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​नया दौर (हिन्दुस्तान)

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July 1, 2017 

भारतीय अर्थव्यवस्था और राजनीति के लिए कर सुधार कोई नया शब्द नहीं है। दुनिया के तमाम दूसरे देशों की तरह ही हम भी कई दशकों से ऐसा तरीका खोजने और अपनाने में जुटे हुए हैं, जिससे लोग और उद्योग खुशी-खुशी अपनी कमाई का एक हिस्सा सरकार के खजाने में पहुंचा दें। भारत में यह काम कुछ ज्यादा कठिन है, क्योंकि यहां जितना कर दिया जाता है, उससे कहीं ज्यादा कर चोरी होती है। भारत में कर सुधार का एक मतलब कर की चोरी रोकने के तरीके तलाशना भी होता है। काफी समय से हमारी सरकारें वे कर व्यवस्थाएं तलाश रही हैं, जिनमें कर चुराना कर देने के मुकाबले ज्यादा महंगा साबित हो। यानी अगर वे खुशी-खुशी टैक्स देने को राजी न भी हों, तो इसे देने में ही उन्हें भलाई लगे। इन्हीं कोशिशों से शुरू हुआ कर सुधारों का सिलसिला अब वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी तक आ पहुंचा है। जीएसटी से न सिर्फ सरकार पूरे देश को एक बाजार, एक कर व्यवस्था में तब्दील करने जा रही है, बल्कि इससे तरह-तरह के अप्रत्यक्ष करों जैसे केंद्र और राज्य के बिक्री कर, उत्पादन कर, आयात शुल्क, प्रवेश शुल्क, टर्नओवर टैक्स, सेवा कर जैसी जटिलताएं खत्म होंगी और एक-दो उत्पादों को छोड़कर ज्यादतर चीजें एक कर व्यवस्था के तहत आ जाएंगी। इसे एक ऐतिहासिक क्षण की तरह पेश किया जा रहा है। ऐतिहासिक क्षण यह भले ही न हो, लेकिन आज हम जिस कर व्यवस्था में पहंुचे हैं, वह देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अध्याय तो है ही। इसलिए तो है ही कि हमने एक आधुनिक कर व्यवस्था को अपनाया है, साथ ही इसलिए भी है कि इसके लिए देश में जैसी राजनीतिक आम सहमति बनी है, वैसी पहले कभी नहीं दिखी।
आज जब हमने जीएसटी को अपना लिया है, तो हमें वैल्यू एडेड टैक्स यानी वैट की उस व्यवस्था को भी याद करना चाहिए, जिसे हमने कल अलविदा कह दिया था। इन दोनों ही कर व्यवस्थाओं में बहुत सी समानताएं हैं। ये दोनों ही गंतव्य आधारित कर व्यवस्थाएं हैं और तकनीकी रूप से दोनों में कोई बहुत अंतर नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 12 साल पहले जब हमने वैट को अपनाया था, तब उससे भी ऐसी ही उम्मीदें बांधी गई थीं, जो आज जीएसटी से बांधी जा रही हैं। तब भी यही कहा गया था कि इससे कर चोरी रुक जाएगी, क्योंकि कर चोरी व्यापारियों को ज्यादा महंगी पडे़गी। लेकिन सच यही है कि न कर चोरी रुकी, न काला धन। तरह-तरह के स्वार्थी तत्वों ने वैट के प्रावधानों में अपना उल्लू सीधा करने के रास्ते तलाश लिए। यही खतरा जीएसटी में भी हो सकता है। बहुत से स्वार्थ इसमें भी जुगाड़ तलाशने में जुट गए होंगे। दरअसल कर सुधार और भ्रष्ट आचरण पर अंकुश हमारी ये दो अलग-अलग जरूरतें हैं। कर सुधार का अर्थ बाजार और व्यवस्था के भ्रष्टाचार को पूरी तरह खत्म कर देना नहीं है।

अब जब हमने जीएसटी को अपना लिया है, तो वैट के हश्र का यह सबक तो याद रखना ही होगा, साथ ही दुनिया भर में जहां भी जीएसटी लागू हुई है, वहां पर उसके असर को भी ध्यान में रखना होगा। सिंगापुर जैसे कई देशों में जीएसटी लागू होने के बाद एकाएक महंगाई काफी तेजी से बढ़ गई थी। यह खतरा हमारे यहां भी है। हालांकि उम्मीद यही की जा रही है कि जीएसटी की दर भले ही पहले दिए जाने वाले टैक्स से ज्यादा हो गई हो, लेकिन पहले एक उत्पाद पर कई जगह कर लगता था, अब एक ही जगह लगेगा, इससे उत्पाद की कीमत कम होगी। लेकिन इस कम हुई कीमत का फायदा उपभोक्ता तक पहंुचेगा या फिर व्यापारी उससे अपना मुनाफा बढ़ाएंगे, यह अभी नहीं कहा जा सकता।

सौजन्य – हिन्दुस्तान।

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