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हाई कोलेस्ट्रॉल
हाई कोलेस्ट्रॉल हृदय रोग के लिए जिम्मेदार अकेला फैक्टर नहीं -रिपोर्ट

हाई कोलेस्ट्रॉल हृदय रोग के लिए जिम्मेदार अकेला फैक्टर नहीं -रिपोर्ट

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क्‍या हार्ट अटैक का कारण हाई कोलेस्ट्रॉल है? स्‍वास्‍थ्‍य से जुड़े कुछ मुद्दों पर एक जनपक्षधर डॉक्‍टर की राय

इन टिप्‍पणियों के लेखक ‘डॉ नवमीत’ एमएम मेडिकल कॉलेज सोलन, हिमाचल प्रदेश में कार्यरत हैं

डॉक्‍टर कितने लैबोरेट्री टेस्‍ट यूँ ही लिखते हैं?
असल में हाई कोलेस्ट्रॉल हृदय रोग के लिए जिम्मेदार अकेला फैक्टर नहीं है। बल्कि यह बहुत से फैक्टर्स में से एक है। लेकिन सबसे ज्यादा जोर इसी पर दिया जाता है। क्यों? क्योंकि यह दवाओं से कम किया जा सकता है। अगर कोई हृदय रोगी है तो उसके लिए स्टेटिन दवाएं असरदार हो सकती हैं लेकिन कोई स्वस्थ आदमी है और उसका कोलेस्ट्रॉल बढा हुआ है तो उन्हें इसकी जरूरत नहीं। डाइट इम्प्रूवमेंट, एक्सरसाइज, धूम्रपान छोड़ देना ये ज्यादा बेहतर ऑप्शन हैं। दूसरा ये कि कितना कोलेस्ट्रॉल लेवल सही है और उतने से ज्यादा घातक है इस पर भी कोई ठोस एविडेन्स मौजूद नहीं है। 1987 में पहली स्टेटिन दवा मार्किट में आई थी, उसके बाद से ही हर कुछ साल में हाई कोलेस्ट्रॉल की लिमिट को घटा दिया जाता है और रातों रात जो बन्दे पहले स्वस्थ थे एकदम से हाई कोलेस्ट्रॉल की कैटेगरी में आ जाते हैं। ऐसा ही डायबिटीज के केस में किया जाता है।

अब 30 सालों तक कोलेस्ट्रॉल को खराब बताने के बाद और इसकी दवा बेचकर खरबों डॉलर कमाने के बाद पिछले साल अमेरिकी सरकार ने घोषणा की है कि हाई कोलेस्ट्रॉल हृदय रोग नहीं करता। 2016 में BMJ Open जर्नल में छपे एक रिव्यु आर्टिकल, जो 70000 लोगों पर हुए शोध पर था, के अनुसार “खराब कोलेस्ट्रॉल” और हृदय रोग में कोई संबंध नहीं था। हाई कोलेस्ट्रॉल वाले 92 प्रतिशत लोग असल में ज्यादा समय तक जीये थे। *डॉक्टरों को भी अंधेरे में रखा जाता है। अब डॉक्टर तो शोध पढ़कर ही इलाज करते हैं। जैसा उन्हें जर्नल्स और टेक्स्टबुक्स में पढ़ने को मिलेगा वैसा ही वे इलाज करेंगे। समस्या तो मुनाफे पर आधारित व्यवस्था में है न।
आपने सुना होगा कॉलेस्टेरोल के बारे में और हृदय रोग से इसके संबंध के बारे में। स्वाइन फ्लू और उसकी दवा टेमी फ्लू के बारे में भी। चलिए आपको कुछ और जानकारियाँ देते हैं।

