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कविता ” माँ 

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पिता का प्यार

और माँ के सपनों की
लिखावट हूँ मैं।
हर सपनें माँ
हमारी ;तुमसे शुरु होती है।
क्योंकि तेरी सपनों की
जीता-जागता हकीकत हूँ मैं ।
नौ महीने तक माँ
तुने हर कष्टों को झेला ,
करवटे बदल बदलकर पर
मैं हर पल माँ!

तेरी बाँहों में खेला ।
तुने हर खुशियों को
कष्ट झेल झेल कर भी
मेरी झोली में डाला ।
माँ तु है ममता की मूरत
तेरी छाँव में है वो जन्नत ।
मेरी हर आह में बस माँ
मेरे दिल में तु ही रहती है।
तु न होकर भी इस दुनिया में
बस मेरे इस दिल में बसती है ।

सुरेन्द्र कुमार उपाध्याय (मन्टू उपाध्याय तीसरी गिरिडीह झारखंड )

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