ओम प्रकाश रमणन्यूज़ पटलसामाजिक

बाबासाहब अम्बेडकर और बुद्ध जैसे महामानव को ही सभ्यता डालते हैं

बाबासाहब
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बाबासाहब: 6 दिसंबर महापरिनिर्वाण दिवस एवं संकल्प दिवस वर्ष 2017

कल्पप्रवर्तक, बहुजन समाज एवं महिलाओं के मुक्तिदाता धम्मचक्र प्रवर्तक डॉ बाबासाहब आंबेडकर महापुरुषों की श्रेणी में आगे देखते हैं, क्योंकि नेताओं के कार्यकाल 25 से 30 साल होते हैं, महापुरुषों के कार्यकाल 200 से 300 साल तक चलता है, लेकिन डॉक्टर बाबासाहब आंबेडकर और बुद्ध जैसे महामानव सिविलाइजेशन को ही बदल डालते हैं। इसलिए डॉ बाबासाहब आंबेडकर महापुरुष से आगे धम्मचक्र प्रवर्तक, महिलाओं के मुक्तिदाता, कल्पप्रवर्तक हैं। मेरे लिहाज से तो मूलनिवासी, बहुजन समाज और महिलाओं के मुक्तिदाता केवल और केवल डॉ बाबासाहब आंबेडकर ही हैं।
मैं अपनी बात बड़े स्पेसिफिक ढंग सेरखना चाहूंगा। नागपुर से लेकर आसाम बंगाल तक, नागपुर से लेकर कच्छ भुज तक, नागपुर से लेकर जम्मू कश्मीर तक तक हिंदीभाषी बेल्ट है और यहां इस बेल्ट में 65 करोड़ की आबादी रहती है। परंतु इस बेल्ट में अंबेडकरइज्म की कोई विचारधारा नहीं है। दूसरी बात यह है की इस हिंदी बेल्ट में बुद्ध की क्रांति सम्राट अशोक के शासन के बाद प्रतिक्रांति हुई। यहां पुष्यमित्र शुंग ने वृहदत्त मौर्य का खात्मा करके प्रतिक्रांति की है। यह वह बेल्ट है जहां बुद्ध ने क्रांति की थी। मगर बुद्ध के बाद की जो क्रांति हुई वह नानहिंदी बेल्ट में हुई क्यों? क्या इसके पीछे का कारण कल्चरल रिलीजियस और समाजिक कारण है। क्यों फुले महाराष्ट्र में पैदा हुए? डॉक्टर बाबा साहब अंबेडकर मध्य प्रदेश प्रदेश में पैदा हुए और महाराष्ट्र उनका कार्यक्षेत्र रहा? क्यों डॉक्टर बाबा साहब की क्रांति के आगे मार्क्स और माओ की क्रांति छोटी प्रतीत होती है?
यूरोप के अंदर गुलामी केवल आर्थिक आधार पर थी, इकोनॉमिक थी, मगर भारत में ऐसा नहीं था। शायद अंग्रेज भारत में नहीं आते तो बाबा साहब अंबेडकर ने संविधान नहीं लिखा होता। तो हम बहुजन समाज को आजादी कभी नहीं मिलती। भारत में गुलामी आर्थिक से ज्यादा धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक, कानूनी, और मानसिक थी। करण हिंदू कास्ट सिस्टम ‘ब्राह्मणइज्म’ हां मै इसे मनुवाद नहीं कहूंगा क्योंकि डॉ आंबेडकर ने मनुवाद शब्द का कभी प्रयोग नहीं किए। जिन्हें डिटेल्स में पढ़ना है उन्हें अमेडकर के वॉल्यूम पढ़ने चाहिए। हमें करेक्ट बात, करेक्ट हिस्ट्री को पढ़ना सीखना चाहिए। नहीं तो हम लौटा युग में परिवर्तित हो जाएगे। हां बिन पेंदी का लोटा, यही कारण है कि आज बहुजन आंदोलन, दलित आंदोलन, लौटा युग का शिकार है।
बाबा साहब अंबेडकर ने धम्म शब्द का प्रयोग किया है धर्म का नहीं। इसलिए बुद्ध के संघ में ब्राह्मण आए मगर जनेऊ और सैंडी लेकर नहीं बल्कि धर्म को नकार कर धम्म की कंसेप्ट को अपनाकर आए। जहां 3600 सालों की आर्यन वैदिक कल्चर को सम्राट अशोक भी समाप्त नही कर पाए वहीं 3600 साल की इस गुलामी को सबसे पहले बुद्ध ने समाप्त किया। उन्होंने आइडियल सोसाइटी का निर्माण किया।
700 साल का संतों का मूवमेंट क्यों फेल हुआ? क्यों संत मूवमेंट ने हमारा फायदा नहीं किया? महात्मा आए और चले गए पर गुलामी नहीं गई। क्योंकि संतो ने ब्राह्मणइज्म से समझौता कर लिए थे।
