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जनता की भलाई के जगह अंबानी की भलाई करती मोदी सरकार

जनता की यह कैसी पेहरिदारी
जनता की यह कैसी पेहरिदारी

महज चंद दिनों पहले जब प्रधानमन्त्री ने कथित रूप से उत्तर प्रदेश में परियोजनाओं की नींव रखने के क्रम में 50 बड़े पूँजीपतियों को सम्बोधित करते हुए कहा था कि ‘अगर नेक नीयत हो तो उद्योगपतियों के साथ खड़े होने में दाग़ नहीं लगता!’ उस समय पूरी देश की जनता एनआरसी, आसामी-बंगाली, हिन्दू-मुस्लिम में उलझी हुई थी। ठीक उसी समय एक बड़ी ख़बर चुपके से आकर निकल गयी कि ‘चौकीदार’ सेंधमार मुकेश अम्बानी की रिलायंस इण्डस्ट्रीज़़ से 30 हज़ार करोड़ रुपये की प्राकृतिक गैस चोरी का मुक़दमा अन्तरराष्ट्रीय मध्यस्थता पंचाट में हार गयी है!

आन्ध्र के कृष्णा-गोदावरी बेसिन में ओएनजीसी के गैस भण्डार से सेंधमारी कर रिलायंस द्वारा हज़ारों करोड़ रुपये की प्राकृतिक गैस चुराने का यह मामला कई साल से रिलायंस ओर मोदी सरकार की सहमति से चुनी गयी पंचाट में चल रहा था। इस पंचाट ने ओएनजीसी की शिकायत को रद्द कर रिलायंस पर लगा 10 हज़ार करोड़ का 2016 में ए पी शाह द्वारा लगाया गया जुर्माना हटा दिया है। उलटे इस पंचाट ने आदेश दिया है कि अब सरकार को ही लगभग 50 करोड़ रुपये हरजाने के तौर पर रिलायंस को देने होंगे। क्या यह जुरमाने की राशि भाजपा के है या जनता के?

आन्ध्र की कृष्णा और गोदावरी के डेल्टा क्षेत्र में स्थित कृष्णा-गोदावरी (केजी) बेसिन कच्चे तेल और गैस का विशाल भण्डार माना जाता है। 1997-98 में भारत सरकार कच्चे तेल और गैस की खोज के लिए न्यू एक्सप्लोरेशन और लाइसेंस पॉलिसी (नेल्प) लेकर आयी थी। इस नीति का मुख्य मक़सद तेल खदान क्षेत्र में लीज के आधार पर सरकारी और निजी क्षेत्र की कम्पनियों को एक समान अवसर देना था। इसी नीति के तहत रिलायंस का प्रवेश तेल और गैस के अथाह भण्डार वाले इस क्षेत्र में हुआ था। बाद में रिलायंस ने इन तेल-गैस क्षेत्रों में अपना अधिकार बनाना शुरू किया, जहाँ सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी ओएनजीसी पहले से खुदाई कर रही थी।

धीरे-धीरे रिलायंस की ओर से मीडिया में ख़बरें आने लगीं कि उसे इस क्षेत्र में करोड़ों घनमीटर प्रतिदिन प्राकृतिक गैस उत्पादन करने वाले कुएँ मिल गये हैं। इन ख़बरों से रिलायंस का शेयर के बाज़ार भाव आसमान पर जा पहुँचे। 2008 में रिलायंस ने तेल और अप्रैल 2009 में गैस का उत्पादन शुरू किया। लेकिन हक़ीक़तन रिलायंस को इन क्षेत्रों से बेहद कम तेल और गैस प्राप्त हो रही थीं और पास के क्षेत्र में स्थित ओएनजीसी अपने कुओं से भरपूर मात्रा में तेल व गैस का उत्पादन कर रहा था।

सन् 2011 में यहाँ स्थित रिलायंस की परियोजना में गैस उत्पादन में भारी गिरावट आयी और सरकार ने रिलायंस को ग़ैर-प्राथमिक क्षेत्र के उद्योगों को गैस की आपूर्ति बन्द करने का आदेश दिया। और यही वे रिलायंस प्राथमिक कारण थे जिसके वजह से इन्हें पेट्रोलपंप भी बंद करने पड़े। परन्तु रिलायंस ने इस्पात उत्पादन करने वाले समूहों को साथ लेकर सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया और पेट्रोलियम मन्त्रालय और रिलायंस में विवाद गहराता चला गया। पेट्रोलियम मन्त्रालय का कहना था कि रिलायंस को लेखा महापरीक्षक (कैग) द्वारा ऑडिट कराना होगा, लेकिन रिलायंस इसके लिए तैयार नहीं हुआ। साथ ही उसने इस क्षेत्र में अरबों करोड़ निवेश करने के अपने वादे से भी मुकर गया।

