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ब्राह्मणवाद शब्द का इस्तेमाल अक्सर होता है -इसका क्या अर्थ है

ब्राह्मणवाद का अर्थ क्या है? भारत में जाति के आधार पर इन्सानों से भेदभाव होता आया है। जाति व्यवस्था की बात यहां के धर्म में लिखे हैं। भारत में जाति व्यवस्था की बात करने वाला धर्म ग्रंथ ब्राह्मणों द्वारा लिखे गये थे। इसलिए इस जातिवाद के विचारधारा को ब्राह्मणवाद कहा जाता है। और जो भी इस जातिवाद में विश्वास करता है उसे ब्राह्मणवादी।

लेकिन, ब्राह्मणवादी विचारधारा वाला व्यक्ति किसी भी जाति का या धर्म से हो सकता है। अगर कोई जाटव बाल्मीकी से नफ़रत करता है या यादव जाटव से नफ़रत करता है तो वह भी ब्राह्मणवादी है। ब्राह्मणवादी होने के लिये ब्राह्मण जाति का होना ज़रूरी नहीं है। कई ब्राह्मण जाति के लोग इस जातिवाद का विरोध करते हैं, यानी वे ब्राह्मणवाद का विरोध करते हैं।

भारत में ब्राह्मणवाद का पैंठ इतनी गहरी है कि यह मुस्लिम और इसाई तथा सिख समुदाय तक में देखा जा सकता है। इसकी मुख्य विशेषताओं में से एक है जन्म के आधार पर किसी को ऊंचा और नीचा मानना। ब्राह्मणवाद के अनेक आधार हैं। जैसे बुद्धिजीवी को श्रमजीवी से ज्यादा पैसा मिलना चाहिये। ऑफ़िस में काम करने वाले को सफाई करने वाले से अधिक तनख्वाह मिलनी चाहिये यह मानना भी ब्राह्मणवाद है।

ब्राह्मणवाद इन्सानियत के लिये नुक़सानदेह है

ब्राह्मणवाद को इन्सानियत के लिये नुक़सानदेह माना जाता है। इसलिये किसी भी लोकतंत्र को ब्राह्मणवाद से मुक्त करने की कोशिश की जाती है। इसका अर्थ ब्राह्मण जाति का होना कतई नहीं हो सकता। इसका अर्थ केवल एक है जाति का समापन कर इंसान होना। 

भारत में ब्राह्मणवाद ने जाति के आधार पर राजनैतिक और आर्थिक सत्ता पर अपना कब्ज़े जमा रखी है। नतीजतन आज देश कुपोषण, गरीबी, बेरोज़गारी व पुलिस दमन जैसे त्रासदी से जूझ रहा है। और जद में सबसे अधिक आदिवासी, दलित, बहुजन और आम गरीब हैं।

मसलन, अगर एक लोकताँत्रिक देश में कुछ समुदाय अपनी जाति के कारण ताक़तवर और अमीर बने हुए हैं और वे दूसरे समुदायों और जातियों के ख़राब हालात की चिंता किये बगैर अपनी अमीरी और राजनैतिक ताक़त बढ़ाने की  अंधी दौड़ में लगे रहते हैं, तो यह हालात समाज के विकास में बाधा है। — Himanshu Kumar

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