क्‍या हार्ट अटैक का कारण हाई कोलेस्ट्रॉल है? : शरीर में कोलेस्ट्रोल का लेवल कम करने वाली दवाओं का एक ग्रुप होता है “स्टेटिन”। 2007 में “प्लोस मेडिसिन” नामक एक पत्रिका में एक आर्टिकल छपा था। इसमें शोधकर्ताओं ने स्टेटिन दवाओं पर हुए 192 शोधों का अध्ययन किया था। शोधकर्ताओं ने पाया कि जो रिसर्च दवा कंपनियों द्वारा प्रायोजित थे, वे सरकारी शोधों के मुकाबले 20 गुना ज्यादा दवा के फेवर में थे। मतलब अगर एक सरकारी शोध ने दवा को अच्छा बताया और 19 ने बुरा बताया जबकि प्राइवेट कंपनियों के शोधों में इसका उल्टा था जहाँ 19 ने दवा को अच्छा बताया था। अब ये फेवरेबल रिजल्ट आता कैसे है? इसके कई तरीके हैं। एक तो जब नई दवा के साथ पुरानी दवा का कंपेरिजन होता है तो ट्रायल के दौरान पुरानी दवा की डोज को मेनिप्यूलेट कर दिया जाता है जिससे कंपनी द्वारा बनाई गई नई दवा के रिजल्ट खुद ब खुद अच्छे आ जाते हैं। दूसरा अगर नई दवा के रिजल्ट कहीं नेगेटिव आ जाते हैं तो उन शोधों को छपने ही नहीं भेजा जाता। सिर्फ पॉजिटिव वाले ही छपने के लिए भेजे जाते हैं। मसलन एक डिप्रेशन की नई दवा के साइड इफ़ेक्ट पुरानी दवाओं से बहुत ज्यादा थे लेकिन वे शोध छपे ही नहीं। बाद में उसके दस्तावेज पाये गए तो खुलासा हुआ। एक अन्य उदाहरण स्वाइन फ्लू में इस्तेमाल होने वाली दवा “ओसाल्टमाविर”, जो “टेमीफ्लू” के नाम से बिकती है, के पूरे रिजल्ट आज तक नहीं छापे गए हैं और न ही उपलब्ध करवाए गए हैं जबकि दुनिया भर की सरकारें इस दवा को महंगे दामों पर खरीद रही हैं और इसको बनाने वाली “Roche” कंपनी मोटा मुनाफा कमा रही है।
एमबीबीएस के दौरान हमारे एक टीचर थे। डॉ इमरान मसूद। असिस्टेंट प्रोफेसर, मेडिसिन। यह कश्मीरी डॉक्टर बहुत इंटेलीजेंट थे। बातें भी इंटरेस्टिंग करते थे। इंटर्नशिप के दौरान हम कई बार इनकी ओपीडी में बैठ जाते थे। इनकी ओपीडी में बैठकर मैंने काफी सीखा। एक बार बात चल पड़ी लैब वालों के साथ डॉक्टरों के गठजोड़ की। डॉ इमरान ने बताया कि उनकी माँ को दिमाग से संबंधित कोई समस्या हो गई थी। तो वे उन्हें श्रीनगर में एक नामी न्यूरो सर्जन को दिखाने ले गए। उन्होंने सीटी स्कैन करवाने को कहा और बोला कि सीटी स्कैन सिर्फ उस विशेष जगह से करवाना है। लेकिन डॉ इमरान ने अपने एक जानकर डॉक्टर के पास से करवा लिया और जब वे इसे लेकर उस न्यूरो सर्जन के पास गए तो वह आग बबूला हो उठा। उसने बिना देखे ही सीटी स्कैन को फेंक दिया और बोला जहां से मैंने कहा था वहीं से करवा कर लाओ वरना मैं नहीं देखूंगा।

डॉ इमरान ने बताया कि असल में वह न्यूरो सर्जन उस विशेष जगह से कमीशन लेते थे। इसलिए उन्होंने ऐसा किया। मैंने कहा कि सर आपने बताया नहीं कि आप भी डॉक्टर हो? तो डॉ इमरान बोले कि बताया था लेकिन सर्जन साहब को उस बात से ज्यादा मतलब अपने कमीशन से था।

