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हर साल की भांति इस साल भी
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हर साल की भांति इस साल भी (व्यंग्य) –उदयमोहन पाठक (अधिवक्ता)

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हर साल की भांति इस साल भी यह संवाद सूनते-सुनते अरसा गुजर गया। कभी उकताहट होती है कि लोग इसे बदलते क्यों नहीं? एक जगह ग्रामीण मेला लगा हुआ था। मेले में ही माइॅक से आवाज गूँज रही थी। ‘‘ हर साल की भांति इस साल भी’ सुनकर अच्छा लगा कि लोग भारत की सांस्कृतिक परम्परा को निभाते आ रहे हैं। लोग मेले का आनन्द ले रहे हैं। मेले में ग्रामीण उत्पादनों की खरीद-बिक्री हो रही है। लेकिन यही संवाद जब दूसरे जगह चिपकाया जाता है तब कुछ अजीब सा लगता हें जैसे सड़क अतिक्रमणकारियों को प्रशासन द्वारा हर साल हटाया जाता है। सप्ताह भर अतिक्रमण हटाओं अभियान चलता रहता है, फिर बन्द पुनः साग-सब्जी, फलवाला, खोमचेवाले सड़क के किनारे अपनी दुकान लगाना शुरू कर देते हैंं जिस कारण यातायात जाम से लोग परेशान होने लगते हैं। सब कोई यह दृश्य देखता है, पर बोलता कोई नहीं, क्योंकि सभी सुविधापसंद लोग हैं। कार्यालय, कचहरी से निकलें, वहीं फल, सब्जी खरीदे और अपने घर चल दिये। डेली मार्केट जानेका कोई झंझट नहीं । यातायात बाधित हो तो कोई बात नहीं। आपातकालीन सेवा की गाड़ी भीड़ में फॅंसी रहे तो कोई बात नहीं। यदि प्रशासन इस समस्या के समाधान हेतु कोई कठोर कदम उठाती है, तो इस फुटपाथी दुकानदारेां की गरीबी आड़े आती है। प्रशासन द्वारा इनके दुकान लगाने हेतू जगह निश्चित कर भी दी जाय तो वे अपनी हठधर्मिता के कारण जाना ही नहीं चाहते है। प्रशासन भी मजबूर होकर साल भर बाद अतिक्रमणकारियों से मार्ग प्रशस्त करने के लिए पुनः यह संवाद चिपकाती है-      ‘‘ हर साल की भांति इस साल भी’’

बिजली की समस्या से निजात पाने हेतु प्रतिवर्ष कई कदम उठाये जाते हैं। बिजली के तार, टांसफर्मर आदि बदले जाते हैं। बिजली चोरी करनेवालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाती हैं जुर्माना वसूला जाता हे, साथ ही विभाग द्वारा यह दावा किया जाता है कि उपभेाक्ता अब बिजली की समस्या से परेशान नहीं होंगे लेकिन गर्मी आते ही यह संवाद पुनः चिपक जाता है’’ हर साल की भॅंति इस साल भी’’। पानी की समस्या में भी यह संवाद हर साल चिपक ही जाता हैं।

शिक्षा के संबंध में एक सज्जन बोल रहे थे कि विद्यालयों में पाठ्य पुस्तक से संबंधित प्रश्न से ज्यादा मिड डे मिल और शौचालय की स्वच्छता के बारे में छात्रों  से पूछा जाता है। बेचारे शिक्षक किस पर ध्यान दें- शिक्षा पर या भेाजन पर। संभवतः यही कारण होता हे कि बच्चेां की नींव कमजोर हो जाती हैं। इसी कारण छात्रों की रिजल्ट भी हर साल कि भांति इस साल भी अच्छा नहीं हो पाता है।

यदि सब मिलकर सोचें और पहल करें तो शायद यह संवाद पुराना होकर भी अपनी अस्मिता बचाने हेतु प्रयास करता नजर आयेगा।

This post was written by Uday Mohan Pathak.

The views expressed here belong to the author and do not necessarily reflect our views and opinions.

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