उदय मोहन पाठककविताघर-संसारन्यूज़ पटलसामाजिकसाहित्य

हे नारद, मेरी सुनो (कविता) – उदय मोहन पाठक (अधिवक्ता)

हे नारद
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हे नारद ‘ : आजादी के इतने वर्ष बीत जाने जाने के बाद भी जब शोषित, पीड़ित, गरीब, लोगों को देखता हूँ तो मन में एक भाव आता है कि कोई ऐसा बहुजन हिताय कार्य करने वाला मसीहा अवतरित हो जो इनके पीड़ा को हर ले और समाज में समानता भ्रातृत्व का भाव, सर्वजन-मन में उत्पन्न कर सकेA इसी भाव को मन में लिए मैंने ये कल्पना की हैA प्राचीन कथाओ में मैंने पढ़ा है कि नारदजी लोकहित की कामना से हमेशा सांसारिक जनों के पीड़ा के निवारणार्थ उपाय बताते रहे हैं इसलिए मैंने उन्हीं से यह विनती की है कि समाज में समानता का शंखनाद हो, सबों के बीच प्रेम, भाईचारा बना रहे, सबों के चेहरे पर मुस्कान होA सन्यासी जीवन सामाजिक जीवन से परे है लेकिन वे समाज कल्याण के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हैं इसलिए मै उन्हीं को आधार मानकर अपनी बात टूटे फूटे शब्दों में कहने का प्रयास कर रहा हूँ

हे नारद !

तुम वीणा बजाते हुए, प्रभु नाम गाते हुए,

तीनों लोक मे घुमते रहते हो,

तुम योगी हो, संयासी हो,

तुम्हारा काम तो इस तरह चल जाएगा।

तुम हॅस लोगे, गा लोगे, मुस्कुरा लोगे,

अपनी व्यंग्य वाणी से लोको को शंकित कर

आपस में झगड़ा लगा दोगे।

फिर  प्रस्थान

दूसरी जगह  यही दृश्य  फिर  सबको लिखा दोगे।

हे  नारद !

इस  पृथ्वी  पर दीन हीन नाना विध पीड़ाओं से ग्रसित

जनमानस पर तुम्हारे  उपदेश का क्या  असर होगा?

भूख से विलखते बच्चे,

अपनी इज्जत  बचाती अबलायें,  कठिन परिश्रम करते

जिन्दगी  की कठिनाइयों को झेलते इन्सान पर,

तुम्हारे ज्ञान और गायन का क्या असर पड़ेगा?  ईर्ष्या से ग्रसित,

उदर की  ज्वाला  से पीड़ित, इन्सान  को कैसे लुभावोगे।

इसलिए  हे नारद !

तुम अपने योगबल और ज्ञानबल से

कुछ ऐसा चमत्कार  करो कि लोग कम पाकर भी संतुष्ट  हो जाय,

लोगो  के  अन्तर्मन  से लोभ, घृणा, ईष्या, दंभ, शत्रुता, पिसुनता स्वतः लुप्त  हो जाये,

मानवता का मंत्र दिगंत

में गुॅजने लगे।

This post was written by Uday Mohan Pathak.

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