इस दौरान 2013 में रिलायंस और ओएनजीसी के बीच गैस चोरी को लेकर विवाद की थोड़ी–थोड़ी भनक मिलना शुरू हो गया था। ओएनजीसी ने 15 मई 2014 को दिल्ली उच्च न्यायालय में एक मुक़दमा दायर किया, जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि रिलायंस इण्डस्ट्रीज़ ने उसके गैस ब्लॉक से हज़ारों करोड़ रुपये की प्राकृतिक गैस चोरी की है। लेकिन ओएनजीसी को उसकी औक़ात मोदी सरकार ने 9 दिन के अन्दर ही याद दिला दी। सरकार ने 23 मई को रिलायंस, ओएनजीसी और पेट्रोलियम मन्त्रालय के अधिकारियों की एक बैठक करवायी और सबने मिलकर इस मामले के अध्ययन के लिए एक समिति बनाने का निर्णय लिया, जिसमें रिलायंस ओर सरकारी प्रतिनिधि शामिल थे। समिति ने मामले की जाँच का ठेका दुनिया की जानी-मानी पेट्रोलियम तकनीकी सलाहकार अमेरिकी कम्पनी डिगॉलियर एण्ड मैकनॉटन (डी एण्ड एम) को दे दिया।

डी एण्ड एम ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ओएनजीसी के ब्लॉक से आरआईएल के ब्लॉक में 11,000 करोड़ रुपये की गैस गयी है। साथी ही उसने यह सलाह भी दे डाली कि इन ब्लॉकों में बची गैस को रिलायंस से ही निकलवा लिया जाये, क्योंकि वह इस काम को करने में माहिर है। इस रिपोर्ट पर निर्णय देने के लिए मोदी सरकार ने न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ए पी शाह की अध्यक्षता में एक जाँच समिति का गठन किया। समिति का काम इस मामले में हुई भूलचूक की जाँच करना और ओएनजीसी को दिये जाने वाले मुआवज़े के बारे में सिफ़ारिश करना था।

शाह समिति ने इस मामले में स्पष्ट रूप से कहा कि मुकेश अम्बानी की अगुवाई वाली रिलायंस इण्डस्ट्रीज़ को ओएनजीसी के क्षेत्र से अपने ब्लॉक में बह या खिसककर आयी गैस के दोहन के लिए उसे सरकार को 1.55 अरब डॉलर का भुगतान करना चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक़ भी रिलायंस अनुचित तरीक़े से फ़ायदे की स्थिति में रही है। लेकिन मोदी सरकार ने रिलायंस द्वारा इस फ़ैसले को मानने से इनकार करते हुए उसके द्वारा अन्तरराष्ट्रीय पंचाट में जाने के निर्णय को स्वीकार कर लिया, जिसके द्वारा दिये गये फ़ैसले ने देश की जनता को सदा के लिए महँगे दामों पर गैस ख़रीदने पर अब मजबूर कर दिया है।

दरअसल वहाँ पर मोदी सरकार की नहीं भारत की जनता की हार हुई है और एक पूँजीपति की जीत हुई है और वो भी एक ऐसे केस में जो साफ़-साफ़ चोरी और सीनाज़ोरी का मामला था। कमाल की बात यह कि हमारी ‘राष्ट्रवादी चौकीदार’ सरकार ने रिलायंस जैसी कम्पनियों के साथ, उन्हें ऐसे संकट से बचाने के लिए, यह समझौता किया हुआ है कि भारत सरकार और भारतीय कम्पनी के बीच भारत में ही हुए किसी विवाद का फ़ैसला भारतीय अदालतों के बजाय कुछ विदेशी पंचों से कराया जायेगा जिन्हें सरकार और कम्पनी दोनों की पसन्द से चुना जायेगा! तो सवाल यह है कि रिलायंस की सहमति से चुने गये पंचों से जो उम्मीद थी, वही हुआ है। पर आखि़र ये फ़ैसला सामान्य अदालती व्यवस्था के बजाय इस मध्यस्थता पंचाट में क्यों हुआ? जनता के आँखों में धुल झोंकने के लिए।

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