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​भारतीय राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया जाने  

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भारत के राष्ट्रपति, भारत गणराज्य के कार्यपालक अध्यक्ष होते हैं। राष्ट्रपति के चुनाव की प्रणाली को समझने के लिए आपको इन बिंदुओं को समझना होगा:

प्रक्रिया: राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल जिसे इलेक्टोरल कॉलेज भी कहा जाता है, करता है। संविधान के अनुच्छेद 54 में इसका वर्णन है। यानी जनता अपने राष्ट्रपति का चुनाव सीधे नहीं करती, बल्कि उसके वोट से चुने गए प्रतिनिधि करते हैं। चूंकि जनता राष्ट्रपति का चयन सीधे नहीं करती है, इसलिए इसे अप्रत्यक्ष निर्वाचन कहा जाता है।
कौन करता है वोट:
भारत के राष्ट्रपति के चुनाव में सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुने गए सदस्य और लोकसभा तथा राज्यसभा में चुनकर आए सांसद अपने वोट के माध्यम से करते हैं। उल्लेखनीय है कि सांविधानिक ताकत का प्रयोग कर जिन सांसदों को राष्ट्रपति नामित करते हैं वे सांसद राष्ट्रपति चुनाव में वोट नहीं डाल सकते हैं। विधान परिषद के सदस्य भी राष्ट्रपति चुनाव में मत का प्रयोग नहीं कर सकते हैं।
सिंगल वोट ट्रांसफरेबल सिस्टम पर आधारित प्रक्रिया:
भारत में राष्ट्रपति के चुनाव में एक विशेष तरीके से वोटिंग होती है। इसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम कहते हैं। यानी एकल संक्रमणीय प्रणाली। सिंगल वोट यानी वोटर एक ही वोट देता है, लेकिन वह कई उम्मीदवारों को अपनी प्राथमिकी से वोट देता है। यानी वह बैलेट पेपर पर यह बताता है कि उसकी पहली पसंद कौन है और दूसरी, तीसरी कौन। यदि पहली पसंद वाले वोटों से विजेता का फैसला नहीं हो सका, तो उम्मीदवार के खाते में वोटर की दूसरी पसंद को नए सिंगल वोट की तरह ट्रांसफर किया जाता है। इसलिए इसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट कहा जाता है।
वोट डालने वाले सांसदों और विधायकों के वोट का प्रमुखता अलग-अलग होती है। इसे वेटेज भी कहा जाता है। दो राज्यों के विधायकों के वोटों का वेटेज भी अलग अलग होता है। यह वेटेज राज्य की जनसंख्या के आधार पर तय किया जाता है और यह वेटेज जिस तरह तय किया जाता है, उसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था कहते हैं। राष्ट्रपति चुनाव कराने का जिम्मा चुनाव आयोग पर होता है।

This post was written by Rajni Raman.

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