अब इस सिस्टम में जब जानकर डॉक्टर ही लूट लिए जाते हैं तो आम आदमी के साथ क्या होता होगा यह आप समझ सकते हैं।
2012 की बात है। मैं उस समय भगत फूल सिंह गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज खानपुर कलां के श्वास रोग विभाग में “जूनियर रेजिडेंट” यानि जे.आर. के तौर पर कार्यरत था। वार्ड में मेरी ड्यूटी थी। वार्ड में जो मरीज होते थे उनकी रोज कुछ जांचें होती थी। कुछ हॉस्पिटल में मुफ़्त में होती थी और कुछ की सुविधा वहां नहीं थी जिनके लिए मरीज को हॉस्पिटल से बाहर बनी प्राइवेट लैबों में जाना पड़ता था। ऐसे मरीजों के लिए मैं स्लिप पर जांच का नाम लिख देता था जिसको लेकर वे बाहर जाँच करवा आते थे। मुझे पता नहीं था कि वे किस लैब से करवाते थे और कितने पैसे देते थे। खैर एक दिन मैं वार्ड में बैठा था तो एक आदमी आया और बोला डॉ साहब एक बार साइड में आ सकते हैं? आपसे अकेले में कुछ बात करनी है। मैंने कहा यहाँ भी अकेला ही हूँ। बोलिये क्या बात है। उसने कहा कि आपका “कट” लेकर आया हूँ। मैंने कहा ये “कट” क्या चीज है? बोला कि जो मरीज आप हमारी लैब पर भेजते हैं उसका 20 प्रतिशत कमीशन है। मैं हैरान। मैंने कहा भाई मैंने तो कभी कोई “कट” नहीं माँगा। और मुझे चाहिए भी नहीं। आप एक काम कर दिया करो। मैं जिस मरीज को भेजूं, उसके खर्चे में से 20 प्रतिशत कम कर दिया करो।

वह तो इस बात से सहमत हो कर चला गया लेकिन जब मैंने यह बात एक दूसरे जे. आर., जो मेडिसिन विभाग में था, को बताई तो उसने मुझे कहा कि क्यूँ घणा ईमानदार पाक रह्या है? “कट” तो सभी लेते हैं। हम तो दवा लिखने के मेडिकल रेप्रेसेंटटिव से “कट” लेते हैं और जाँच करवाने के लैब वालों से। एक जे आर तो ऐसे करके डेढ़ लाख रूपये तक एक्स्ट्रा कमा लेता है (उस समय वहां जे. आर. को 43000 रूपये महीने सैलरी मिलती थी)। अब डेढ़ लाख का तो मुझे पता नहीं लेकिन यह जानकारी मेरे लिए नई थी।

तो यह हाल है डॉक्टरों और अस्पतालों का। और यह तो सरकारी अस्पताल की बात है। प्राइवेट और कॉर्पोरेट में क्या होता है उसकी जानकारी के लिए तो अलग से किताब लिखी जा सकती है।

आइये आज आपको एक विशेष जाँच “सिंक टेस्ट” की जानकारी देते हैं। जब आप डॉक्टर के पास जाते हैं तो अक्सर डॉक्टर आपके लिए कुछ जांचें लिखता है। कुछ बीमारियों का पता लगाने के लिए ये जरूरी भी होता है। लेकिन *अधिकतर समय जाँच की आवश्यकता नहीं होती और बीमारी का पता मरीज की हिस्ट्री और लक्षणों से लगाया जा सकता है।* फिर भी मरीज की जेब काटने के लिए गैर जरूरी टेस्ट लिख दिए जाते हैं जिनके लिए लैब वाला डॉक्टर (या कंपनी) मोटी रकम वसूलता है। इस रकम का एक निश्चित हिस्सा, जिसको “कट” कहा जाता है, जाँच लिखने वाले डॉक्टर को मिलता है। तो ये “सिंक टेस्ट” क्या है? होता यूँ है कि जब आप खून का सैंपल लैब में देकर आते हो तो बहुत बार आपके सैंपल को “सिंक” में फेंक दिया जाता है और बिना जाँच के ही बनी बनाई रिपोर्ट आपको थमा दी जाती है और आपसे पैसे वसूल लिए जाते हैं। इसी को “सिंक टेस्ट” कहा जाता है। फिर इस नकली रिपोर्ट के आधार पर आपको गैर जरूरी दवाएं लिख दी जाती हैं। इस पूरे खेल में दवा कंपनियों से लेकर लैब वाले और डॉक्टर तक सभी पैसा बनाते हैं।

नोट : सभी डॉक्टर ऐसा नहीं करते। लेकिन बहुत करते हैं।

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