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सुदेश महतो सरकार में रहकर भी सीएनटी/एसपीटी के संशोधन को रोकने में नाकाम

सुदेश महतो
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सिल्ली और गोमिया को लेकर सत्ताधारी दल भाजपा और आजसू में टकराव तय है वहीं, विपक्ष एकजुट हो चुनाव में झामुमो को समर्थन देगा। गुरुवार को की घोषणा के बाद इन दोनों ही क्षेत्रों में राजनीतिक गोलबंदी तेज होने के आसार हैं। सिल्ली में झामुमो विधायक अमित महतो और गोमिया में झामुमो के योगेंद्र प्रसाद की सदस्यता रद होने के कारण इन दोनों सीटों पर हो रहे हैं। भाजपा के सहयोगी दल आजसू ने चुनाव की घोषणा से पूर्व ही दोनों सीटों पर अपनी तैयारी शुरू कर दी थी। सिल्ली से आजसू के केंद्रीय अध्यक्ष सुदेश महतो और गोमिया से चंद्रप्रकाश चौधरी के करीबी लंबोदर महतो का चुनाव लड़ना तय माना जा रहा है। आजसू के महासचिव उमाकांत रजक ने पिछले दिनों इसकी अधिकृत घोषणा भी कर दी थी। अरविंद महतो, तुलसी महतो, संजय महतो, गजाधर महतो, किशोर महतो, रंजीत महतो, जनता महतो, निबध कटियार, विनय महतो, राकेश महतो, मुकेश महतो, दीपक महतो, बुद्धेश्वर महतो, पलटू महतो के मौजूगी में सुदेश महतो बिनोद बाबू की समाधि स्थल आने पर आदिवासी कुर्मी समाज ने उनके खिलाफ नारेबाजी की। कहा कि  सुदेश महतो सरकार में रहकर भी सीएनटी/एसपीटी के संशोधन को रोकने में नाकाम रहे। वह यहां के मूलवासियों को दिग्भ्रमित कर रहे हैं।

कुर्मियों का अगला बड़ा नेता कौन?

पिछले कई वर्षों से झारखण्ड की राजनीति को प्रभावित करनेवाले आजसू प्रमुख सुदेश महतो स्वयं को कुर्मियों का बड़ा नेता मानते है, पर सुदेश महतो के ही गढ़ सिल्ली विधानसभा क्षेत्र से सुदेश महतो को एक बड़े मार्जिन से हराकर झामुमो के टिकट पर विधानसभा पहुंचे अमित महतो ने सुदेश महतो की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर विराम लगा दिया।

सुदेश महतो की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वे स्वयं सत्तापक्ष से  चिपके रहना चाहते है, क्योंकि सत्तापक्ष से चिपकने पर इसका आर्थिक फायदा मिलता रहता है, जिसका लाभ उन्होंने हमेशा उठाया है। जब सरकार अल्पमत में हो, और आजसू की वैशाखी के बिना सरकार नहीं चल पाये तब ऐसे में इसका मजा कुछ और बढ़ जाता है, जिसका फायदा सुदेश ने समय-समय पर उठाया है तथा अपनी राजनीतिक इमेज चमकाने के लिए यहां के कुछ पत्रकारों को अपने तरफ मिलाकर अपना चेहरा चमकाने की कोशिश की, पर इन दिनों झामुमो के अमित महतो की धमक ने उनकी नींद उड़ाई है।

एक समय था कि कुर्मियों का एकछत्र नेता बनने के लिए कभी शैलेन्द्र महतो, राजकिशोर महतो, मथुरा प्रसाद महतो लगे रहते थे। मथुरा महतो को छोड़कर शैलेन्द्र महतो व राजकिशोर महतो, अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरी करने के लिए भाजपा की भी परिक्रमा की और भाजपा से फायदा उठाया, ठीक उसी प्रकार जैसे कि सुदेश महतो भाजपा से चिपककर सत्तासुख का आनन्द लेते रहे है, पर मथुरा प्रसाद महतो ने जो झामुमो का हाथ थामा, आजतक झामुमो में हैं और कभी झामुमो के साथ गद्दारी नहीं की।

इधर सिल्ली से शानदार जीत अर्जित करनेवाले झामुमो के अमित महतो की पकड़ अब सिल्ली में ही नहीं, बल्कि सिल्ली से बाहर भी मजबूत होती जा रही है। कुर्मी जाति के युवाओं की टीम उन्हें अपना हीरो मानने लगी है, जबकि सुदेश का जादू धीरे-धीरे उतरता जा रहा है। सुदेश के जादू के उतरने का मूल कारण जनता के लिए संघर्ष नहीं करना तथा हमेशा सत्ता से चिपके रहना और सरकार की आरती उतारना है। दूसरी ओर अमित महतो को चाहनेवाले मानते है कि अमित महतो में संघर्ष करने की क्षमता है तथा यह युवा विधानसभा में ही नहीं, बल्कि उनके लिए सड़कों पर भी लड़ने को तैयार है। ऐसे में स्पष्ट है कि अमित महतो की छवि धीरे-धीरे बनती जा रही है, साथ ही झारखण्ड मुक्ति मोर्चा में भी इस युवा की सुनी जा रही हैं।

अगर यहीं स्थिति रही, तो हो सकता है कि सुदेश महतो जो यह ख्वाब देख रहे है कि विधानसभा चुनाव में उनकी स्थिति बेहतर होगी, उन्हें निराशा हाथ लग सकती है, क्योंकि सिल्ली विधानसभा में आज भी अमित की पकड़ बहुत ही मजबूत है और सुदेश महतो अपनी मजबूत पकड़ को और ओर ढीली करते जा रहे हैं, ऐसे में चिन्ता सुदेश महतो को करनी है कि वे स्वयं को कैसे झारखण्ड की राजनीति में फिट कर पाते है, क्योंकि ऐसे भी जो उनकी चाहत थी कि वे झारखण्ड की सरकार को अपने इशारों पर नचायेंगे, उस चाहत को मुख्यमंत्री रघुवर दास ने झाविमो के उन विधायकों को मंत्री पद दे ग्रहण लगा दिया।