क्यों मुसलमान आने के पहले कबीर और रविदास पैदा नहीं हुए? प्रतिक्रांति के बाद 1000 साल तक कोई रिवोल्ट नहीं हुआ? पर इस 3600 साल की गुलामी को बाबा साहब ने 36 साल में उखाड़ कर फेंक दिया। हाथी निकल गया पूछ बाकी है। इसलिए अगर भारत की कोई अपनी विचारधारा हो सकती है तो वह केवल फुले और अंबेडकर विचारधारा ही हो सकती है। 21वीं सदी में मार्कसिज्म और कैपिटलिज्म की ग्लोबल विचारधारा का केवल अंबेडकरीज्म ही मात्र विकल्प है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि 1 मई 2007 में यूके ब्रिटेन में उनकी पार्लियामेंट ने अम्बेडकर के 10 सिद्धांत को लागू किया है, जो 1994 में बना। उसके विषय में बाबा साहब ने 50 साल पहले बात कही थी। डॉक्टर अंबेडकर की स्टेट एंड मैटरनिटी 1946 को आज अंतर्राष्ट्रीय कानून में इनकारपोरेट हुई नजर आती है। डॉक्टर बाबा साहब के लेखन के साथ एक बड़ी दिक्कत है कि उनका 95 फ़ीसदी लेखन अंग्रेजी में है और मूवमेंट लेखन मराठी में है। महत्वपूर्ण बात यह है कि जो ट्रांसलेशन हुए है वह बहुत सही नहीं हुए। इसे भी समझने की जरूरत है।
जहां तक मैं समझता हूं फूले और बाबा साहब की विचारधारा को को छोड़ दिया जाए तो भारत में विचारधारा है ही नहीं क्योंकि गांधी चमचा युग के निर्माता माने जाते हैं। पूना पैक्ट के बाद क्या हुआ औरंगाबाद में जो हंगामा हुआ वो अच्छी बात नहीं है। क्योंकि बाबा साहब ने खुद 25 सितंबर 1932 से लेकर 1947 तक स्वयं पैक्ट का विरोध किया है। अप्रैल 1933 में पैनल सिस्टम को बदलने की बात कही। उन्होंने लंदन जाने से पहले 1933 में पूना पैक्ट के अल्टरनेटिंग की चाहत की और पैनल सिस्टम को बदलने की बात कही। 1940 फरवरी में एक पब्लिक रैली में फिर पुणे पैक्ट का विरोध किया। ऑल इंडिया शेड्यूल कास्ट फेडरेशन का 20 जुलाई 1942 को तीसरा रिजॉल्यूशन पास किया और उसमे उन्होंने कहा कि संयुक्त मतदार संघ और आरक्षित सीटों को रद्द कर देना चाहिए और साथ ही स्वतंत्र मतदार संघ की मांग की गई। स्वतंत्र मतदार संघ की मांग और पुणे करार का धिक्कार उन्होंने स्वयं1946 में किया और 1947 तक करते रहे। जुलाई 1946 में पुणे सत्याग्रह की शुरुआत हुई जो पुणे नागपुर से लेकर लखनऊ तक चला। लखनऊ में टेकचंद कुरील ने उसे लीड किया। इस सत्याग्रह का नारा था RR भोले करे पुकार पूना पैक्ट करो धिक्कार। बाबा साहब ने जुलाई 1946 में पुणे में इस सभी को गाइड किया था और अपने संविधान स्टेटस एंड मायनेरिटी को 24 मार्च 1947 को संविधान सभा में टेबल कर पुणे फैक्ट को समाप्त करने की बात कही थी। इसलिए बाबा साहब को पढे बगैर ऐसा हंगामा ठीक नहीं है।
भारत के परिपेक्ष में आरक्षण यह कांस्टीट्यूशनल सेटलमेंट ऑफ डेमोक्रेसी है। राजनीतिक आरक्षण बंद होना चाहिए क्योंकि उसमें हमारे सही प्रतिनिधि चुन कर नहीं जाते। बाबासाहब ने कहा था कि अगर इस देश में एससी-एसटी को सही प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है तो ऐसा संविधान हमें मंजूर नहीं होगा। ऐसी स्थिति में भारत को आजादी नहीं मिलेगी। ऐसा ऐलान अंग्रेजों ने किया था। इसलिए आजादी आजादी के बदले आरक्षण मिला है। डॉक्टर अंबेडकर नेहरू को कहते थे यू आर ए फोर्थ क्लास स्टूडेंट बोफोर मी। आज हमारे नेता आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करते हैं। मगर दुनिया के कौन से देश में आर्थिक आधार पर आरक्षण है। हमारे देश में आरक्षण को संवैधानिक मान्यता है। अमेरिका के पार्लियामेंट ने आरक्षण दिया है। संविधान गारंटी यह ‘परमानेंट गारंटी’ और पॉलिटिकल गारंटी केवल 5 साल की होती है। दुनिया का एक देश बताएं जो आर्थिक आधार पर आरक्षण देता हो। बाबा साहब का आधार सामाजिक आधार है। हमारे या तथाकथित नेता की बात ही निराली है वे अंबेडकरइज्म नहीं जानते, 1916 में बाबा साहब ने कहा था ब्राह्मण दुनिया में जहां भी माइग्रेट होंगे उस देश में प्रॉब्लम होगा। यूके ब्रिटेन के पार्लियामेंट में इस बात पर डिस्कस किया गया। भारत की जाति व्यवस्था तो समाप्त नहीं हुई लेकिन कहीं ऐसा ना हो कि भारत कास्ट सिस्टम खत्म हो ना हो और हमारे देश में कास्ट का ही प्रॉब्लम बन जाए।

@–साभार धी. विजय मानकर (API)