वर्ग के बीच टकराव चल रहा है वहाँ सिनेमा भी इस टकराव से मुक्त नहीं होता। सिनेमा द्वारा पेश किये जा रहे विचार दोनों में से एक वर्ग के पक्ष में भुगते जाते हैं। किसी भी समाज में हावी विचार राजनीतिक-आर्थिक साधनों पर काबिज वर्ग के होते हैं। कला अधिरचना का अंग होती है और वह तत्कालीन समाज के आर्थिक ताने-बाने और सम्बन्धों के आधार पर खड़ी होती है। हालाँकि कला की अपनी सापेक्षिक स्वतन्त्र आन्तरिक गतिकी के कारण यह यथार्थ के आयामों की पुनर्रचना कर सत्य को प्रकट कर सकती है और मनुष्यता के सारतत्व को संवेदित कराकर आत्मिक संसार को विस्तृत और गहरा बनाती हुई चल सकती है। परन्तु जब कला का क्षेत्र सृजन के प्राधान्य के बजाय उद्योग बन जाए और मुनाफ़ा उसका केंद्रीय तत्व बन जाए तो स्थिति अपने विलोम में बदल जाती है। पूँजी निवेश के द्वारा मनोरंजन उद्योग के साथ सिनेमा आज जिन मूल्यों की कला प्रस्तुत कर रहा है वह वर्त्तमान पूँजीवादी सड़ाँधता की स्वीकृति का पक्ष है। इसलिये आज सिनेमा में हावी विचार भी पूँजीपति वर्ग के विचार हैं। सिनेमा आज आम राय बनाने का एक बड़ा हथियार बन चुका है। सिनेमा द्वारा लोगों के अचेत मन में पर्त-दर-पर्त इतनी बारीकी से मौजूदा व्यवस्था के पक्ष के विचार दाखिल किये जाते हैं कि सिनेमा का लाभ उठाते लोगों को महसूस भी नहीं होता। मौजूदा सिनेमा की अधिकतर फिल्में ऐसी होती हैं कि जिन्हें देखते समय दर्शक एक तरह से अपना दिमाग घर रख आता है। ऐसी फिल्में मनोरंजन के साथ-साथ दर्शक के अन्दर आलोचनात्मक चिन्तन विकसित करने की जगह उनकी चेतना कुन्द करती हैं, उन्हें गैर-गम्भीर और संवेदनहीन बनाती हैं। कुछ फिल्में वे भी बनती हैं जिन्हें समाज का सोचने-विचारने वाला वर्ग देखता है, ये फिल्में अपने तरीके से एक वर्ग के विचारों को लोगों की चेतना का हिस्सा बनाती हैं। अधिकतर फिल्में समाज में मौजूद पूँजीवादी विचारधारा और समाज के कई पूर्वाग्रह की पेशकारी करती हैं और इस पेशकारी के साथ उन्हें लोगों के मन में और पक्का भी करती हैं। सिनेमा में स्त्रियों की पेशकारी भी कुछ इसी प्रकार की ही है।

फिल्मों पर पिछले कुछ वर्षों से खोज कर रही एक संस्था ने 2015 की विश्व की 100 शिखर फिल्मों के बारे कुछ आँकड़े जारी किये हैं। ये शिखर की 100 फिल्में पश्चिमी सिनेमा की ही फिल्में हैं। ये आँकड़े सिनेमा में होते लिंग और नस्ल पर आधारित भेद-भाव की एक झलक पेश करते हैं। इस खोज के अनुसार इन 100 फिल्मों में से 4,370 ऐसे पात्र थे जो कुछ बोलते थे और जिन्हें कोई नाम दिया गया है। इन पात्रों में से 68.6 प्रतिशत मर्द थे और 31.4 प्रतिशत औरतें। 92.5 प्रतिशत फिल्मों का निर्देशन मर्दों द्वारा किया गया था और सिर्फ 7.5 प्रतिशत फिल्मों का निर्देशन स्त्रियों द्वारा किया गया था। स्त्री-मर्द की तथाकथित समानता माने जाने वाले पश्चिमी समाज के ये आँकड़े विकसित समाज में स्त्रियों की दूसरे दर्ज़े की स्थिति पेश करते हैं।

