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कोलेबिरा उपचुनाव में एक सशक्त महिला नेतृत्व की जरूरत
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कोलेबिरा उपचुनाव में एक सशक्त महिला नेतृत्व की जरूरत

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कोलेबिरा उपचुनाव की सरगर्मी ने यहाँ की जनता में एक नए उम्मीद को हवा दे दी है। यहाँ के हालात चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि संकट के इस अँधेरे को नये बदलाव के बूते ही चीरा जा सकता है। कोलेबिरा विधानसभा चुनावों में अब तक पुरुष प्रधान समाज की सोंच ने अपना वर्चस्व जमा रखा है। नतीजन महिलाओं और उनकी समस्याओं से जुड़े मुद्दे उपेक्षित होकर, पितृसत्तात्मक समाज के पाँव तले कुचलाता रहा है। लेकिन अब परिदृश्य बदल चुका है। जिस प्रकार यहाँ नारी शक्ति का उदय देखने को मिल रहा है, उससे साफ़ अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोलेबिरा उपचुनाव में एक सशक्त महिला नेतृत्व की सख्त जरूरत है। क्योंकि:-

  • महिलाओं की भागीदारी यहाँ सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ रही है। ये अपनी सामाजिक एवं आर्थिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना वे अपने सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं और साथ ही अपनी उपस्थिति भी महसूस करा रही हैं। आज कोलेबिरा महिला सशक्तिकरण के युग में जी रहा है। वे अब पुरुषों के साथ या उनके बिना एक चुनावी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए सशक्त हो चुकी हैं।
  • मानव तस्करी के बढ़ते पैमाने से यह क्षेत्र पूरी तरह दहला हुआ है। न जाने कितनी नाबालिग बच्चियां काम दिलाने के नाम पर कोलेबिरा से बाहर भेजी जाती है। जहाँ उन्हें वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेल दिया जाता है।परन्तु अब तक यहाँ से निर्वचित कोई भी जनप्रतिनिधि इसे रोकने व कार्रवाई करने में पूरी तरह नाकाम रही है। ऐसी स्थिति में जनता की मांग एक ऐसे उम्मीदवार की है जो तस्करी की शिकार होने वाली बच्चियों का दर्द समझ सके। और इसमें कोई शक नहीं की एक महिला का दर्द एक महिला से बेहतर कोई नहीं समझ सकता।
  • महिलाओं के शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ सशक्त महिला नेतृत्व एक शक्तिशाली औजार के रूप में काम करेगा। कोलेबिरा के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति शहरी क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं की तुलना में ज्यादा दयनीय है। 21वीं सदी के आधुनिक युग में आज भी यहाँ कितनी महिलाओं को डायन बिसाई जैसे अन्धविश्वास का कोपभाजन बनना पड़ रहा है।

अलबत्ता, महिलाओं के प्रति यहाँ बढ़ रहे शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ पर्याप्त कानूनी संरक्षण सुलभ कराने हेतु बदलाव की एक नये बयार से कोलेबिरा को गुजरना होगा। ज़रूरत है यहाँ की माताओं-बहनों के लिए बंद दरवाज़े को खोलने की, रौशनी को अंदर आने देने की, उसे सुधारने की ,निहारने-निखारने की। क्योंकि एक न्यायसंगत एवं प्रगतिशील समाज के लिए एक सशक्त महिला प्रतिनीधि को अवसर प्रदान किए जाने  के लिए आवाम को आवाज बुलंद करनी होगी।

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