इतना ही नहीं बल्कि इन फिल्मों में स्त्रियों की जिस रूप में पेशकारी की जाती है उससे सम्बन्धी आँकड़े गौरतलब है। इस खोज के मुताबिक इन 100 फिल्मों में मौजूद स्त्रियों में से 31.2 प्रतिशत स्त्रियों को नग्न होते, कपड़े उतारते और मर्दों को रिझाते हुए दिखाया गया है जबकि सिर्फ 7.7 प्रतिशत मर्दों की भूमिकाएँ ऐसी हैं। मतलब औरतों का लगभग तीसरा हिस्सा कामुकता तक सीमित कर दिया गया है। हॉलीवुड की फिल्मों में औरतों की ऐसी पेशकारी का रुझान हावी है। ज़्यादातर फिल्मों में औरतों की भूमिका मर्दों को खुश करने, उन्हें प्यार करने तक सीमित कर दिया जाता है। ये फिल्में आम रूप में भी यह प्रभाव पैदा करती हैं कि स्त्रियाँ सिर्फ भोग विलास की वस्तु हैं । फिल्मों में स्त्रियों का यह अक्स न सिर्फ विकसित माने जाते समाज की स्त्रियों के प्रति सोच उजागर करता है बल्कि इस अक्स को और ज़ोर-शोर से समाज में स्थापित करता है। इन फिल्मों द्वारा बचपन से ही बच्चों के मन में स्त्री का अक्स एक कामुक आनन्द वाली वस्तु के रूप में बनना शुरु हो जाता है। औरतों के इसी अक्स के कारण आज पोर्न उद्योग का आम फिल्मों से अधिक का कारोबार है और इसी कारण औरतों के ख़िलाफ़़ ज़ुर्म और स्त्री-मर्द सम्बन्धों में पतनशीलता तेज़ी से बढ़ रही है।

सभी फिल्मों में ही स्त्रियाँ इसी एक रूप में ही पेश नहीं होतीं। अनेको फिल्मों में उन्हें एक साधारण नागरिक या एक महत्वपूर्ण किरदार के रूप में भी पेश किया जाता है, लेकिन ऐसी फिल्मों की संख्या कम है और स्त्रियों को एक वस्तु बना कर पेश करने का रुझान ही हावी है। यह रुझान हॉलीवुड में ही नहीं बल्कि विश्व भर की फिल्मों में देखने को मिल रहा है। बॉलीवुड में भी औरतों की इस रूप में पेशकारी प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। आइटम गीत, स्त्रियों के जिस्म की नुमाइश और अश्लील दृश्य पेश करना, आज फिल्मों द्वारा ज़्यादा-से-ज़्यादा कमाई करने का नुस्खा बन चुके हैं। भारत में ऐसी फिल्में भी बनती हैं जिनमें औरत को दया का पात्र बना कर पेश किया जाता है और उनकी बेहतरी मर्दों के सहारे पर टिकी होती है। ये फिल्में दूसरे छोर पर जाकर औरतों को गुलाम दिखाती हैं। औरतों की एक तीसरे रूप में पेशकारी भी है जिसमेंं उन्हें पवित्र बना कर पेश किया जाता है और इस तरह उन पर कई पाबन्दियाँ थोप दी जाती हैं। इसके साथ संस्कारी, घरेलू और भारतीय नारी का प्रतिबिम्ब लगाया जाता है। जो स्त्री इस अक्स पर खरी उतरती है वह सम्मान की पात्र है और जो पहचान के इस खोल को तोड़ कर निकलना चाहती है वे अपनी बर्बादी, अपमान के लिये खुद ज़िम्मेदार हैं। मतलब भारतीय फिल्मों में पश्चिमी तर्ज़ पर स्त्रियों को वस्तु बनाकर पेश करने के साथ-साथ उन्हें सामन्ती बन्धनों में बाँध कर भी पेश किया जाता है जहाँ उसका काम घर-बार सँभालना, बच्चे पालना और मर्द की सेवा करना होता है। एक आज़ाद और बराबरी का दर्ज़ा रखने वाले इंसान के तौर पर उसकी यहाँ भी कोई औकात नहीं है।

इस तरह सिनेमा में औरतों को उस रूप में पेश किया जाता है जिस रूप में पूँजीवादी व्यवस्था उन्हें देखती है। मौजूदा व्यवस्था के लिये औरत एक भोगने की वस्तु है और उसका जिस्म नुमाइश लगाने की चीज़ है जिसको बाज़ार में कई तरह का माल बेचने के लिये इस्तेमाल किया जाता है। ऐसी औरत की तो मनुष्य के तौर पर कोई पहचान ही नहीं है बल्कि जिन मर्दों के मन में स्त्री का ऐसा अक्स बनता है वे भी मनुष्य होने की संवेदना गँवा चुके और पशु बन चुके हैं। मौजूदा समाज में स्त्री को मनुष्य का दर्ज़ा दिलवाने के लिये उन सामाजिक सम्बन्धों को तोड़ना ज़रूरी है जिनके केन्द्र में मुनाफा और इसके साथ जुड़ी हर तरह की वहशी हवस है। इस सामाजिक व्यवस्था को बदलने के साथ-साथ सिनेमा और कला और साहित्य के अन्य माध्यमों में भी स्त्रियों की इस तरह की पेशकारी के ख़िलाफ़ आन्दोलन चलाया जाना चाहिए और इन क्षेत्रों में मज़दूर वर्ग के नज़रिये वाले साहित्य, कला और सिनेमा को ये लोगों में ले जाया जाना चाहिए जिन में स्त्रियाँ और मर्द आज़ादी, समानता के साथ भी सब मानवीय भावनाओं के साथ लबरेज़ मनुष्यों के रूप में सामने आते हैं। यानी सामाजिक सम्बन्धों के ख़िलाफ़ लड़ाई के साथ-साथ अपनी पूरी आत्मिक दौलत के साथ मनुष्य होना क्या होता है, यह भी लोगों को सिखाया जाना चाहिए।

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